घरेलू कामकाज के दौरान अक्सर लोग वाशिंग मशीन में धुलाई चक्र समाप्त होने के बाद कपड़ों को तुरंत बाहर निकालना भूल जाते हैं। जब कई घंटों बाद या अगली सुबह ढक्कन खोला जाता है, तब उन धुले हुए कपड़ों से सीलन, सड़े हुए पानी और बासी कचरे जैसी असहनीय दुर्गंध आने लगती है। यह तीखी महक कई बार साधारण धुलाई से भी बाहर नहीं निकलती और हमेशा के लिए रेशों में बैठ जाती है। इस परेशानी की जड़ें टेक्सटाइल साइंस और माइक्रोबायोलॉजी के नियमों से जुड़ी हैं, जहां नमी, बंद वातावरण और मानवीय पसीना मिलकर सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल माहौल तैयार करते हैं।
कपड़ों में सड़ांध पैदा करने वाले बैक्टीरिया की मौजूदगी
सामान्य कमरे के तापमान पर बंद वाशिंग मशीन का ड्रम सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना बन जाता है। धुलाई चक्र के पूरा होने के बाद भी कपड़ों के रेशों में मृत त्वचा कोशिकाएं और सीबम यानी पसीने के तैलीय तत्व बचे रह जाते हैं। जब फैब्रिक में नमी और तापमान का यह मेल मिलता है, तब 'मोराक्सेला ऑस्लोएंसिस' नामक सूक्ष्म जीवाणु अत्यंत तीव्र गति से अपनी संख्या में वृद्धि करता है।
साल 2012 के एक जापानी शोध में स्पष्ट हुआ था कि मोराक्सेला ऑस्लोएंसिस बैक्टीरिया सूखने की स्थिति में और यहां तक कि पराबैंगनी यानी अल्ट्रावायलेट किरणों के सीधे संपर्क में आने पर भी पूरी तरह नष्ट नहीं होता। यदि गीले वस्त्रों को धोने के तुरंत बाद धूप और हवा में नहीं फैलाया जाता, तो यह जीवाणु फैब्रिक के भीतर मौजूद तेल को पचाकर दुर्गंधयुक्त यौगिक छोड़ने लगता है। इसके अतिरिक्त, साल 2025 के एक हालिया शोध में पाया गया कि वाशिंग मशीन के रबर डोर सील और डिटर्जेंट ड्रॉर के अंदर बायोफिल्म नाम की एक चिपचिपी परत जम जाती है। यह बायोफिल्म साफ पानी से धुले कपड़ों में भी बदबू के रोगाणुओं का प्रत्यक्ष संचार कर देती है।
फफूंद और बारिश जैसी गंध का खतरनाक रासायनिक मेल
जब वस्त्र लंबे समय तक आर्द्र वातावरण में पड़े रहते हैं, तो केवल बैक्टीरिया ही नहीं, बल्कि फफूंद यानी मोल्ड और मिल्ड्यू भी रेशों पर कब्जा जमा लेते हैं। हवा के कम बहाव वाले कमरों या बंद मशीन में धीरे-धीरे सूख रहे कपड़ों में फंगस खास किस्म के वाष्पशील रासायनिक यौगिक उत्पन्न करते हैं। इन रासायनिक तत्वों में सबसे मुख्य 'जियोस्मिन' नामक अणु होता है।
जियोस्मिन वही विशेष अणु है जो पहली बारिश के समय सूखी मिट्टी से उठने वाली सोंधी खुशबू के लिए जाना जाता है। मानव नाक इस विशेष यौगिक को लेकर अत्यंत संवेदनशील होती है और हवा में इसकी मामूली मात्रा होने पर भी दिमाग तुरंत संकेत पकड़ लेता है। कपड़ों में जब जियोस्मिन और बैक्टीरिया की तीखी महक आपस में मिल जाती है, तो परिधानों से असहनीय सीलन भरी दुर्गंध आने लगती है जिसे तुरंत पहचाना जा सकता है।
पॉलिएस्टर और कॉटन के रेशों में बदबू का बड़ा अंतर
विभिन्न प्रकार के कपड़ों में दुर्गंध सोखने और बनाए रखने की प्रवृत्ति एक समान नहीं होती। प्राकृतिक कपास यानी कॉटन को पानी को आकर्षित करने वाला फैब्रिक माना जाता है, जो जल को आसानी से भीतर खींच लेता है। इस गुण के कारण पसीने के तैलीय तत्वों को कॉटन के रेशों की गहराई में चिपकने का मौका नहीं मिलता और सामान्य धुलाई में वे आसानी से बह जाते हैं।
इसके विपरीत, पॉलिएस्टर पानी से दूर भागने वाला सिंथेटिक कपड़ा होता है। पॉलिएस्टर की बनावट पानी को दूर रखती है लेकिन त्वचा से निकलने वाले पसीने के चिकने तेल को बेहद तेजी से अवशोषित कर लेती है। बैक्टीरिया इसी चिपके हुए तेल को आहार बनाकर तेजी से बास पैदा करते हैं। एक कनाडाई शोध से यह साबित हुआ है कि पॉलिएस्टर परिधान सूती कपड़ों के मुकाबले कहीं अधिक दुर्गंध सोखते हैं। यही कारण है कि जिम और खेलकूद में पहने जाने वाले सिंथेटिक स्पोर्ट्सवियर में यह बदबू लंबे समय तक जमी रहती है।
जिद्दी बास मिटाने और मशीन की स्वच्छता के आसान उपाय
इस दुर्गंध से हमेशा के लिए बचने का सबसे सरल नियम यह है कि वाशिंग मशीन का काम पूरा होते ही कपड़ों को तुरंत बाहर निकाल लिया जाए। यदि कपड़ों में गंध पहले ही घर कर चुकी है, तो मशीन के ड्रम की गहरी सफाई करना अनिवार्य हो जाता है।
वाशिंग मशीन को स्वच्छ बनाने के लिए सफेद सिरके और बेकिंग सोडा की मदद से खाली ड्रम का गर्म चक्र चलाया जा सकता है, जिससे अंदर जमी बायोफिल्म और मैल खत्म हो जाती है। इसके अलावा परिधानों को हमेशा खुली हवादार जगह और सीधी धूप में सुखाना चाहिए ताकि प्राकृतिक रूप से कीटाणु नष्ट हो सकें। सिंथेटिक वस्त्रों के लिए विशेष स्पोर्ट्स डिटर्जेंट का उपयोग फायदेमंद रहता है, क्योंकि इनके रसायन रेशों के अंदर जाकर जमे हुए तेल और बैक्टीरिया को निष्प्रभावी कर देते हैं। मशीन का उपयोग न होने पर उसके दरवाजे को हमेशा हल्का खुला छोड़ना चाहिए, जिससे आंतरिक नमी सूख जाए और फंगस को पनपने का मौका न मिले।



















