केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में वर्षों से लंबित उझ बहुउद्देशीय परियोजना के काम को अत्यधिक गति के साथ आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। सिंधु जल समझौते से जुड़ी व्यवस्थाओं को ठंडे बस्ते में डालने के बाद उठाए गए इस कदम का मुख्य ध्येय भारत के हिस्से के प्राकृतिक जल संसाधनों का पूरा और रणनीतिक उपयोग सुनिश्चित करना है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने रविवार को इस राष्ट्रीय महत्व की परियोजना की वर्तमान स्थिति और प्रगति की विस्तृत समीक्षा की। समीक्षा के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार उन सभी राष्ट्रीय परियोजनाओं को शीर्ष प्राथमिकता दे रही है, जो दशकों तक प्रशासनिक फाइलों में दबी रहीं और जिनकी देरी की वजह से देश को भारी आर्थिक व रणनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है।
रणनीतिक हितों और जल संसाधनों के उपयोग से जुड़ा बड़ा कदम
उझ बहुउद्देशीय परियोजना और शाहपुरकंडी परियोजना केवल आधारभूत ढांचे से जुड़ी साधारण विकास योजनाएं नहीं हैं। ये परियोजनाएं भारत के जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन और राष्ट्रीय रणनीतिक हितों से गहराई से जुड़ी हुई हैं। अतीत में इन परियोजनाओं में हुई लंबी देरी के कारण रावी नदी और उसकी सहायक नदियों का एक विशाल जल भंडार बिना किसी भारतीय उपयोग के बहकर पाकिस्तान की ओर चला जाता था। केंद्र सरकार का स्पष्ट मानना है कि इन बांधों और नहर प्रणालियों के निर्माण से भारत के पास अपने हिस्से के जल का पूर्ण नियंत्रण और अधिकतम उपयोग करने की क्षमता हासिल होगी।
दशकों पुरानी अड़चनों का अंत और 100 वर्ष पुराने विचार को नया जीवन
उझ परियोजना की शुरुआती परिकल्पना लगभग 100 वर्ष पहले की गई थी, लेकिन विभिन्न प्रशासनिक अड़चनों, अंतर-राज्यीय मुद्दों और पूर्ववर्ती सरकारों की उदासीनता के कारण यह योजना दशकों तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही। इसी तरह पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमा पर स्थित शाहपुरकंडी परियोजना भी लगभग 40 वर्षों तक अधर में लटकी रही थी। मोदी सरकार ने इन ऐतिहासिक भूलों को सुधारने के लिए दोनों परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने की प्रतिबद्धता जताई है। शाहपुरकंडी परियोजना का काम 2019 में दोबारा शुरू किया गया था और अब यह लगभग पूरा होने की स्थिति में आ चुका है। वहीं वर्ष 2026 में उझ परियोजना को नए सिरे से गति देकर सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि दशकों से लटकी राष्ट्रीय महत्व की योजनाओं को अब बिना किसी रुकावट के जमीन पर उतारा जाएगा।
वाप्कोस लिमिटेड के साथ बैठक और समानांतर अधिग्रहण की अनूठी रणनीति
परियोजना के चरणबद्ध क्रियान्वयन की रूपरेखा तय करने के लिए डॉ. जितेंद्र सिंह ने जल शक्ति मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत काम करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की परामर्शदाता कंपनी वाप्कोस लिमिटेड के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गहन बैठक की। इस उच्चस्तरीय बैठक में अधिकारियों ने परियोजना को तेजी से पूरा करने के लिए एक नई कार्ययोजना प्रस्तुत की। इस रणनीति के तहत पूरी परियोजना की शत-प्रतिशत भूमि के अधिग्रहण का इंतजार करने के बजाय, उपलब्ध भूमि के टुकड़ों पर तुरंत निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया जाएगा। इसके साथ-साथ बाकी बची जमीन के अधिग्रहण की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया समानांतर रूप से जारी रखी जाएगी। सरकार का मानना है कि इस दोहरे मॉडल से परियोजना में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा और स्थानीय निवासियों को इसके लाभ जल्द से जल्द मिल सकेंगे।
गुणवत्ता, सुरक्षा मानक और बहुआयामी क्षेत्रीय विकास का लक्ष्य
केंद्रीय मंत्री ने परियोजना का संचालन कर रही एजेंसियों को कड़े निर्देश दिए कि काम में तेजी लाने की प्रक्रिया में गुणवत्ता, सुरक्षा और परिचालन दक्षता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से आग्रह किया कि वे निर्माण कार्य में आधुनिक तकनीकों, डिजिटल निगरानी प्रणालियों और सर्वोत्तम वैश्विक कार्यप्रणालियों का समावेश करें ताकि परियोजना को निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरा किया जा सके। उझ बहुउद्देशीय परियोजना के क्रियान्वयन से जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में कृषि सिंचाई के लिए पानी, लाखों लोगों के लिए शुद्ध पेयजल, जलविद्युत ऊर्जा का निर्माण और बुनियादी ढांचे का व्यापक विकास संभव होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप, सरकार का लक्ष्य केवल अधूरी परियोजनाओं को कागजों पर पूरा करना नहीं है, बल्कि देश के प्राकृतिक जल संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करके नागरिकों के जीवन स्तर में प्रत्यक्ष सुधार लाना है।



















