हाल ही में लॉरेंस बिश्नोई का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार मामला किसी फिल्मी हस्ती की हत्या से नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई से जुड़ा है। अमेरिका ने ऑपरेशन हार्ड बॉल की घोषणा की है, जिसे भारत से जुड़े संगठित अपराध के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई बताया जा रहा है। कुल 37 लोगों पर तीन संघीय अभियोगों (federal indictments) के तहत आरोप लगाए गए हैं, जिनमें लॉरेंस बिश्नोई और उसके करीबी सहयोगी गोल्डी बराड़ का नाम भी शामिल है। पिछले एक दशक का अधिकांश समय जेल में बिताने वाला यह व्यक्ति आखिर कैसे भारत के सबसे प्रभावशाली अपराधी नेटवर्क का चेहरा बन गया? आइए जानते हैं इस कहानी की गहराई।
जेल बना मुख्यालय
आमतौर पर जेल का मकसद अपराधी को बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट देना होता है, लेकिन जांच एजेंसियों का आरोप है कि लॉरेंस बिश्नोई के मामले में ऐसा नहीं हुआ। 2015 में अपनी पहली गिरफ्तारी के बाद से, वह दिल्ली की तिहाड़ जेल और गुजरात की साबरमती सेंट्रल जेल समेत कई जेलों में बंद रहा है। बावजूद इसके, भारत और अब अमेरिका में भी जांच एजेंसियां यह दावा कर रही हैं कि उसकी सलाखों के पीछे रहने के दौरान ही उसका नेटवर्क और अधिक फैला। अमेरिकी अभियोग में एक चौंकाने वाला विवरण सामने आया है। इसमें आरोप है कि लॉरेंस बिश्नोई प्रतिबंधित मोबाइल फोन और इंटरनेट-आधारित कॉलिंग सेवाओं का उपयोग करके अपने सेल से ही आपराधिक गतिविधियों का संचालन करता था। भारतीय एजेंसियां भी इस बात की जांच कर रही हैं कि कैसे अवैध फोन और बिचौलियों का इस्तेमाल करके नेटवर्क को सक्रिय रखा गया, जिसके चलते उसे बार-बार जेल बदला गया और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। अदालती कार्यवाही में क्या साबित होगा, यह भविष्य की बात है, लेकिन यह निर्विवाद है कि जेल की दीवारें उसे एक चर्चित नाम बनने से रोकने में नाकाम रहीं।
कैंपस से शुरू हुई अपराध की यात्रा
लॉरेंस बिश्नोई की शुरुआत एक खूंखार गैंगस्टर के तौर पर नहीं हुई थी। पंजाब के फाजिल्का जिले में जन्मे इस व्यक्ति ने चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में कदम रखा। उस दौरान वह कैंपस चुनावों में सक्रिय रहा और एक मुखर छात्र नेता के रूप में अपनी छवि बनाई। पुलिस के रिकॉर्ड बताते हैं कि उसके खिलाफ पहला आपराधिक मामला उसी दौर में दर्ज हुआ था, जिसका संबंध कैंपस की गुटबाजी से था। छोटी-मोटी स्थानीय झड़पें धीरे-धीरे गंभीर अपराधों में बदलने लगीं। पिछले दशक के मध्य तक, जांचकर्ताओं के अनुसार, वह यूनिवर्सिटी की राजनीति से आगे बढ़कर संगठित अपराध की दुनिया में पूरी तरह प्रवेश कर चुका था। यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ, लेकिन इसके परिणाम बेहद भयावह थे।
लॉरेंस बिश्नोई नाम का खौफ
वर्षों से जांचकर्ताओं ने लॉरेंस बिश्नोई नेटवर्क को जबरन वसूली (extortion), कारोबारियों, गायकों और सार्वजनिक हस्तियों को धमकी देने और कई हाई-प्रोफाइल अपराधों से जोड़ा है। कई बार हिंसा की घटनाएं हुईं, तो कई बार सिर्फ चेतावनी ही पर्याप्त साबित हुई। सिद्धू मूसे वाला की हत्या की जिम्मेदारी गोल्डी बराड़ ने ली थी, जबकि भारतीय जांचकर्ताओं ने यह आरोप लगाया कि इस हत्या की साजिश लॉरेंस बिश्नोई के नेटवर्क द्वारा रची गई थी। हर एक मामले ने इस नाम को और बड़ा कर दिया और हर सुर्खियां उसकी कहानी में एक नया अध्याय जोड़ती गईं। सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें व्यापक रूप से प्रसारित होती हैं, फैन पेज उसका महिमामंडन करते हैं और गानों में उसके नाम का जिक्र होता है।
देशों की सीमाएं लांघता नेटवर्क
सालों तक लॉरेंस बिश्नोई को केवल एक भारतीय गैंगस्टर माना जाता था, लेकिन आज जांच एजेंसियां इसे कहीं अधिक विशाल परिप्रेक्ष्य में देख रही हैं। ऑपरेशन हार्ड बॉल के तहत यह दावा किया गया है कि उसका नेटवर्क भारत, उत्तरी अमेरिका और यूरोप तक फैला हुआ है। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, उन्होंने कई वर्षों तक रैकेट चलाने, लक्षित हत्याओं, जबरन वसूली, नशीली दवाओं की तस्करी, अपहरण और मानव तस्करी की जांच की है, जिसमें लॉरेंस बिश्नोई सिंडिकेट को अभियोगों के केंद्र में रखा गया है। एक अभियोग में आरोप है कि लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ ने कनाडा में खालिस्तानी कार्यकर्ता हरदीप सिंह निज्जर की 2023 में हुई हत्या का आदेश दिया था। हालांकि, यह अभियोग भारतीय सरकार पर किसी भी तरह की संलिप्तता का आरोप नहीं लगाता, बल्कि पूरा ध्यान कथित आपराधिक नेटवर्क पर केंद्रित है।
जेल के भीतर से नियंत्रण
लॉरेंस बिश्नोई जेल के अंदर से अपना अपराध का जाल बिछाने वाला इकलौता गैंगस्टर नहीं है। पुलिस ने बार-बार यह आरोप लगाया है कि मुख्तार अंसारी ने जेल में बंद रहकर भी अपने विश्वासपात्र सहयोगियों के माध्यम से सिंडिकेट पर प्रभाव बनाए रखा, धमकी दी और जबरन वसूली के रैकेट चलाए। इन आरोपों के चलते उसे बार-बार जेल ट्रांसफर किया गया और सुरक्षा बढ़ाई गई। अतीक अहमद की कहानी भी कुछ इसी तरह की रही है। इसके अलावा छोटा राजन का नाम भी आता है। भले ही छोटा राजन के इर्द-गिर्द सुरक्षा अत्यंत कड़ी रही हो, लेकिन जांचकर्ताओं ने हमेशा उसके नेटवर्क को एक ऐसी संस्था के रूप में देखा है जो व्यक्ति से ऊपर उठकर कार्य करती है, जहां उसके गिरफ्तारी के बाद भी वफादार सहयोगी अपना काम जारी रखते हैं।
गैंगस्टर और उनके उपनाम
प्रत्येक खूंखार गैंगस्टर अंततः एक दूसरी पहचान हासिल कर लेता है। ये उपनाम किसी व्यक्ति की पहचान बताने से कहीं अधिक काम करते हैं। वे शक्ति की ऐसी छवि गढ़ते हैं जो अक्सर व्यक्ति के खुद से कहीं ज्यादा दूर तक फैल जाती है। यह घटनाक्रम केवल भारत तक सीमित नहीं है। पाब्लो एस्कोबार की जेल, जिसे ला कैथेड्रल कहा जाता था, उसमें फुटबॉल का मैदान, एक बार और निजी क्वार्टर मौजूद थे। कोलंबियाई अधिकारियों ने बाद में आरोप लगाया था कि एस्कोबार 1992 में जेल से भागने तक सुविधा के अंदर से ही अपना मेडलिन कार्टेल चलाता रहा और हत्याओं का आदेश देता रहा। देश अलग हैं, जेलें अलग हैं, लेकिन चुनौती वही है। किसी अपराधी को सलाखों के पीछे डालना एक लड़ाई है, लेकिन उसके इर्द-गिर्द बने नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करना अक्सर कहीं अधिक कठिन कार्य साबित होता है।











