जापान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार अपनी केंद्रीकृत खुफिया एजेंसी खड़ी करने जा रहा है। करीब आठ दशकों तक अलग-अलग सरकारी महकमों के भरोसे चलने के बाद अब टोक्यो एक ऐसा तंत्र बनाने में जुटा है जो देश के बाहर से आने वाले खतरों पर नजर रख सके।
लगभग 80 साल बाद आया यह बड़ा बदलाव
दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से जापान ने कभी भी खुफिया जानकारी जुटाने के लिए एक ही केंद्रीय एजेंसी नहीं बनाई। अब यह तस्वीर बदल रही है। जापान चीन, रूस और उत्तर कोरिया से बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच अपनी पहली केंद्रीकृत खुफिया एजेंसी बनाने पर काम कर रहा है। सहयोगी देशों के साथ इस पर पहले ही बातचीत शुरू हो चुकी है, जिसमें तीन बड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है, नई एजेंसी को कैसी तकनीक चाहिए, भर्ती किस तरह होगी और पूरा ढांचा कैसे काम करेगा।
वो रूसी जासूसी जो जापान अब नजरअंदाज नहीं कर सकता
इस पूरी कवायद के पीछे सबसे बड़ी वजह जापान में तेजी से फैलती रूसी जासूसी गतिविधियां हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई देशों से निकाले गए दर्जनों रूसी खुफिया एजेंट अब जापान का रुख कर चुके हैं। ये एजेंट रूस की सेना के लिए आधुनिक तकनीक और हथियारों के पुर्जे हासिल करने की कोशिश में जुटे हैं, साथ ही मॉस्को को पश्चिमी देशों की पाबंदियों से बचने का रास्ता निकालने में भी मदद कर रहे हैं। जापान का मजबूत तकनीकी उद्योग और तुलनात्मक रूप से कमजोर काउंटर-इंटेलिजेंस तंत्र, दोनों मिलकर इसे रूसी जासूसों के लिए आसान निशाना बना देते हैं। रूस की सैन्य खुफिया इकाई, जिसे 20वां डायरेक्टोरेट कहा जाता है, कथित तौर पर टोक्यो से काम कर रही है। बताया जाता है कि इसके एजेंट कारोबारी या राजनयिक बनकर सौदे करते हैं और चुपचाप ऐसी तकनीक हासिल करते हैं जिसे बाद में सैन्य इस्तेमाल के लिए रूस भेजा जा सकता है।
जापान अब तक क्यों बचता रहा
पिछले कई दशकों से जापान की खुफिया व्यवस्था जानबूझकर बंटी हुई रखी गई थी। सेना, पुलिस, राजनयिक और बाकी सरकारी विभाग अपने-अपने स्तर पर जानकारी जुटाते रहे, लेकिन इन सबको एक साथ जोड़कर पूरी तस्वीर बनाने वाली कोई एक एजेंसी कभी नहीं रही। यही बिखरा हुआ ढांचा जापान को जासूसी और विदेशी दखल के आगे कमजोर बनाता रहा है, क्योंकि किसी एक एजेंसी के पास देश के सामने मौजूद खतरों की पूरी तस्वीर कभी नहीं रही।
भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी और रक्षा विश्लेषक कर्नल जेएस सोढ़ी बताते हैं कि जापान की यह हिचकिचाहट दूसरे विश्व युद्ध के बाद के उसके इतिहास से जुड़ी है। उस दौर में यह आशंका थी कि एक ताकतवर खुफिया एजेंसी लोकतांत्रिक निगरानी को कमजोर कर सकती है और युद्ध के बाद अपनाए गए शांतिवादी सिद्धांतों के खिलाफ जा सकती है। ये आशंकाएं तोक्को की यादों से भी जुड़ी हैं, जो दूसरे विश्व युद्ध से पहले शाही जापान की गुप्त पुलिस थी और आलोचकों पर नजर रखने व उन्हें दबाने के लिए इस्तेमाल होती थी।
एजेंसी बनाने में जापान की मदद कौन कर रहा है
जापान यह नई एजेंसी अकेले नहीं बना रहा। उसके कुछ सबसे करीबी सुरक्षा साझेदार सीधे तौर पर इस योजना को आकार देने में जुटे हैं। अमेरिका ने साइबर सुरक्षा, औद्योगिक जासूसी से निपटने और जापान में विदेशी निवेश व संदिग्ध विदेशी एजेंटों पर निगरानी कड़ी करने से जुड़ा अनुभव साझा किया है। जर्मनी भी इसमें आगे आया है, उसकी विदेशी खुफिया एजेंसी बीएनडी के प्रमुख हाल ही में टोक्यो गए और प्रस्तावित एजेंसी के साथ-साथ दोनों देशों के बीच खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान को मजबूत करने पर बातचीत की। वहीं ऑस्ट्रेलिया ने जापान को तकनीक और अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने को लेकर सलाह दी है, ताकि खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान और आसान हो सके।
खुफिया एजेंसी खड़ी करना आसान काम नहीं
किसी खुफिया एजेंसी को खड़ा करना केवल जासूस भर्ती करने जितना आसान काम नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा संगठन बनाने में बरसों लग जाते हैं जो जानकारी जुटा भी सके, उसका विश्लेषण भी कर सके और उस पर असरदार कार्रवाई भी कर सके। इस राह में कई बड़ी चुनौतियां आती हैं।
सबसे पहली चुनौती है सही लोगों की भर्ती। खुफिया एजेंसियों को बेहद प्रशिक्षित अधिकारी, भाषा विशेषज्ञ, साइबर विशेषज्ञ, विश्लेषक और गुप्त तरीके से काम करने वाले एजेंट चाहिए होते हैं, और सही कौशल के साथ-साथ सख्त सुरक्षा जांच से गुजर सकने वाले लोगों को ढूंढना सबसे मुश्किल कामों में से एक है।
कर्नल सोढ़ी इसके बाद फंडिंग को दूसरी बड़ी चुनौती मानते हैं। खुफिया जानकारी जुटाना एक जटिल और संसाधनों से भरा काम है, जिसमें तकनीक, ऑपरेशन और लोगों पर लगातार निवेश करना पड़ता है। उनका कहना है कि अगर जापान इसके लिए पर्याप्त वित्तीय मदद देता है, तो उसकी नई खुफिया एजेंसी काफी असरदार बन सकती है।
लोगों और पैसे के अलावा, नई एजेंसी को प्रतिद्वंद्वी देशों की जासूसी के साथ-साथ अपने ही भीतर से पैदा होने वाले खतरों से भी बचना होगा, क्योंकि कमजोर काउंटर-इंटेलिजेंस तंत्र ऑपरेशन और सूत्रों दोनों को उजागर कर सकता है। तालमेल बिठाना भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि सैन्य, पुलिस, साइबर, राजनयिक और वित्तीय खुफिया जानकारी आमतौर पर अलग-अलग विभागों में बंटी होती है, और इन सबको तेजी से जानकारी साझा करते हुए एक इकाई की तरह काम करवाना वाकई मुश्किल है। आजकल की जासूसी का बड़ा हिस्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, साइबर नेटवर्क और अहम बुनियादी ढांचे पर केंद्रित होता जा रहा है, यानी किसी भी नई एजेंसी को इनके साथ कदमताल करने के लिए एडवांस निगरानी, साइबर सुरक्षा और डेटा विश्लेषण की क्षमता चाहिए होगी। इसके साथ ही एक कानूनी संतुलन भी साधना पड़ता है, खुफिया एजेंसियों को गुप्त तरीके से काम करने के लिए व्यापक अधिकार चाहिए होते हैं, लेकिन दुरुपयोग रोकने के लिए कानूनी निगरानी भी जरूरी है, और खासकर लोकतांत्रिक देशों को राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच सावधानी से संतुलन बनाना पड़ता है। आखिर में, यह सब अकेले नहीं हो सकता। आज की खुफिया कार्रवाई काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर टिकी होती है, और देशों को जानकारी साझा करने, साझा ऑपरेशन चलाने और साझा खतरों का मिलकर जवाब देने के लिए भरोसेमंद साझेदारों की जरूरत होती है, ठीक वैसी ही मदद अभी अमेरिका, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जापान को दे रहे हैं।
कामयाब खुफिया एजेंसी की पहचान क्या होती है
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी मजबूत खुफिया एजेंसी की बुनियाद तीन बातों पर टिकी होती है, भरोसेमंद जानकारी जुटाना, उसका बिना किसी राजनीतिक झुकाव के विश्लेषण करना, और स्वतंत्र रूप से काम कर पाना। इसकी असली कामयाबी इसी में है कि वह खतरों को समय रहते पहचान ले और सुरक्षा जोखिमों को असल संकट बनने से पहले ही रोक दे। कर्नल सोढ़ी जोड़ते हैं कि किसी असरदार एजेंसी के मुख्य आधार होते हैं, कुशल विश्लेषक, इंसानी और तकनीकी खुफिया जानकारी का सही मेल, सूत्रों की मजबूत सुरक्षा, और ऐसे लोगों की भर्ती जिनके पास सही भाषा, सांस्कृतिक और तकनीकी दक्षता हो।
भारत का रॉ जापान के लिए क्या सबक है
किसी देश के लिए शून्य से खुफिया एजेंसी खड़ी करने की एक मिसाल भारत में मिलती है। भारत ने 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से मिले कड़वे सुरक्षा सबक के बाद 21 सितंबर 1968 को रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ की स्थापना की थी। इसका मकसद एक ऐसी समर्पित विदेशी खुफिया एजेंसी बनाना था जो खासतौर पर देश के बाहर से जानकारी जुटाने और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा पर केंद्रित हो।
रॉ कैबिनेट सचिवालय के अधीन काम करता है और इसका प्रमुख सचिव (रिसर्च) होता है, जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। एजेंसी अपने अधिकारी रिसर्च एंड एनालिसिस सर्विस यानी आरएएस से लेती है, साथ ही भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस और अन्य सुरक्षा बलों से प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मियों को भी शामिल करती है। बीते कई दशकों में रॉ ने ह्यूमन इंटेलिजेंस, साइबर खुफिया जानकारी और सैटेलाइट निगरानी का मिला-जुला तंत्र खड़ा किया है, जिससे वह विदेशी सरकारों, आतंकी संगठनों और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर नजर रखता है। इसे एरियल सर्विलांस के लिए एविएशन रिसर्च सेंटर यानी एआरसी और तकनीकी खुफिया जानकारी के लिए नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानी एनटीआरओ जैसे विशेष संगठनों का साथ भी मिलता है।
रॉ का कामकाज बेहद गोपनीय रहता है और इसके बजट या रोजमर्रा के कामकाज के बारे में सार्वजनिक तौर पर बहुत कम जानकारी मिलती है। इसके अधिकारी विदेशी भाषाओं, जासूसी तकनीकों और खुफिया विश्लेषण में खास प्रशिक्षण से गुजरते हैं। बीते वर्षों में इस एजेंसी ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1975 में सिक्किम के भारत में विलय और 2019 के बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक में अहम भूमिका निभाई है, और यह आज भी खालिस्तानी व दूसरे आतंकी नेटवर्क पर नजर बनाए हुए है। जापान के लिए, जो अभी बिल्कुल शुरुआत से ऐसा ही कुछ बनाने में जुटा है, रॉ का यह दशकों लंबा सफर, एक छोटे युद्धोत्तर संगठन से लेकर एक बड़े, बहु-आयामी एजेंसी तक का, यह दिखाता है कि धैर्य, लगातार फंडिंग और साफ कमांड ढांचा किसी नई खुफिया सेवा को कैसे एक मजबूत और टिकाऊ संस्था में बदल सकते हैं।











