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बेटी के नाम जमा पीपीएफ राशि पर पिता का हक नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने दिए 8 प्रतिशत ब्याज के साथ 8 लाख रुपये लौटाने के निर्देशपड़ताल
13 अग॰ 2026, 12:04 am (2 घंटे पहले)· 2

बेटी के नाम जमा पीपीएफ राशि पर पिता का हक नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने दिए 8 प्रतिशत ब्याज के साथ 8 लाख रुपये लौटाने के निर्देश

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बच्चे के नाम पर खोले गए पब्लिक प्रोविडेंट फंड यानी पीपीएफ खाते में जमा राशि सिर्फ बच्चे की होती है। कोर्ट ने पिता को बेटी का 8 लाख रुपये से अधिक का फंड ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।

माता-पिता अक्सर बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए उनके नाम पर विभिन्न बचत योजनाओं और म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं। हालांकि, क्या माता-पिता बच्चों के बालिग होने से पहले या बाद में इस पैसे को अपनी निजी जरूरतों या पारिवारिक खर्चों के लिए निकाल सकते हैं? इसी विषय पर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और स्पष्ट फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि भले ही निवेश की पूरी रकम पिता या माता ने अपनी जेब से जमा की हो, लेकिन यदि खाता बच्चे के नाम पर है, तो उस संपत्ति का कानूनी हकदार केवल वह बच्चा ही होगा। अभिभावक केवल उस राशि के संरक्षक यानी गार्जियन होते हैं, मालिक नहीं।

1999 में खुला खाता और 2016 में पूरी राशि की निकासी का विवाद

इस कानूनी मामले की शुरुआत वर्ष 1999 में हुई थी, जब सुधीर कावत्रा ने अपनी नाबालिग बेटी शामली कावत्रा के नाम पर एक पब्लिक प्रोविडेंट फंड यानी पीपीएफ अकाउंट खोला था। वर्षों के दौरान पिता ने इस खाते में नियमित रूप से पैसे जमा किए, जिसके कारण परिपक्वता से पहले ही खाते का कुल बैलेंस बढ़कर 8 लाख रुपये से अधिक हो गया। वर्ष 2016 में सुधीर कावत्रा ने इस पीपीएफ खाते से पूरे 8.13 लाख रुपये की निकासी कर ली और खाता पूरी तरह बंद कर दिया।

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वर्ष 2017 में जब शामली कावत्रा बालिग हुई और अपने बैंक खाते की जानकारी लेने बैंक पहुंची, तो उसे पता चला कि उसके नाम पर मौजूद पीपीएफ खाता अब अस्तित्व में ही नहीं है। पिता द्वारा बिना सहमति या जानकारी के सारा पैसा निकाल लिए जाने पर बेटी ने कानूनी रास्ता अपनाया और जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया। जिला अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए बेटी के पक्ष में निर्णय दिया और पिता सुधीर कावत्रा को आदेश दिया कि वह निकाली गई पूरी राशि 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अपनी बेटी को लौटाएं।

जिला अदालत से दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला

जिला अदालत के फैसले से असंतुष्ट होकर पिता सुधीर कावत्रा ने दिल्ली हाई कोर्ट में रेगुलर फर्स्ट अपील दायर की। इस अपील पर सुनवाई हाई कोर्ट की जज जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की अदालत में हुई। पिता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि उन्होंने अपनी बेटी की परवरिश, शिक्षा और देखभाल पर पहले ही लगभग 6 लाख रुपये खर्च किए हैं। इसके अलावा, उनका अपनी अलग रह रही पत्नी के साथ भी विवाद चल रहा था और उन्हें पत्नी को भरण-पोषण यानी मेंटेनेंस देने का कानूनी आदेश मिला हुआ था।

पिता का कहना था कि चूंकि उन्होंने बेटी की पढ़ाई और पालन-पोषण पर 6 लाख रुपये खर्च किए थे, इसलिए पीपीएफ खाते से निकाली गई 8.13 लाख रुपये की रकम को उन खर्चों के एवज में समायोजित किया जाना चाहिए। सुधीर कावत्रा ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के एक अन्य आदेश का भी हवाला दिया, जिसके तहत उन्हें अपनी पत्नी को अतिरिक्त मेंटेनेंस देना था। पिता ने दावा किया कि इस राशि का इस्तेमाल भी आखिरकार उनकी बेटी के ही कल्याण के लिए हुआ था, इसलिए पीपीएफ का पैसा निकालना गलत नहीं था।

अदालत का स्पष्ट रुख, मेंटेनेंस और संपत्ति के अधिकार में अंतर

दिल्ली हाई कोर्ट ने पिता के इन सभी तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। 3 अगस्त को सुनाए गए अपने फैसले में जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने दो मुख्य बातों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया। पहला, एक पिता का अभिभावक के रूप में कर्तव्य और दूसरा, अपनी संतान और पत्नी को मेंटेनेंस देने का उसका स्वतंत्र कानूनी दायित्व। अदालत ने कहा कि पिता केवल एक गार्जियन के रूप में उस पीपीएफ खाते का प्रबंधन कर रहे थे। चूंकि निवेश बेटी के नाम पर किया गया था, इसलिए वह पैसा पूरी तरह बेटी का ही था।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी के भरण-पोषण का अधिकार एक अलग कानूनी अधिकार है। पिता अपनी पत्नी को मेंटेनेंस देने की जिम्मेदारी से मुक्त होने के लिए बेटी के वैध अधिकार और उसकी बचत के पैसे का इस्तेमाल नहीं कर सकते। कानून के अनुसार, पिता का यह दायित्व है कि वह अपने निजी स्रोतों से बेटी और पत्नी का मेंटेनेंस करे, न कि बेटी के नाम जमा संपत्ति को हड़प कर उस दायित्व की भरपाई करे।

कानूनी फर्म पीएसएल एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स की एसोसिएट चार्मी खुराना ने इस फैसले के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि एक प्राकृतिक संरक्षक का कर्तव्य केवल बच्चे के पालन-पोषण तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें बच्चे की वित्तीय संपत्तियों की सुरक्षा करना भी शामिल है। जब कोई गार्जियन किसी नाबालिग के नाम पर निवेश शुरू करता है, तो वह निवेश पूरी तरह से बच्चे के लाभ के लिए माना जाता है।

कॉलेज की पढ़ाई और वित्तीय तंगी का हवाला

मामले की सुनवाई के दौरान अब कॉलेज छात्रा बन चुकी शामली कावत्रा ने अदालत को बताया कि पिता द्वारा पीपीएफ से निकाले गए पैसों का इस्तेमाल उनकी शिक्षा पर नहीं किया गया था। शामली ने अपनी स्थिति बयां करते हुए कहा कि वह वर्तमान में गंभीर वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रही हैं और यह मामला केवल पैसे के दावे का नहीं है, बल्कि पिता द्वारा दिया गया शिक्षा का हवाला हकीकत में कभी पूरा ही नहीं हुआ।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट, जबलपुर के अधिवक्ता सचिन नायक ने इस मामले की व्याख्या करते हुए कहा कि माता-पिता का यह सोचना गलत है कि बच्चे पर पैसा खर्च करने से उन्हें बच्चे की बचत वापस लेने का अधिकार मिल जाता है। भले ही पैसा पिता की कमाई से जमा हुआ हो, लेकिन एक बार जब वह राशि बच्चे के नाम पर पंजीकृत हो जाती है, तो बालिग होने पर उस रकम की पूर्ण हकदार केवल संतान ही होती है।

कानूनी रूप से कब बनता है बच्चे का अपनी बचत पर मालिकाना हक

भारतीय कानून के तहत एक बच्चा 18 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले भी संपत्ति का कानूनी मालिक हो सकता है। यदि कोई राशि विशेष रूप से बच्चे के नाम पर दी गई है, जैसे कि कोई उपहार, छात्रवृत्ति, पुरस्कार राशि या बच्चे के नाम किया गया वित्तीय निवेश, तो बच्चा ही उस संपत्ति का वास्तविक लाभार्थी माना जाता है। उम्र के साथ केवल खाते के नियंत्रण में बदलाव आता है, मालिकाना हक में नहीं।

अठारह वर्ष की आयु से पहले अभिभावक खाते का संचालन करते हैं, जबकि 18 वर्ष पूरे होते ही बच्चा स्वयं उस खाते को व्यक्तिगत रूप से चलाने और उसमें जमा पूरी राशि प्राप्त करने का हकदार हो जाता है। एलारा लॉ ऑफिसेस की पार्टनर सुप्रिया मजूमदार का कहना है कि बच्चे के नाम बनाई गई वित्तीय संपत्ति का मुख्य उद्देश्य उसके भविष्य को सुरक्षित करना होता है। न तो पिता की अपनी जरूरतें और न ही पत्नी के मेंटेनेंस के दावे इस फंड से पूरे किए जा सकते हैं।

क्या माता-पिता कभी भी बच्चे का पीपीएफ का पैसा नहीं निकाल सकते

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि माता-पिता किसी नाबालिग के पीपीएफ खाते से कभी पैसा निकाल ही नहीं सकते। पीपीएफ नियमों के तहत एक निश्चित अवधि के बाद या आपात स्थिति में अभिभावक द्वारा नियमानुसार partial withdrawal या खाता बंद करना गैर-कानूनी नहीं है। मुख्य विवाद निकासी का नहीं, बल्कि निकाले गए पैसे के मालिकाना हक का है।

सचिन नायक के अनुसार, यदि कोई पिता आपात स्थिति में पैसा निकालता भी है, तो भी वह राशि बच्चे की ही रहेगी। पिता का व्यक्तिगत कर्ज, वित्तीय तंगी या कोई अन्य कानूनी देनदारी बच्चे के पीपीएफ फंड पर उनका अधिकार स्थापित नहीं करती। यदि भविष्य में किसी मामले में यह साबित हो जाए कि खाता केवल सुविधा के लिए खोला गया था और पैसा कभी बच्चे को देने की मंशा नहीं थी, तो स्थिति अलग हो सकती है। हालांकि, मौजूदा मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ माना कि पीपीएफ का पूरा निवेश बेटी का ही था।

माता-पिता के लिए व्यावहारिक सावधानियां

इस फैसले के बाद कानूनी विशेषज्ञों ने माता-पिता को सलाह दी है कि बच्चों के नाम पर बचत करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें। सबसे पहले, खाते में बच्चे का नाम सही ढंग से दर्ज होना चाहिए। दूसरे, बच्चे के फंड को अपने निजी बैंक खातों या फंड के साथ मिक्स न करें। तीसरा, बच्चा जैसे ही 18 वर्ष का हो जाए, उसके सभी निवेश और खाते के दस्तावेज सम्मानपूर्वक उसके सुपुर्द कर दें।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अंततः जिला अदालत के फैसले पर अपनी मोहर लगाते हुए सुधीर कावत्रा की अपील खारिज कर दी। आदेश के मुताबिक पिता को 8.13 लाख रुपये की पूरी राशि 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के साथ अपनी बेटी शामली कावत्रा को वापस लौटानी होगी।

सवाल-जवाब

दिल्ली हाई कोर्ट ने पीपीएफ मामले में क्या आदेश दिया है?
कोर्ट ने पिता सुधीर कावत्रा को आदेश दिया है कि वह अपनी बेटी शामली कावत्रा के पीपीएफ खाते से निकाले गए 8 लाख रुपये से अधिक की राशि 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाएं।
क्या पिता बच्चे की पढ़ाई पर हुए खर्च के एवज में पीपीएफ का पैसा रख सकता है?
नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे का पालन-पोषण और शिक्षा पिता का कानूनी दायित्व है, और इसके लिए बच्चे की अपनी बचत का पैसा नहीं काटा जा सकता।
क्या माता-पिता नाबालिग बच्चे के पीपीएफ खाते से पैसा निकाल सकते हैं?
पीपीएफ नियमों के तहत गार्जियन द्वारा पैसे निकालना गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन निकाली गई राशि पर कानूनी हक केवल बच्चे का ही रहता है।
बच्चे के नाम जमा पैसों पर उसका पूरा नियंत्रण कब होता है?
18 वर्ष की आयु पूरी कर बालिग होते ही बच्चा अपने नाम दर्ज खातों और जमा राशि का पूर्ण संचालन और मालिक बन जाता है।
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