राजस्थान के टोंक में नगर परिषद के परिसीमन के फैसले के खिलाफ डारडाहिंद गांव का विरोध प्रदर्शन अब चुनाव के पूर्ण बहिष्कार के रूप में सामने आ चुका है। गांव को नगर परिषद के दायरे में लाकर वार्ड नंबर 2 बनाए जाने से स्थानीय निवासी बेहद खफा हैं और उन्होंने वोट डालने से साफ इंकार कर दिया है। पिछले करीब 18 महीनों से इस बात को लेकर नाराजगी जताई जा रही है कि उनके ग्रामीण इलाके को शहरी निकाय में क्यों जोड़ा गया है। जैसे ही नामांकन प्रक्रिया शुरू होने का समय आया, प्रशासनिक अमला डारडाहिंद गांव पहुंचा ताकि लोगों को समझा-बुझाकर मनाया जा सके, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार की सहमति नहीं बन पाई। ग्रामीणों का साफ कहना है कि उन्हें नगर परिषद नहीं बल्कि अपनी पुरानी ग्राम पंचायत वापस चाहिए और उन्होंने सिर्फ इस निकाय चुनाव ही नहीं बल्कि भविष्य में होने वाले हर चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया है। गांव की मुख्य जगहों पर मतदान के बहिष्कार को लेकर बड़े-बड़े पोस्टर भी चस्पा कर दिए गए हैं।
प्रशासन की समझाइश और अधिकारियों के प्रयास
डारडाहिंद गांव के लोगों को मनाने की जिम्मेदारी संभालते हुए टोंक की एसडीएम सीमा खेतान, तहसीलदार अजित पाल सिंह यादव और भारी पुलिस बल के साथ प्रशासनिक टीम मौके पर पहुंची। अधिकारियों ने ग्रामीणों से अपील की कि वे लोकतंत्र के इस महापर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपने मताधिकार का प्रयोग करें। प्रशासन की तरफ से ग्रामीणों को यह भी समझाने का प्रयास किया गया कि नगर परिषद का हिस्सा बनने के बाद उन्हें किस तरह के कानूनी और प्रशासनिक लाभ मिल सकते हैं। हालांकि, इन तमाम दलीलों और अपील का ग्रामीणों पर कोई असर नहीं हुआ और वे अपनी जिद पर डटे रहे। ग्रामीणों ने अधिकारियों के सामने अपनी मुख्य मांग फिर दोहराई कि उनके गांव को दोबारा से ग्राम पंचायत का दर्जा दिया जाए। उनका तर्क है कि डारडाहिंद की बहुसंख्यक आबादी अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से खेती और पशुपालन पर निर्भर है, इसलिए इसे शहरी निकाय में शामिल करने का कोई तुक नहीं बनता है। ग्रामीणों का यह भी मानना है कि ग्राम पंचायत के समय उन्हें स्थानीय स्तर पर और रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए जो सहूलियतें मिलती थीं, वे अब छिन गई हैं।
गांव को गांव ही रहने दो का नारा और योजनाएं बंद होने का दावा
गांव के लोगों ने विरोध जताने के लिए जो पोस्टर लगाए हैं, उन पर स्पष्ट शब्दों में मतदान का पूर्ण बहिष्कार लिखा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और सरकार को पहले टोंक शहर को पूरी तरह से विकसित करना चाहिए और उसके बाद ही गांवों को शहर की सीमाओं में मिलाने की बात सोचनी चाहिए। उनका मुख्य नारा यही है कि गांव को गांव ही रहने दिया जाए। इसके साथ ही ग्रामीणों ने यह बड़ा आरोप भी लगाया है कि जब से उनके इलाके को नगर परिषद में शामिल किया गया है, तब से उनकी कई ग्रामीण योजनाएं और मिलने वाली सुविधाएं प्रभावित हुई हैं। उन्होंने खास तौर पर वीबी जी राम जी योजना के बंद होने का दावा करते हुए अपनी पीड़ा जाहिर की। उनका कहना है कि जब गांव की पूरी अर्थव्यवस्था कृषि और पशुपालन पर टिकी हुई है, तो ऐसे में शहरी निकाय का हिस्सा बनने से उन्हें फायदे की जगह केवल परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
वार्ड 2 से किसी भी प्रत्याशी के नहीं उतरने का ऐलान
डारडाहिंद के निवासियों ने निकाय चुनावों को लेकर अपनी रणनीति और रुख को पूरी तरह से साफ कर दिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वार्ड नंबर 2 से कोई भी व्यक्ति चुनाव के लिए टिकट नहीं लेगा और गांव का कोई भी मतदाता अपना वोट कास्ट नहीं करेगा। ग्रामीणों ने यहां तक चेतावनी दी है कि मतदान के दिन किसी भी बाहरी व्यक्ति या राजनीतिक दल के नेता को गांव की सीमा के अंदर प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। हालांकि, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यों से जुड़े सरकारी वाहनों को गांव के भीतर आने की अनुमति दी जाएगी। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान गांव के लोगों के बीच गजब की एकजुटता देखने को मिल रही है। बड़ी संख्या में ग्रामीण एक साथ इकट्ठा होकर प्रशासन के सामने अपनी बात मजबूती से रख रहे हैं और उनकी दो टूक मांग है कि जब तक उनकी ग्राम पंचायत बहाल नहीं की जाती, तब तक वे चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह से दूर रहेंगे।
प्रशासन के सामने खड़ी हुई बड़ी चुनौती
डारडाहिंद गांव के लोगों द्वारा चुनाव के बहिष्कार के इस बड़े ऐलान ने जिला प्रशासन की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं। प्रशासन की तरफ से लगातार यह कोशिश की जा रही है कि किसी तरह ग्रामीणों की नाराजगी को दूर किया जाए और उन्हें मतदान प्रक्रिया में भाग लेने के लिए तैयार किया जाए, लेकिन अब तक हुई बातचीत का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पाया है। एसडीएम सीमा खेतान और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की गई समझाइश के बाद भी ग्रामीणों ने अपने फैसले में कोई बदलाव नहीं किया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि वोटिंग की तारीख नजदीक आने से पहले प्रशासन और ग्रामीणों के बीच कोई बीच का रास्ता निकलता है या नहीं। यदि ग्रामीण अपने इस कड़े फैसले पर अडिग रहते हैं, तो मतदान के दिन डारडाहिंद गांव में चुनावी प्रक्रिया का पूरी तरह से बहिष्कार देखा जा सकता है और प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती साबित होगा।





















