भारत में बिना औपचारिक विवाह के एक साथ रहने वाले जोड़ों की कानूनी स्थिति और सामाजिक मान्यता को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी बदलाव देखने को मिल रहा है। आगामी जनगणना 2027 में लिव-इन में रह रहे जोड़ों को परिवार के विवरण में 'शादीशुदा' के रूप में दर्ज करने की अनुमति मिलने जा रही है, बशर्ते वे अपने रिश्ते को एक स्थिर संबंध बताते हों। इसके साथ ही, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाते हुए लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को घरेलू क्रूरता विरोधी कानूनों के तहत सुरक्षा पाने का अधिकार दिया है। हालांकि, इन दोनों फैसलों के अलग-अलग उद्देश्य हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है।
क्रूरता विरोधी कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर लोकेश बी.एच. एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। इस मामले में याचिकाकर्ता लोकेश पहले से शादीशुदा थे और उन्होंने दूसरी महिला के साथ रहते हुए उसे अपनी पत्नी के रूप में पेश किया था। बाद में उस महिला ने उन पर क्रूरता और दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया। अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या किसी औपचारिक विवाह के बिना भी दहेज या क्रूरता विरोधी कानून लागू हो सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्रूरता विरोधी धाराओं का लाभ लेने के लिए औपचारिक शादी होना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि दो वयस्क सहमति से ऐसे संबंध में रह रहे हैं जो 'विवाह की प्रकृति' जैसा है, तो वहां यह कानून लागू होगा। हालांकि, यह फैसला केवल क्रूरता विरोधी प्रावधानों तक सीमित है और इससे शादीशुदा जोड़ों को मिलने वाले सभी कानूनी अधिकार खुद-ब-खुद लागू नहीं हो जाते। पूर्व में लागू भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, जिसे अब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85 के रूप में बदला जा चुका है, में अधिकतम तीन साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
जनगणना 2027 में लिव-इन जोड़ों का डेटा संग्रह
जनगणना में किए जा रहे बदलावों को लेकर अक्सर यह भ्रम पैदा हो जाता है कि सरकार बिना शादी के रहने वाले जोड़ों को कानूनी रूप से विवाहित घोषित कर रही है। वास्तव में जनगणना 2027 के मार्गदर्शक दिशानिर्देशों के अनुसार, यदि कोई लिव-इन जोड़ा अपने रिश्ते को एक 'स्थिर संबंध' मानता है, तो जनगणना अधिकारी घर के सदस्यों के आपसी संबंध दर्ज करते समय उन्हें शादीशुदा की श्रेणी में गिन सकते हैं।
यह प्रक्रिया केवल जनसांख्यिकीय आंकड़े जुटाने के लिए है और इससे किसी जोड़े को मैरिज सर्टिफिकेट या पति-पत्नी का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं होता। दिल्ली हाई कोर्ट की अधिवक्ता सीमा जोशी के अनुसार, जनगणना का काम केवल यह दर्ज करना होता है कि घरेलू स्तर पर रिश्ते किस तरह से चल रहे हैं। वहीं मेरठ के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अमित चौधरी का मानना है कि इस प्रकार के आंकड़ों से सरकार को बदलते पारिवारिक ढांचे को समझने और उसी अनुसार सामाजिक कल्याण की योजनाएं बनाने में मदद मिलती है।
जनगणना डेटा में रिश्ते की स्थिति का महत्व
जनगणना केवल आबादी की गिनती नहीं करती, बल्कि यह देश की सामाजिक संरचना और जीवन शैली का विस्तृत चित्र प्रस्तुत करती है। इसमें यह रिकॉर्ड किया जाता है कि कौन किसके साथ रह रहा है और समय के साथ परिवारों का रूप किस प्रकार बदल रहा है। पारंपरिक रूप से भारतीय जनगणना में वैवाहिक स्थिति को कभी शादी न करने वाले, वर्तमान में शादीशुदा, विधवा या विधुर, अलग रहने वाले और तलाकशुदा श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
लिव-इन जोड़ों का सही डेटा दर्ज करने से उन परिवारों की जानकारी मिलेगी जो पारंपरिक वैवाहिक व्यवस्था में फिट नहीं बैठते। इस डेटा का उपयोग भविष्य में आवास योजनाओं, जन कल्याणकारी नीतियों और जनसंख्या नियोजन के लिए किया जाएगा।
घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पहले से मौजूद अधिकार
सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला लिव-इन में रहने वाली महिलाओं के लिए पहला कानूनी कवच नहीं है। इससे पहले भी महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत कानूनी सुरक्षा हासिल थी। इस कानून की धारा 2(एफ) में 'विवाह की प्रकृति जैसे संबंध' को शामिल किया गया है।
यदि कोई लिव-इन संबंध इस परिभाषा के दायरे में आता है, तो महिला को रहने के लिए जगह, सुरक्षा आदेश और वित्तीय सहायता पाने का पूरा अधिकार होता है। अदालतों ने समय-समय पर उपयुक्त मामलों में भरण-पोषण के दावों को भी स्वीकार किया है। इसके अलावा, ऐसे संबंधों से पैदा होने वाले बच्चों के पास भी अपने वैधानिक अधिकार होते हैं।
शादी और लिव-इन में अंतर तथा कानूनी सीमाएं
भले ही अदालतों ने लिव-इन पार्टनर्स को कई मोर्चों पर राहत दी है, लेकिन भारतीय कानून में अभी भी कोई एक ऐसा प्रावधान नहीं है जो उन्हें कानूनी पति-पत्नी के बराबर अधिकार दे सके। लिव-इन पार्टनर को अपने साथी की संपत्ति में स्वतः ही उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिलता। इसके अलावा, पेंशन या पति-पत्नी को मिलने वाले अन्य लाभों पर भी लिव-इन पार्टनर सीधा दावा नहीं कर सकते।
दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक फैसला इस अंतर को साफ जाहिर करता है। इस मामले में एक महिला 10 साल तक एक विवाहित पुरुष के साथ लिव-इन में रही थी, लेकिन अदालत ने उसकी भरण-पोषण की याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि वह महिला खुद कानूनी रूप से किसी अन्य व्यक्ति से शादीशुदा थी।
अदालतें कैसे तय करती हैं 'विवाह जैसा संबंध'
कानून में ऐसा कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं है कि कितने साल साथ रहने पर रिश्ता 'विवाह जैसा' मान लिया जाएगा। अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेती हैं। अधिवक्ता सीमा जोशी के मुताबिक, अदालतें देखती हैं कि क्या दोनों साथी एक ही घर में रहते हैं, घरेलू जिम्मेदारियां बांटते हैं, आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं और समाज के सामने खुद को एक जोड़े के रूप में पेश करते हैं।
वहीं अधिवक्ता अमित चौधरी का कहना है कि सिर्फ एक साथ रहने के आधार पर फैसला नहीं होता। अदालतें दोनों पक्षों के बीच के आपसी जुड़ाव और रिश्ते की पूरी स्थिति का मूल्यांकन एक साथ करती हैं, तथा कोई भी एक कारक अकेला निर्णायक नहीं होता।



















