त्वचा की देखभाल के क्षेत्र में लगातार नए प्रयोग और उपाय सामने आते रहते हैं। कभी चेहरे पर ग्लास स्किन पाने की होड़ रहती है, तो कभी स्लगिंग जैसी तकनीकें चर्चा का विषय बनती हैं। इन दिनों स्पिक्यूल स्किनकेयर लोगों के बीच काफी चर्चा में है और सोशल मीडिया पर इसे लिक्विड माइक्रोनीडलिंग के नाम से भी प्रचारित किया जा रहा है। इसके समर्थकों का दावा है कि यह तकनीक चेहरे की बनावट को निखारने में मदद करती है और सौंदर्य उत्पादों को त्वचा की गहराई तक पहुंचाने का काम करती है। लेकिन यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर यह तकनीक किस प्रकार काम करती है और क्या इसे अपने डेली रूटीन में शामिल करना पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं।
स्पिक्यूल्स क्या हैं और कैसे तैयार होते हैं
स्पिक्यूल्स असल में बहुत ही सूक्ष्म और सुई जैसी संरचना वाले कण होते हैं। स्किनकेयर उत्पादों में इनका उपयोग करने के लिए इन्हें मुख्य रूप से समुद्री स्पंज के प्राकृतिक ढांचे से निकाला जाता है। इन खास कणों को विभिन्न सीरम और क्रीम के फार्मूले में मिलाया जाता है, ताकि जब इन्हें चेहरे पर लगाया जाए तो ये त्वचा की सबसे बाहरी परत के साथ संपर्क में आ सकें। ऐसा माना जाता है कि ये कण त्वचा के मार्ग को थोड़ा प्रभावित करके अन्य सक्रिय तत्वों को भीतर तक प्रवेश करने में सहायता प्रदान करते हैं। जब उपभोक्ता इन उत्पादों को अपने चेहरे पर लगाते हैं, तो उन्हें अक्सर हल्की सी चुभन या झुनझुनी का अहसास होता है। इसी अनूठे संवेदी अनुभव के कारण इसे लिक्विड माइक्रोनीडलिंग कहा जाने लगा है। हालांकि, यह बात ध्यान रखने योग्य है कि घर पर इस्तेमाल होने वाला यह तरीका किसी क्लिनिक में पेशेवर रूप से की जाने वाली माइक्रोनीडलिंग प्रक्रिया से काफी अलग है।
त्वचा पर चमक और इसके दावों की सच्चाई
बाजार में स्पिक्यूल युक्त उत्पादों को इस दावे के साथ बेचा जाता है कि वे त्वचा की बनावट में सुधार लाते हैं, रूखेपन की समस्या को दूर करते हैं और अन्य स्किनकेयर तत्वों को सोखने की क्षमता को बढ़ाते हैं। कुछ शुरुआती वैज्ञानिक अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि समुद्री स्पंज से मिलने वाले स्पिक्यूल्स कुछ पदार्थों को त्वचा के भीतर भेजने में मददगार हो सकते हैं। बावजूद इसके, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रयोगशालाओं या जानवरों पर किए गए परीक्षणों के परिणामों को सीधे तौर पर हर व्यावसायिक सीरम पर लागू नहीं किया जा सकता है। आम जनता की त्वचा पर इन उत्पादों के निरंतर और लंबे समय तक प्रयोग से क्या वास्तविक लाभ मिलते हैं, यह पुष्टि करने के लिए अभी और अधिक व्यापक तथा उच्च स्तर के शोध की आवश्यकता है। यही कारण है कि यह मान लेना पूरी तरह सही नहीं होगा कि स्पिक्यूल आधारित उत्पादों का उपयोग करने से हर किसी को चमकदार त्वचा मिल जाएगी या उनके चेहरे के दाग-धब्बे और झुर्रियां हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगी।
त्वचा के लिए जोखिम और संभावित नुकसान
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि स्पिक्यूल स्किनकेयर के कुछ नकारात्मक पहलू भी मौजूद हैं। चूंकि ये सूक्ष्म कण त्वचा की ऊपरी सतह को प्रभावित करते हैं, इसलिए इनके प्रयोग से चेहरे पर लालिमा, गंभीर जलन, लगातार चुभन और त्वचा की संवेदनशीलता में बढ़ोतरी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। जिन लोगों की त्वचा प्रकृति से ही बहुत संवेदनशील है या जिनका स्किन बैरियर पहले से ही किसी वजह से कमजोर हो चुका है, उनके लिए ये उत्पाद मुश्किलें और बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा जिन व्यक्तियों को एक्जिमा, रोसैशिया या सूजन वाले सक्रिय पिंपल्स की शिकायत है, उन्हें ऐसे किसी भी उत्पाद को आजमाने से पहले किसी योग्य त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करना चाहिए। यदि इन्हें रेटिनॉल या अल्फा हाइड्रॉक्सी एसिड और बीटा हाइड्रॉक्सी एसिड जैसे एक्सफोलिएटिंग तत्वों के साथ एक ही स्किनकेयर रूटीन में उपयोग किया जाए, तो त्वचा में इरिटेशन होने का जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।
इस्तेमाल से पहले बरतें ये जरूरी सावधानियां
यदि आप स्पिक्यूल स्किनकेयर को अपनी सौंदर्य दिनचर्या में शामिल करने का मन बना चुके हैं, तो सबसे पहले उस उत्पाद के घटकों और उसके इस्तेमाल से जुड़े निर्देशों को भली-भांति पढ़ लें। यह आवश्यक नहीं है कि इन उत्पादों को हर रोज चेहरे पर लगाया जाए। किसी भी नए उत्पाद को पूरी तरह चेहरे पर लगाने से पहले पैच टेस्ट करना समझदारी है, लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पैच टेस्ट से हर प्रकार की एलर्जी या प्रतिक्रिया का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता है। यदि उत्पाद के इस्तेमाल के दौरान आपको तेज जलन महसूस होती है, चेहरे पर लगातार लालिमा बनी रहती है या सूजन आ जाती है, तो इसका प्रयोग तुरंत प्रभाव से रोक देना चाहिए।



















