अगस्त 1947 का समय और लाहौर का शहर। प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह और उनके परिवार को पूरा विश्वास था कि देश के बंटवारे के बाद लाहौर भारत की सीमा के भीतर ही रहेगा। ऐसी ही उम्मीद पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के भाई के कई मुस्लिम मित्रों को भी थी। इसके पीछे एक ठोस वजह यह थी कि लाहौर की आबादी में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले हिंदू और सिख समुदाय के लोग वहां के 80 प्रतिशत व्यापार पर काबिज थे। हालांकि, स्वतंत्रता मिलने के ठीक 48 घंटे बाद जब नक्शा सामने आया, तो तस्वीर बिल्कुल उलट थी और लाहौर पाकिस्तान के पाले में जा चुका था।
अचानक बदले ठिकाने और शरणार्थी बने लोग
नक्शा जारी होते ही हजारों लोगों की अपनी ही जमीन पर पराई हो गई। उन्हें रातोंरात अपना सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा। बंटवारे की यह दास्तान ऐसे अनगिनत जख्मों और विडंबनाओं से भरी हुई है। कई लोगों के साथ ऐसा हुआ कि उनके घर का रसोईघर भारत में रह गया जबकि बेडरूम पाकिस्तान में चला गया। कुछेक मामलों में किसानों के खेत तक दो देशों के बीच लकीर खींचकर बांट दिए गए।
ऐतिहासिक दस्तावेज और अध्ययन
भारत और पाकिस्तान के बीच खींची गई इस विभाजन रेखा और उससे जुड़े संघर्षों को समझने के लिए कई विद्वानों और इतिहासकारों ने अपनी किताबों में गहरा विश्लेषण किया है। इनमें लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएर की पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट, लूसी पी चेस्टर की बॉर्डर्स एंड कॉन्फ्लिक्ट इन साउथ एशिया, रामचंद्र गुहा की इंडिया आफ्टर गांधी, और कुलदीप नैयर की स्कूप जैसी पुस्तकें शामिल हैं। इसके अलावा शशि थरूर की एन एरा ऑफ डार्कनेस, लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएर की माउंटबेटन एंड द पार्टीशन ऑफ इंडिया, विश्वनाथ घोष की गेजिंग एट नेबर्स, यास्मीन खान की द ग्रेट पार्टीशन, वीपी मेनन की द ट्रांसफर ऑफ पावर इन इंडिया, केके अजीज की हिस्ट्री ऑफ पार्टीशन ऑफ इंडिया, तथा रितु मेनन और कमला भसीन की बॉर्डर्स एंड बाउंड्रीज और एबडक्टेड वुमेन जैसी कृतियां इस दर्दनाक इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डालती हैं।



















