6 जुलाई को होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजर रहे तीन वाणिज्यिक जहाजों पर ईरान द्वारा किए गए हमले ने अमेरिका और ईरान के बीच हालिया शांति प्रयासों को एक बार फिर संकट में डाल दिया है। इस हमले के अगले ही दिन, अमेरिकी सेना ने ईरान के 80 से अधिक ठिकानों पर बमबारी की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उनकी नजर में अब शांति समझौता समाप्त हो चुका है। जवाब में ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए जवाबी हमले किए हैं। इस तनाव के पीछे के कारण और भविष्य के खतरों को समझना आवश्यक है।
शांति समझौते के प्रमुख बिंदु
17 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के बीच 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें 60 दिनों के भीतर एक अंतिम समझौते पर पहुंचने का लक्ष्य था। इसके तीन सबसे महत्वपूर्ण पहलू थे:
- होरमुज़ जलडमरूमध्य में निर्बाध आवाजाही: ईरान ने 60 दिनों तक वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने और कोई शुल्क न लेने का वादा किया था। ओमान के साथ मिलकर इस व्यवस्था को लागू किया जाना था, और मुख्य शिपिंग मार्ग से बारूदी सुरंगों को 30 दिनों में हटाने की बात थी।
- 30 करोड़ डॉलर का आर्थिक पैकेज: अमेरिका और खाड़ी देशों ने ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 30 करोड़ डॉलर का आर्थिक पैकेज देने पर सहमति जताई थी।
- परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत: ईरान ने नए परमाणु हथियार विकसित न करने पर हामी भरी थी और संवर्धित यूरेनियम के भंडार के भविष्य पर फ्रेमवर्क बनाने के लिए सहमति बनी थी।
समझौते के बावजूद ईरान का हमला क्यों?
ईरान द्वारा होरमुज़ पर अपना नियंत्रण खोने का डर इस हमले के पीछे का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। तेहरान ने एक नया शिपिंग मार्ग निर्धारित किया था जो ईरानी तट के करीब था और उसने 'होरमुज़ ट्रांजिट अथॉरिटी' के माध्यम से जहाजों के पंजीकरण की शर्त रखी थी, जिससे भविष्य में ट्रांजिट शुल्क वसूला जा सके। 24 जून को ओमान द्वारा वैकल्पिक मार्ग की घोषणा ने ईरान को नाराज कर दिया। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जहाजों को केवल ईरानी गलियारे का उपयोग करने की चेतावनी दी थी। केपलर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार, होरमुज़ से गुजरने वाले जहाजों की दैनिक संख्या 100 से घटकर अब 30-40 रह गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनान-इजराइल के बीच अमेरिका द्वारा मध्यस्थता और ईरान के लिए पुनर्निर्माण पैकेज में कमी ने भी ईरान को भड़काया। प्रोफेसर वली नस्र के अनुसार, ईरान को लगने लगा था कि यह समझौता उनके प्रभाव को कम करने की एक चाल है। हमले का उद्देश्य अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना था। अटलांटिक काउंसिल के नेट स्वानसन ने इसे दबाव की रणनीति बताया है, जबकि चैथम हाउस की सनम वकील का मानना है कि ईरान अपनी ही स्थिति कमजोर कर रहा है।
अमेरिका की कड़ी प्रतिक्रिया के पीछे के कारण
होरमुज़ एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है और अमेरिका 'फ्रीडम ऑफ नेविगेशन प्रोग्राम' के तहत इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेता है। दुनिया का लगभग 52% कच्चा तेल इसी तरह के सात प्रमुख चोकपॉइंट्स से गुजरता है। अमेरिका को डर है कि यदि ईरान ने होरमुज़ में शुल्क वसूला, तो वैश्विक समुद्री व्यापार पर नकारात्मक असर पड़ेगा। 2026 में इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुरबाया युधि सदेवा द्वारा मलक्का जलडमरूमध्य में टोल लगाने के सुझाव ने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी थी।
समझौते की विफलता और भविष्य की अनिश्चितता
विशेषज्ञ मार्क चैंपियन का कहना है कि यह समझौता स्पष्ट नहीं था और इसमें मुख्य समस्याओं को नजरअंदाज किया गया था। अमेरिका ने ईरान के तेल पर से प्रतिबंध 60 दिनों के लिए हटाए थे, लेकिन 20 दिनों के भीतर अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने राहत वापस ले ली। जॉन बी. ऑल्टरमैन का तर्क है कि दोनों पक्ष केवल लड़ाई रोकने पर सहमत थे, परमाणु कार्यक्रम या प्रतिबंधों जैसे मूल मुद्दों पर नहीं। 8 जुलाई को तुर्की में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से आक्रामक रुख अपनाते हुए कड़े हमलों के संकेत दिए। अब या तो यह संघर्ष और बढ़ेगा या फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में नई बातचीत का दौर शुरू होगा, हालांकि गहरा अविश्वास अभी भी कायम है।











