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भारत में खुदकुशी करने वालों में 75 फीसदी पुरुष: कर्ज और पारिवारिक तनाव ने क्यों बढ़ाई चिंता?पड़ताल
11 जुल॰ 2026, 6:39 am (45 दिन पहले)· 1

भारत में खुदकुशी करने वालों में 75 फीसदी पुरुष: कर्ज और पारिवारिक तनाव ने क्यों बढ़ाई चिंता?

देश के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, आत्महत्या करने वाले चार में से तीन लोग पुरुष हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों और अपेक्षाओं के बीच पुरुष मानसिक स्वास्थ्य के संकट से जूझ रहे हैं।

जयपुर में एक 25 वर्षीय नर्स ने नौकरी जाने के बाद जान दे दी, जिससे पूरे राजस्थान में विरोध प्रदर्शन हुए। वहीं, मध्य प्रदेश में डिजिटल लोन ऐप के एजेंटों की प्रताड़ना से तंग आकर एक बीटेक के अंतिम वर्ष के छात्र ने खुदकुशी कर ली। उत्तर प्रदेश की एक और दर्दनाक घटना में एक मिस्त्री ने अपनी बेटी की शादी के कुछ घंटे बाद ही जान दे दी, क्योंकि वह कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था। ये घटनाएं कोई अपवाद नहीं हैं, बल्कि भारत में बढ़ते उस संकट की बानगी हैं जहां आत्महत्या करने वाले चार लोगों में से लगभग तीन पुरुष हैं। अब समय आ गया है कि इस विषय पर केवल विशिष्ट समूहों की बात करने के बजाय यह समझा जाए कि पिछले दशक में भारतीय पुरुषों के जीवन में आखिर क्या बदल गया है।

पुरुषों में आत्महत्या का बढ़ता ग्राफ और कारण

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि आत्महत्या के पीछे कई कारण होते हैं, लेकिन पारिवारिक समस्याएं और बीमारियां सबसे प्रमुख हैं। ये दोनों कारक अकेले ही भारत में होने वाली कुल खुदकुशी के मामलों में से लगभग आधे के लिए जिम्मेदार हैं। इसके अतिरिक्त, वित्तीय दबाव, कर्ज, नशे की लत और आपसी संबंधों में टकराव भी लगातार सामने आ रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह दबाव रातों-रात पैदा नहीं होता, बल्कि महीनों या वर्षों तक लगातार जमा होता रहता है। दुखद यह है कि महिलाएं जिस तरह अवसाद या चिंता के लिए पेशेवर मदद ले लेती हैं, पुरुष अक्सर वैसा नहीं कर पाते।

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क्या नौकरीपेशा पुरुष अधिक असुरक्षित हैं?

यह सोचना गलत है कि नौकरी होने का मतलब भावनात्मक रूप से पूरी तरह सुरक्षित होना है। नवीनतम NCRB डेटा साफ दर्शाता है कि आत्महत्या करने वालों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जो काम कर रहे थे। बढ़ता पारिवारिक खर्च, कर्ज, नौकरी जाने का डर, ड्यूटी के लंबे घंटे और परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य होने का बोझ पुरुषों को अंदर से खोखला कर रहा है। भारत में आत्महत्या करने वाले लोगों में दैनिक वेतन भोगी सबसे बड़ा व्यावसायिक वर्ग है। इसके अलावा, स्वरोजगार करने वाले और वेतनभोगी कर्मचारी भी हर साल हजारों की संख्या में इस लिस्ट में शामिल होते हैं। वित्तीय तनाव अक्सर अकेले नहीं आता, बल्कि यह पारिवारिक झगड़ों और मानसिक अस्वस्थता जैसी समस्याओं के साथ मिलकर गहरा संकट पैदा करता है।

विवाहित पुरुषों में बढ़ते मामले

विवाह का मतलब केवल एक कानूनी रिश्ता नहीं है, बल्कि यह कई प्रकार के दबावों को एक साथ लाता है। 2015 से नवीनतम NCRB आंकड़ों के बीच पुरुषों में विवाह-संबंधी आत्महत्याओं की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। इस श्रेणी में तलाक, शादी तय न होना, विवाहेतर संबंध और दहेज से जुड़े विवाद शामिल हैं। अक्सर संबंध टूटने की स्थिति में वित्तीय तनाव या मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी जुड़ जाता है, जो हालात को बदतर बना देता है।

भावनात्मक अलगाव और मदद न मांगना

अकेलेपन का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि कोई व्यक्ति किसी के साथ नहीं है। एक आदमी के पास अच्छी नौकरी, परिवार और दोस्त हो सकते हैं, फिर भी वह खुद को आइसोलेट महसूस कर सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय लड़कों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि उन्हें अपनी भावनाएं छिपानी चाहिए और हर समस्या का समाधान खुद ही खोजना चाहिए। अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों का भावनात्मक सपोर्ट नेटवर्क बहुत छोटा होता है। कई पुरुष भावनात्मक जरूरतों के लिए केवल अपनी पत्नी पर निर्भर रहते हैं, जिससे यदि उस रिश्ते में तनाव आता है, तो वे पूरी तरह टूट जाते हैं। जल्दी और खुलकर बात करने की पहल करने से इस भावनात्मक बोझ को कम किया जा सकता है।

क्या बदलता समाज पुरुषों के लिए चुनौती है?

पिछले एक दशक में भारतीय समाज में बड़े बदलाव आए हैं। अधिक महिलाएं उच्च शिक्षा ले रही हैं, कार्यबल में शामिल हो रही हैं और स्वतंत्र निर्णय ले रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन अनुपात अब पुरुषों से अधिक हो गया है। आज महिलाएं सेना से लेकर विमानन जैसे उन क्षेत्रों में भी आगे हैं जो पहले पुरुषों के दबदबे वाले माने जाते थे। कानून भी संपत्ति के अधिकार और तलाक जैसे मामलों में समानता सुनिश्चित कर रहे हैं। समस्या तब आती है जब बहुत से लड़के यह मानकर पले-बढ़े होते हैं कि उन्हें ही परिवार का मुख्य रक्षक और निर्णय लेने वाला बनना है। जब ये पारंपरिक उम्मीदें आधुनिक और समान साझेदारी से टकराती हैं, तो कुछ पुरुष सामंजस्य बिठाने में संघर्ष करते हैं। अपनी जिम्मेदारी साझा करने के बजाय वे इसे विफलता या निराशा के रूप में देखते हैं। हालांकि यह हर आत्महत्या का कारण नहीं है, लेकिन यह एक ऐसा सामाजिक बदलाव है जिस पर ध्यान देना आवश्यक है।

सवाल-जवाब

भारत में आत्महत्या करने वालों में पुरुषों का अनुपात कितना है?
नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत में आत्महत्या करने वाले चार में से तीन लोग पुरुष हैं।
पुरुषों में खुदकुशी का सबसे प्रमुख कारण क्या है?
NCRB रिकॉर्ड के मुताबिक, पारिवारिक समस्याएं और बीमारियां आत्महत्या के सबसे बड़े कारण हैं।
क्या नौकरी वाले पुरुष भी खतरे में हैं?
हां, नवीनतम डेटा से पता चलता है कि आत्महत्या करने वालों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जो काम कर रहे थे।
पुरुष अक्सर मदद मांगने से क्यों कतराते हैं?
पुरुषों को अक्सर अपनी भावनाएं छिपाने और खुद ही समस्याओं को हल करने की परवरिश मिलती है, जिससे वे पेशेवर मदद लेने में झिझकते हैं।
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