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क्या बच्चों पर टॉप आने का दबाव बना रहा है उन्हें मानसिक रूप से बीमार?जीवनशैली
11 जुल॰ 2026, 12:11 am (45 दिन पहले)· 2

क्या बच्चों पर टॉप आने का दबाव बना रहा है उन्हें मानसिक रूप से बीमार?

आजकल के माता-पिता अक्सर बच्चों पर अव्वल आने का दबाव बनाते हैं जिसे पुशी पेरेंटिंग कहा जाता है। यह अनचाहा दबाव बच्चों में आत्मविश्वास की कमी और डिप्रेशन जैसी गंभीर मानसिक समस्याओं का मुख्य कारण बन रहा है।

आजकल के दौर में लगभग हर अभिभावक अपने बच्चे को सबसे बेहतर और सफल देखना चाहते हैं। हालांकि, जब ये उच्च आकांक्षाएं अपेक्षाओं का रूप लेकर बच्चों पर जबरन थोपी जाने लगती हैं, तो स्थिति खतरनाक हो जाती है। मनोविज्ञान की दुनिया में इसे 'पुशी पेरेंटिंग' कहा जाता है। ऊपर से देखने में यह तरीका भले ही बच्चों को अनुशासित और सफल बनाने की कवायद लगे, लेकिन वास्तव में यह उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। कई माता-पिता अनजाने में अपने साथ हुए अनुभवों को बच्चों पर दोहराने की कोशिश करते हैं, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि आज के दौर में बच्चों की मानसिक स्थिति और चुनौतियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।

पुशी पेरेंटिंग का गहरा मनोविज्ञान

पुशी पेरेंटिंग का सीधा अर्थ है बच्चे की इच्छाओं को दरकिनार कर अपनी अधूरी आकांक्षाओं को उन पर थोपना और हर क्षेत्र में श्रेष्ठ होने का दबाव बनाना। ऐसा बच्चा बाहरी रूप से भले ही सफल या अनुशासित दिखाई दे, लेकिन वह निरंतर मानसिक दबाव और तनाव में जीता है। वह खेलकूद या नई चीजें सीखने की खुशी को भूलकर केवल अपने प्रदर्शन और परिणामों के बारे में ही सोचने को मजबूर हो जाता है।

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प्रदर्शन का भारी दबाव

इस तरह की पेरेंटिंग का सबसे बड़ा लक्षण है नंबर वन आने या परीक्षा में टॉप करने की अटूट उम्मीद। यदि बच्चा बहुत अच्छी मेहनत करके अच्छे अंक भी ले आए, लेकिन वह कक्षा में प्रथम न आ पाए, तो भी उसे डांट-फटकार का सामना करना पड़ता है। इससे बच्चे को यह महसूस होने लगता है कि उसकी कड़ी मेहनत का कोई मोल नहीं है। इसके परिणामस्वरूप उसके मन में विफलता का गहरा डर बैठ जाता है। वह स्वयं को केवल तभी स्वीकार करने लगता है जब वह दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरता है।

रुचि और पसंद की अनदेखी

पुशी पेरेंटिंग के एक और नकारात्मक पहलू में बच्चे की अपनी पसंद को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। अक्सर बच्चों का रुझान कला, खेल या किसी विशेष शौक की ओर होता है, लेकिन माता-पिता उन्हें अपनी पसंद के करियर या पढ़ाई के विकल्पों की ओर धकेलते हैं। इससे बच्चा अपनी वास्तविक खुशी और जुनून को दबाने लगता है, जिससे उसका व्यक्तित्व ठीक से विकसित नहीं हो पाता।

तुलना से पनपता आत्म-संदेह

जब बच्चों की तुलना लगातार उनके साथियों या अन्य बच्चों से की जाती है, तो यह उनके आत्मविश्वास की नींव को हिला देता है। बच्चा धीरे-धीरे खुद को दूसरों से कमतर महसूस करने लगता है, जिससे उसके भीतर हीन भावना विकसित हो जाती है। मनोवैज्ञानिक इसे सेल्फ-डाउट पैटर्न कहते हैं, जहां बच्चा अपने खुद के निर्णयों पर भरोसा करना ही छोड़ देता है।

फैसले लेने की क्षमता पर असर

अक्सर अभिभावक बच्चे के जीवन से जुड़े हर छोटे और बड़े फैसले खुद ही लेने लगते हैं। इसमें कपड़े चुनने से लेकर करियर या दोस्त चुनने तक की स्वतंत्रता बच्चे को नहीं दी जाती। जब बच्चा अपने जीवन के निर्णयों में शामिल नहीं होता, तो वह आत्मनिर्भर नहीं बन पाता। बड़े होने पर भी ऐसे व्यक्ति हर छोटे कार्य के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को मार्गदर्शन देना सही है, लेकिन उन पर नियंत्रण का दबाव डालना गलत है।

सवाल-जवाब

पुशी पेरेंटिंग क्या है?
यह एक ऐसी मानसिकता है जिसमें माता-पिता बच्चे की अपनी पसंद को नजरअंदाज कर उन पर अपनी इच्छाएं थोपते हैं और हर काम में परफेक्ट होने का दबाव बनाते हैं।
बच्चों पर ज्यादा दबाव डालने का क्या परिणाम हो सकता है?
इससे बच्चा मानसिक रूप से बीमार हो सकता है, उसमें आत्मविश्वास की कमी आती है और वह खुद पर भरोसा करना छोड़ देता है, जिससे डिप्रेशन की संभावना बढ़ जाती है।
क्या तुलना करना बच्चों के लिए हानिकारक है?
हाँ, दूसरों से तुलना करने पर बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है और उसके मन में हीन भावना पैदा हो जाती है।
माता-पिता को बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
माता-पिता को बच्चों का मार्गदर्शन करना चाहिए, लेकिन उन पर अपनी इच्छाएं थोपने और हर फैसले में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए ताकि बच्चा आत्मनिर्भर बन सके।
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