अक्सर भारतीय परिवारों के भीतर एक सामान्य दृश्य देखने को मिलता है जब खेलते समय चोट लगने पर बेटा रोते हुए सबसे पहले अपनी मां को पुकारता है, वहीं दूसरी तरफ बेटी अपनी किसी भी नई जिद या फरमाइश को पूरा करवाने के लिए सीधे अपने पिता के पास दौड़ती है। बहुत से घरों में मां की ममता बेटे के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना बन जाती है और पिता का मजबूत कंधा बेटी के लिए दुनिया भर की बातें साझा करने की सबसे पसंदीदा जगह बन जाता है। समाज में यह धारणा बहुत पुरानी और गहरी है कि बेटे हमेशा मां के लाडले होते हैं और बेटियां स्वभाव से ही पापा की राजदुलारी या प्रिंसेस कहलाती हैं। इस आम पारिवारिक चलन को देखकर किसी के भी मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वाकई इन रिश्तों के पीछे कोई तयशुदा जैविक अथवा मनोवैज्ञानिक नियम काम करता है, या फिर यह केवल हमारे पारंपरिक लालन-पालन और सामाजिक अपेक्षाओं का प्रतिबिंब है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस पारिवारिक समीकरण का गहराई से विश्लेषण करने पर एक बेहद दिलचस्प सच्चाई सामने आती है। बाल मनोविज्ञान इस प्रकार के पारिवारिक जुड़ाव को केवल बच्चे के लड़के या लड़की होने के आधार पर तय नहीं मानता। असल में बच्चे का किसी एक अभिभावक के प्रति गहरा खिंचाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसे भावनात्मक सुरक्षा कहां से मिल रही है, दोनों माता-पिता का व्यक्तिगत व्यवहार कैसा है, वे बच्चे की मानसिक और शारीरिक जरूरतों को कितनी संवेदनशीलता से समझ पाते हैं और घर के भीतर का संपूर्ण वातावरण कैसा है। इन सभी कारकों के तालमेल से ही यह तय होता है कि बच्चा किस अभिभावक के साथ खुद को अधिक सहज महसूस करता है।
मां और बेटे के गहरे जुड़ाव के पीछे की मनोवैज्ञानिक बुनियाद
नवजात शिशु के धरती पर आने के बाद शुरुआती महीनों में मां ही उसकी दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र होती है। भूख लगने पर दूध पिलाना, पेट दर्द या तकलीफ में रोने की सही वजह पहचानना, गीलेपन को दूर करना और गोद में लेकर लगातार थपकी देकर चुप कराना, ये तमाम दैनिक क्रियाएं मां और शिशु के बीच एक अटूट व बेहद संवेदनशील भावनात्मक रिश्ता गढ़ देती हैं। जब बढ़ते हुए बच्चे को हर बार यह पक्का भरोसा होने लगता है कि किसी भी तरह के डर, दर्द या परेशानी की घड़ी में उसकी मां बिना किसी देरी के उसके पास दौड़ी चली आएगी, तब उसके अवचेतन मन में एक अटूट सुरक्षा की भावना घर कर जाती है।
मनोविज्ञान के क्षेत्र में इस मजबूत भावनात्मक रिश्ते को सिक्योर अटैचमेंट यानी सुरक्षित जुड़ाव का नाम दिया जाता है। इस मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का अर्थ केवल बच्चे पर दुलार बरसाना या उसे प्यार जताना भर नहीं है, बल्कि इसका मुख्य आधार यह है कि जब भी बच्चे को सहारे की दरकार हो, तब माता-पिता भावनात्मक और शारीरिक दोनों रूपों में उसके साथ मौजूद रहें। हालांकि इस पूरी व्यवस्था का यह कतई अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि यह संबंध प्राकृतिक रूप से पहले से तय होता है। यदि घर में पिता भी शिशु के जन्म के बाद उसकी दैनिक देखभाल, नहलाने, खिलाने और उसकी भावनाओं को समझने में बराबर की सक्रिय भागीदारी निभाएं, तो बच्चा पिता के साथ भी उतना ही गहरा और सुरक्षित भावनात्मक रिश्ता आसानी से बना सकता है।
बेटियों और पिताओं के रिश्ते में भावनात्मक खुलापन
दूसरी तरफ बेटियों और पिताओं के रिश्ते का अपना एक अलग और अनूठा ताना-बाना होता है। एक बढ़ती हुई बेटी के संपूर्ण विकास के लिए उसके पिता की प्रशंसा, उनका साथ और उनका दिया हुआ प्रोत्साहन बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। जब एक पिता अपनी बेटी की छोटी-बड़ी बातों को पूरे धैर्य से सुनते हैं, उसकी नन्हीं-नन्हीं उपलब्धियों पर गर्व महसूस करते हैं और कठिन समय में उसका ढांढस बंधाते हैं, तो बेटी के अंदर का आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बेहद मजबूत हो जाता है। पिता का यह सहयोग बेटी को सुरक्षित महसूस कराता है और उसे अपनी बात बेझिझक कहने का हौसला देता है।
इस दिशा में साल 2017 के दौरान विहेवियरल न्यूरोसाइंस नामक प्रतिष्ठित शोध पत्रिका में एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित हुआ था। इस वैज्ञानिक अध्ययन के नतीजों में देखा गया कि पिता आम तौर पर अपनी बेटियों के साथ भावनात्मक विषयों पर कहीं ज्यादा खुलकर और विस्तार से बातचीत करते हैं। इसके विपरीत जब पिता बेटों के साथ वक्त बिताते हैं, तो वे बातचीत के बजाय अधिक शारीरिक ऊर्जा वाले और उछल-कूद से भरे खेल खेलना पसंद करते हैं। इस अध्ययन से साफ हुआ कि संवाद के तरीके में यह अंतर स्वाभाविक रूप से दोनों के भावनात्मक जुड़ाव की दिशा को बदल देता है।
पारंपरिक सामाजिक सोच और अपेक्षाओं का असर
इस अंतर के पीछे केवल व्यक्तिगत स्वभाव ही नहीं बल्कि हमारे समाज में लड़के और लड़कियों को लेकर पहले से तय किए गए ढर्रे भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। हमारे अधिकांश परिवारों में बेटियों को अपनी भावनाएं खुलकर जताने, रोने या दुख साझा करने की पूरी छूट दी जाती है। वहीं दूसरी ओर बेटों को बचपन से ही यह सिखाया जाने लगता है कि उन्हें हर हाल में सख्त और मजबूत दिखना है तथा आंसू नहीं बहाने हैं। जब बेटे को बाहरी दुनिया या पिता के सामने अपनी कमजोरी छिपाने का दबाव महसूस होता है, तो वह अपनी कोमल भावनाओं और डर को साझा करने के लिए अपनी मां के आंचल की तलाश करता है। यही सामाजिक बनावट लड़के और लड़की के भावनात्मक सफर को एक-दूसरे से काफी अलग बना देती है।
क्या माता-पिता को अपने जैसे बच्चे से अधिक अपनापन लगता है
पारिवारिक जीवन में कई बार माता-पिता अनजाने में ही किसी एक बच्चे में अपनी खुद की छवि देखने लगते हैं। मां को लग सकता है कि बेटी की आदतें और पसंद बिल्कुल उसकी अपनी तरह हैं, जबकि पिता को बेटे के हाव-भाव और शौक में अपना बीता हुआ बचपन दिखाई देने लगता है। जब माता-पिता को बच्चे में अपने गुण नजर आते हैं, तो वे खुद को उस बच्चे के अधिक नजदीक महसूस करने लगते हैं। विभिन्न अनुसंधानों से भी यह सामने आया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में माताओं का स्वाभाविक झुकाव बेटियों की तरफ और पिताओं का रुझान बेटों की तरफ थोड़ा अधिक हो सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा इसलिए देखने को मिलता है क्योंकि वयस्क अक्सर समान लिंग वाले बच्चों के अनुभवों और चुनौतियों से खुद को सीधे तौर पर जोड़कर देख पाते हैं। हालांकि यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि यह अध्ययन केवल कुछ खास परिस्थितियों, जैसे कि खरीदारी के तरीके, आर्थिक प्राथमिकताओं या व्यक्तिगत विकल्पों के दौरान देखे गए बर्ताव पर आधारित था। इसका यह निष्कर्ष बिल्कुल नहीं है कि हर परिवार में यही नियम लागू होता है या माता-पिता जानबूझकर अपने बच्चों में कोई भेदभाव करते हैं। इसका सीधा अर्थ केवल इतना है कि माता-पिता भी हाड़-मांस के इंसान होते हैं और उनकी निजी पसंद तथा पहचान कई बार अनजाने में बच्चों के साथ उनके संबंधों की नजदीकी को थोड़ा प्रभावित कर सकती है।
पारिवारिक विविधता और 1997 की शोध-समीक्षा के निष्कर्ष
मनोविज्ञान यह स्पष्ट करता है कि पारिवारिक रिश्तों को किसी एक पूर्वनिर्धारित खांचे में बंद नहीं किया जा सकता। हर घर की अपनी अलग गतिशीलता और अनूठी कहानी होती है। दुनिया में ऐसे अनगिनत परिवार हैं जहां बेटियां अपने पिता के बजाय अपनी मां की सबसे पक्की राजदार होती हैं, और ऐसे भी ढेरों बेटे हैं जो अपने जीवन की हर उलझन को अपनी मां के बजाय पिता के साथ सुलझाना ज्यादा पसंद करते हैं। साल 1997 में सामने आई एक विस्तृत शोध-समीक्षा ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि माता-पिता और बच्चों के इन लिंग-आधारित रिश्तों में कोई पत्थर की लकीर जैसा पक्का नियम मौजूद नहीं होता।
असल सच्चाई यह है कि बच्चा उस अभिभावक के सबसे ज्यादा करीब जाता है जो बिना किसी पूर्वाग्रह के उसकी बातें सुनता है। बच्चा उस इंसान पर भरोसा करता है जो उसकी भावनाओं का मजाक नहीं उड़ाता और गलती हो जाने पर चिल्लाने या सजा देने के बजाय शांत मन से सही और गलत का फर्क समझाता है। संवेदनशीलता और धैर्य ही वह असली गोंद है जो इस रिश्ते को गहरा बनाता है।
पक्षपात का जोखिम और परवरिश में संतुलन की जरूरत
बच्चों पर प्यार और दुलार लुटाना हर माता-पिता का स्वाभाविक अधिकार और कर्तव्य है, लेकिन जब यह दुलार किसी एक बच्चे के प्रति जरूरत से ज्यादा और दूसरे के प्रति कम होने लगे, तो यह परिवार की नींव को हिला सकता है। यदि घर में बेटे की हर नादानी या गलती को यह कहकर माफ कर दिया जाए कि लड़के तो चंचल होते ही हैं, और उसी घर में बेटी पर हमेशा परिपक्व और समझदार बने रहने का दबाव डाला जाए, तो यह असंतुलन बेहद नुकसानदेह साबित होता है। इस तरह के असमान व्यवहार से उपेक्षित बच्चे के मन में हीन भावना घर कर सकती है और भाई-बहन के बीच आपसी ईर्ष्या तथा दूरियां हमेशा के लिए पनप सकती हैं।
इसलिए एक स्वस्थ परवरिश की सबसे बड़ी मांग यह है कि माता-पिता बिना किसी लिंग-आधारित पूर्वाग्रह के अपने सभी बच्चों को समान दृष्टि, बराबर प्यार और एक जैसी समझदारी के साथ बड़ा करें। बेटे और बेटी दोनों को ही मां और पिता दोनों का भरपूर, संतुलित और बिना शर्त स्नेह मिलना चाहिए ताकि किसी भी बच्चे को कभी यह न चुनना पड़े कि वह किसके अधिक करीब है। बचपन में मिलने वाला यही सुरक्षित भावनात्मक माहौल बच्चे को भविष्य में एक स्थिर, आत्मविश्वासी और समाज में मजबूत रिश्ते निभाने वाला परिपक्व इंसान बनाता है।



















