भोटेकोशी में आई अचानक बाढ़ के बाद जलविद्युत परियोजनाओं के सैकड़ों मजदूर या तो फंस गए हैं या लापता बताए जा रहे हैं। इनमें से कई लोगों के सुरंगों और पावरहाउस के भीतर फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि लापता लोगों की सटीक संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आ रहे हैं। आईपीपीएएन ने शुरुआती रिपोर्ट में 11 जलविद्युत परियोजनाओं से 897 मजदूरों के लापता होने की बात कही थी, जबकि एनडीआरआरएमए ने यह आंकड़ा 933 बताया और द काठमांडू पोस्ट ने इसे 934 दर्ज किया।
नेपाल ने क्यों बदली विदेशी मदद को लेकर अपनी नीति
शुरुआती दौर में नेपाल ने विदेशी बचाव दलों की मदद लेने से इनकार कर दिया था। रेडियो नेपाल के अनुसार 27 अगस्त को नेपाल ने कहा था कि उसकी अपनी सुरक्षा एजेंसियां खोज और बचाव अभियान संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं और इस स्तर पर उसे बाहरी मदद की कोई आवश्यकता नहीं है। रॉयटर्स ने नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री के हवाले से बताया था कि सुरक्षा बल खुद मोर्चा संभाल रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे आपदा का दायरा और जटिलता बढ़ती गई, सरकार ने अपनी रणनीति पर दोबारा विचार किया।
इसके बाद 28 अगस्त को नेपाल सरकार ने सुरंगों से जुड़े बचाव कार्यों, डीएनए जांच और फॉरेंसिक काम के लिए विदेशी विशेषज्ञों की मदद स्वीकार करने का निर्णय लिया। इसका मतलब यह नहीं था कि नेपाल ने अपना बचाव अभियान विदेशी टीमों को सौंप दिया, बल्कि देश की अपनी टीमें मुख्य रूप से अभियान का नेतृत्व करती रहीं और सबसे कठिन तकनीकी हिस्सों के लिए बाहरी विशेषज्ञता का सहारा लिया गया।
त्रिशूल-3ए और त्रिशूल-3बी सुरंगों के भीतर का हालात
बाढ़ का असर केवल सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रसुवा और आसपास के जिलों में कई जलविद्युत परियोजनाएं भी इसकी चपेट में आ गईं। जब यह आपदा आई, तब कई मजदूर सुरंगों और अन्य निर्माण स्थलों के अंदर ही थे। नेपाली सेना की टीमों ने तुरंत बचाव अभियान शुरू किया और सैकड़ों लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला। नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 29 अगस्त तक त्रिशूल-III जलविद्युत परियोजना की सुरंग से 43 विदेशी नागरिकों समेत कुल 208 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया। बचाए गए विदेशियों में 38 चीनी और पांच भारतीय नागरिक शामिल थे।
हालांकि सुरंगों के कुछ हिस्से अब तक पूरी तरह पहुंच से बाहर बने हुए हैं। नेपाल पर्वतारोहण संघ (एनएमए) के मुताबिक टनल नंबर 1, 2 और 3 में उतारी गई बचाव टीमें आगे नहीं बढ़ सकीं क्योंकि अंदर के हालात बेहद खतरनाक और तकनीकी रूप से कठिन थे। भारी मात्रा में मिट्टी और पानी भरे होने के कारण बचाव कर्मियों के लिए सुरंग के गहरे हिस्सों में उतरना असंभव हो गया था।
भूमिगत रेस्क्यू अभियान की मुख्य चुनौतियां
अपर त्रिशूल-3ए परियोजना स्थल पर नेपाली सेना ने तीन दिन की कड़ी मेहनत के बाद सुरंग के सबसे ऊपरी हिस्से यानी क्राउन हेड तक पहुंचने में सफलता हासिल की। ड्रिलिंग मशीनों, एक्सकेवेटर और हाइड्रोलिक कटर की मदद से एक सुराग बनाया गया, जहां लगभग 7 मीटर चौड़ा पानी से भरा क्षेत्र मिला। इसके बाद अंदर बचाव कर्मियों को भेजा गया लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला। अधिकारियों का अनुमान है कि अभी भी कम से कम 35 लोग वहां फंसे हो सकते हैं। टीमों द्वारा भारी मशीनों, नियंत्रित धमाकों और अतिरिक्त ड्रिलिंग का उपयोग करके रास्ते को चौड़ा किया जा रहा है।
वहीं त्रिशूल-3बी परियोजना में 201 लोगों का अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है और उनके भी सुरंग में फंसे होने की आशंका है। इनमें 21 परियोजना कर्मचारी, 7 परिवार के सदस्य, 12 कंसल्टेंट, 6 ठेकेदार कर्मी, काठमांडू यूनिवर्सिटी के 3 इंटर्न, 151 मजदूर और 1 सुरक्षा गार्ड शामिल हैं। एक नाम न छापने की शर्त पर नेपाल आधारित आपदा प्रतिक्रिया विशेषज्ञ ने बताया कि देश की कठिन भौगोलिक बनावट और मौसमी परिस्थितियां ऐसे अभियानों को बेहद चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। सुरंगों के भीतर राहत कार्य करना बहुत संवेदनशील होता है क्योंकि बचाव कर्मियों को बेहद संकीर्ण और संभावित रूप से अस्थिर परिस्थितियों में काम करना पड़ता है.
सुरंग के भीतर फंसे लोगों को तलाशने में कौन सी तकनीक मददगार है
जटिल और कठिन भूमिगत बचाव अभियानों के लिए केवल पारंपरिक तरीकों से काम नहीं चलता, बल्कि उन्नत तकनीक की आवश्यकता होती है। मलबे के पीछे हलचल या जीवन के संकेतों का पता लगाने वाले सेंसर, और जमीन के नीचे गर्मी के संकेतों को पहचानने वाले थर्मल कैमरे इस काम में अहम भूमिका निभाते हैं। चीन ने भी इस अभियान के लिए थर्मल कैमरे उपलब्ध कराए हैं। इसके अलावा अवरुद्ध हिस्सों का निरीक्षण करने के लिए संकीर्ण रास्तों से छोटी कैमरों को अंदर डाला जाता है। त्रिशूल परियोजना स्थल पर बचाव कर्मियों ने पहले ही हवा पहुंचाने की तकनीक का उपयोग शुरू कर दिया है। नेपाली सेना के इंजीनियरों ने सुरंग के अंदर एक पाइप डालकर ऑक्सीजन की आपूर्ति शुरू कर दी है।
सुरंग बचाव कार्य आमतौर पर एक निश्चित चरणबद्ध प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ते हैं। सबसे पहले इंजीनियर यह आकलन करते हैं कि ढांचा अंदर जाने के लिए सुरक्षित है या नहीं। इसके बाद शुरुआती छेद बनाकर हवा की आपूर्ति बहाल की जाती है। थर्मल कैमरों और सेंसर की मदद से जीवित बचे लोगों को खोजा जाता है, और फिर पंपों तथा खुदाई के उपकरणों से पानी और मलबे को बाहर निकाला जाता है। अंत में सुरक्षित रास्ता बनाकर लोगों को बाहर निकाला जाता है और उन्हें चिकित्सा सहायता दी जाती है।
भारत और चीन की विशेष सहायता टीमों की भूमिका
भारत ने बाढ़ प्रभावित जलविद्युत सुरंगों के लिए खोज और बचाव उपकरणों के साथ टनल विशेषज्ञों का एक विशेष तकनीकी दस्ता नेपाल भेजा है। इसके अलावा बरामद किए गए पीड़ितों की पहचान में मदद के लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञों और डीएनए विश्लेषण उपकरणों की एक अलग टीम भी भेजी गई है। भारत ने त्रिशूल-3ए परियोजना पर चल रहे राहत कार्य में सहायता के लिए 11 सदस्यीय विशेष तकनीकी दल तैनात किया है। भारत के पास उत्तराखंड में नवंबर 2023 में हुए सिल्कयारा सुरंग बचाव अभियान का अनुभव है, जहां 41 मजदूर 17 दिनों तक अंदर फंसे रहे थे और जिन्हें सुरक्षित बाहर निकाला गया था।
दूसरी तरफ नेपाल इस संकट से निपटने के लिए चीनी विशेषज्ञ दलों के साथ भी समन्वय कर रहा है। अपर त्रिशूल-3बी परियोजना पर बचाव कार्य में सहायता के लिए छह सदस्यीय चीनी तकनीकी विशेषज्ञों की टीम तैनात की गई है। चीन थर्मल कैमरों, ड्रिलिंग और एयर-पंपिंग उपकरणों जैसी तकनीकी मशीनरी भी मुहैया करा रहा है। चीनी विशेषज्ञ सुरंग की स्थिति का आकलन करने और सुरक्षित रास्तों की पहचान करने में मदद कर रहे हैं।
नेपाल के लिए भविष्य की बड़ी चुनौतियां
त्रिशूल की यह घटना नेपाल के सामने आने वाली भविष्य की बड़ी चुनौतियों को उजागर करती है। जैसे-जैसे देश में अधिक जलविद्युत परियोजनाओं और पर्वतीय बुनियादी ढांचे का विकास हो रहा है, आपदा संभावित क्षेत्रों में सुरंगों के भीतर काम करने वाले मजदूरों की संख्या भी बढ़ेगी। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, भूस्खलन और हिमनद झीलों के फटने का खतरा लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल को विशेष सुरंग-बचाह उपकरणों, प्रशिक्षित टीमों और बेहतर आपातकालीन योजना की सख्त जरूरत है।



















