हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के वर्ष 2026 बैच के छात्रों के राज्य बार काउंसिलों में नामांकन पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा लगाई गई अस्थायी रोक का मामला अब शांत हो गया है। बीसीआई के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने चौतरफा विरोध और तीखी प्रतिक्रियाओं के सामने झुकते हुए कुछ ही घंटों के भीतर इस विवादित आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया। यह पूरा विवाद यूनिवर्सिटी के आगामी दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने के विरोध से शुरू हुआ था। छात्रों के एक वर्ग द्वारा इस निमंत्रण का विरोध किए जाने पर बीसीआई प्रमुख ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूरे बैच के वकालत पंजीकरण पर रोक लगाने का फरमान जारी किया था, जिसे बाद में कानूनविदों, छात्र संगठनों और कानूनी बिरादरी के दबाव में वापस लेना पड़ा।
नालसार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कैसे सुलगा विवाद?
तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ देश के शीर्ष राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों में से एक है, जहां वर्तमान में लगभग 1,400 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इस प्रतिष्ठित संस्थान की यह दीर्घकालिक परंपरा रही है कि इसके वार्षिक दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होते हैं और उत्तीर्ण छात्रों को संबोधित करते हैं। आमतौर पर यह समारोह प्रतिवर्ष अगस्त या सितंबर के महीने में आयोजित किया जाता है। इस वर्ष भी संस्थान प्रशासन द्वारा दीक्षांत समारोह की तैयारियां की जा रही थीं, लेकिन इसी बीच विश्वविद्यालय के भीतर एक विरोध के सुर उभरने लगे।
बीते 23 जुलाई को संस्थान के एलएलबी और एलएलएम पाठ्यक्रमों से पास आउट हो रहे 70 विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को एक औपचारिक पत्र सौंपा। इस पत्र में उन्होंने आगामी दीक्षांत समारोह में जस्टिस सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। छात्रों का यह विरोध जंतर मंतर पर हुए एक प्रदर्शन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ की मौखिक टिप्पणियों से उपजा था। शुरुआती 70 छात्रों से शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे व्यापक रूप लेने लगा और देखते ही देखते इस मांग का समर्थन करने वाले छात्रों की संख्या बढ़ कर 380 तक पहुंच गई। जब संस्थान प्रशासन की ओर से समारोह को लेकर कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया, तो छात्रों ने यह चेतावनी भी दे दी कि यदि उनकी मांगों पर संज्ञान नहीं लिया गया तो वे दीक्षांत समारोह का बहिष्कार करेंगे और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करेंगे।
जंतर मंतर प्रदर्शन और कोर्ट की टिप्पणी का पूरा घटनाक्रम
नालसार के छात्रों के इस विरोध का मुख्य कारण 20 जुलाई को जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजीपी) द्वारा आयोजित प्रदर्शन और उसके बाद घटी घटनाएं थीं। 20 जुलाई को जंतर मंतर से संसद मार्च के दौरान पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई के खिलाफ एक अधिवक्ता ने 22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता वकील ने अदालत से दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया और तर्क दिया कि जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने बर्बरता की है।
इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता वकील को टोकते हुए टिप्पणी की थी कि वे अदालत और अपना समय बर्बाद न करें। जब वकील ने अदालत से निवेदन किया कि उनके पास पुलिस द्वारा निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर किए गए हमलों के वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं जिन्हें वे प्रस्तुत करना चाहते हैं, तो इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि उन्हें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है और उनके पास इन्हें देखने का समय नहीं है।
अदालत की इस टिप्पणी से आक्रोशित नालसार के 70 छात्रों ने अपने पहले पत्र में लिखा कि जिस शीर्ष अदालत की पीठ ने दिल्ली में पुलिस की बर्बरता के खिलाफ तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया, उनके न्यायाधीश को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित करना संस्थान के संवैधानिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है। छात्रों का तर्क था कि नालसार में उन्हें संवैधानिक अधिकारों की रक्षा, न्याय तक पहुंच और शिकायतों के निवारण के जो मूल्य सिखाए गए हैं, यह कदम उनके विपरीत है। बाद में 2028 और 2029 बैच के छात्रों ने भी इस पत्र का समर्थन करते हुए मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति का पुरजोर विरोध किया।
बीसीआई अध्यक्ष का फरमान और तीन दिन का अल्टीमेटम
विवाद के बीच 12 अगस्त को नालसार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्रीकृष्ण देव राव के कार्यालय ने आधिकारिक सूचना दी कि दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए जस्टिस सूर्यकांत को आमंत्रण भेजा जा चुका है। इसके ठीक अगले दिन, यानी 13 अगस्त को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने एक बेहद सख्त निर्देशात्मक पत्र जारी कर दिया। यह पत्र नालसार के कुलपति के साथ-साथ देश की सभी राज्य बार काउंसिलों को भेजा गया था।
इस पत्र में बीसीआई अध्यक्ष ने आदेश दिया कि नालसार लॉ यूनिवर्सिटी से वर्ष 2026 में पास आउट होने वाले छात्रों का पंजीकरण किसी भी राज्य की बार काउंसिल में वकील के रूप में न किया जाए। हम जानते हैं कि देश में कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी भी व्यक्ति को वकालत का पेशा शुरू करने के लिए संबंधित राज्य की बार काउंसिल में पंजीकृत होना अनिवार्य होता है। इस नियम के तहत बीसीआई का यह निर्देश सीधे तौर पर 2026 बैच के सभी स्नातकों के करियर पर ब्रेक लगाने जैसा था।
इसके साथ ही मनन मिश्रा ने कुलपति से तीन दिनों के भीतर उन सभी छात्रों की पूरी सूची, पहचान पत्र विवरण और विस्तृत रिपोर्ट मांगी जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अभियान चलाया, बैठकें आयोजित कीं या दीक्षांत समारोह का बहिष्कार करने की बात कही। बीसीआई ने इस विरोध में बाहरी तत्वों की संलिप्तता की जानकारी भी मांगी थी। अपने कड़े रुख को सही ठहराते हुए बीसीआई ने कहा कि जांच लंबित रहने तक 19 अगस्त की अंतिम निर्णय तिथि तक नामांकन पर रोक रहेगी। मनन मिश्रा का कहना था कि जो कानून का छात्र मुख्य न्यायाधीश का सम्मान नहीं करता, उससे एक जिम्मेदार वकील, शिक्षक या न्यायाधीश बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती और ऐसे लोग कानूनी पेशे पर बोझ साबित होंगे।
विरोध के सुर: कानूनी हलकों से लेकर सोशल मीडिया तक हंगामा
बीसीआई के इस अचानक लिए गए फैसले का कानूनी बिरादरी और विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों ओर से तीखा विरोध शुरू हो गया। गौहाटी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष मृणाल चौधरी ने इस कदम को बीसीआई के अधिकार क्षेत्र से बाहर और पूरी तरह से मनमाना करार दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि बीसीआई ने किस विधिक प्रावधान के तहत यह फरमान जारी किया है, क्योंकि बिना पक्ष सुने पूरे बैच को दोषी ठहराना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
इसी क्रम में 13 अगस्त को नालसार के कुलपति प्रोफेसर श्रीकृष्ण देव राव ने भी स्पष्ट किया कि बीसीआई की मांग पर कार्रवाई करने से पहले विश्वविद्यालय यह कानूनी जांच करेगा कि क्या बीसीआई को ऐसी जांच मांगने का विधिक अधिकार है या नहीं, और उसके बाद ही कोई जवाब भेजा जाएगा। दूसरी ओर, सोशल मीडिया मंच एक्स पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों ने बीसीआई और मनन मिश्रा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सीजीपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने शाम 7:34 बजे और 8:29 बजे पोस्ट करके बीसीआई प्रमुख पर राजनीतिक दबाव में काम करने का आरोप लगाया। इसके बाद सीजीपी प्रवक्ता सौरव दास ने चेतावनी जारी की कि यदि यह आदेश तुरंत वापस नहीं लिया गया तो देश भर के कानून छात्र, वकील और नागरिक बीसीआई कार्यालय और मनन मिश्रा के आवास का घेराव करेंगे।
बैकफुट पर मनन मिश्रा: आधी रात को वापस लेना पड़ा फैसला
चौतरफा बढ़ते दबाव और विरोध प्रदर्शन की चेतावनियों के बीच 13 अगस्त की रात बार काउंसिल ऑफ इंडिया के रुख में तेजी से बदलाव देखने को मिला। रात लगभग 8:45 बजे मनन मिश्रा ने एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए अपने आदेश में संशोधन की जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि नालसार के 2026 बैच के छात्र अब अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में नामांकन के लिए पात्र होंगे, हालांकि तथ्यों की जांच जारी रहेगी और किसी भी निर्दोष छात्र का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।
लेकिन विरोध कर रहे पक्ष इस आंशिक ढील से संतुष्ट नहीं हुए। सीजीपी प्रवक्ता सौरव दास ने स्पष्ट किया कि जांच का आदेश बरकरार रखना भी गलत है और बीसीआई को पूरा फैसला रद्द करना होगा, अन्यथा प्रदर्शन जारी रहेगा। रात 9:50 बजे अभिजीत दीपके ने मनन मिश्रा के इस्तीफे की मांग करते हुए पोस्ट किया। इसके बाद स्थिति की गंभीरता को देखते हुए देर रात 12:37 बजे मनन मिश्रा ने एक नया बयान जारी कर अपने फैसले को पूरी तरह वापस लेने की घोषणा कर दी। उन्होंने लिखा कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं, बार सदस्यों और छात्रों की प्रतिक्रियाओं पर विचार करने और यह आश्वस्त होने के बाद कि 2026 बैच के छात्रों का किसी उपद्रव में हाथ नहीं था, बीसीआई ने इस कार्रवाई को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया है। 14 अगस्त की सुबह मनन मिश्रा ने मीडिया के सामने यह भी कहा कि उनका और सीजीपी नेताओं का उद्देश्य देश के युवाओं के अधिकारों की रक्षा करना ही है।
कौन हैं मनन मिश्रा? बिहार से लेकर राज्यसभा और बीसीआई तक का सफर
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में रहे मनन मिश्रा देश की विधिक प्रणाली की एक प्रमुख हस्ती हैं। वह वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता होने के साथ-साथ बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2024 में वे बिहार से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रत्याशी के रूप में उच्च सदन यानी राज्यसभा के लिए मनोनीत हुए हैं।
मूल रूप से बिहार के गोपालगंज जिले के रहने वाले मनन मिश्रा ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा बिहार में ही प्राप्त की। उन्होंने छपरा स्थित राजेंद्र कॉलेज से बी.एससी (ऑनर्स) की डिग्री हासिल की और उसके बाद पटना लॉ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1982 तक गोपालगंज सिविल कोर्ट में वकालत करने के बाद वे पटना हाईकोर्ट चले गए और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपनी सेवाएं देने लगे। राजनीतिक जीवन में उन्होंने 2010 का बिहार विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था, हालांकि उसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद का कार्यकाल दो वर्षों का होता है। मनन मिश्रा पहली बार 2014 में बीसीआई के अध्यक्ष चुने गए थे और तब से लगातार वे इस पद पर बने हुए हैं।
अधिकार क्षेत्र और कानूनी पहलू: क्या बीसीआई के पास था यह अधिकार?
इस पूरे विवाद ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया, राज्य बार काउंसिलों और विधि विश्वविद्यालयों के बीच के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों पर एक नई बहस छेड़ दी है। अधिवक्ताओं से जुड़े कानून यानी एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 7 के तहत बीसीआई को देश में कानूनी शिक्षा के मानक तय करने, विश्वविद्यालयों की लॉ डिग्रियों को मान्यता देने और राज्य बार काउंसिलों के नियमन का अधिकार प्राप्त है।
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एडवोकेट्स एक्ट के किसी भी प्रावधान में बीसीआई को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वह किसी विश्वविद्यालय के परिसर में छात्रों की गतिविधियों या विरोध प्रदर्शनों के आधार पर उनके बार नामांकन पर रोक लगा सके। राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के पूर्व निदेशक प्रोफेसर जी. मोहन गोपाल के अनुसार, विश्वविद्यालय परिसर के भीतर का अनुशासन संस्थान का आंतरिक विषय है जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन को अपने स्तर पर सुलझाना चाहिए था। बीसीआई द्वारा सीधे हस्तक्षेप कर छात्रों के करियर पर रोक लगाना विधिक मर्यादाओं के विपरीत था, जिसे अंततः वापस लेना ही पड़ा।



















