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देसी कपास और प्राकृतिक रंगों से बुनकरों का संवर रहा जीवन, पर्यावरण के साथ त्वचा की सेहत भी सुरक्षितजीवनशैली
12 अक्तू॰ 2026, 3:21 pm (2 घंटे पहले)· 0

देसी कपास और प्राकृतिक रंगों से बुनकरों का संवर रहा जीवन, पर्यावरण के साथ त्वचा की सेहत भी सुरक्षित

रासायनिक डाई और सिंथेटिक धागों के दौर में पारंपरिक देसी कपास से बने कपड़े कारीगरों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं और लोगों को त्वचा संबंधी समस्याओं से बचा रहे हैं।

सिंथेटिक धागों, जहरीले रसायनों और मशीनी उत्पादन से भरे मौजूदा परिधान बाजार के बीच पारंपरिक देसी कपास और प्राकृतिक रंगों से तैयार वस्त्र एक टिकाऊ विकल्प बनकर सामने आए हैं। चेन्नई से शुरू होकर हैदराबाद तक पहुंची तुला पहल पर्यावरण संरक्षण और इंसानी सेहत की रक्षा के साथ-साथ ग्रामीण बुनकरों और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने का काम कर रही है। हाइब्रिड बीजों के स्थान पर पुरानी देसी किस्मों की बुआई से लेकर हथकरघे पर कपड़े की बुनाई तक की यह पूरी यात्रा खेती और कुटीर उद्योग दोनों को नई ऊर्जा दे रही है।

देसी बीज और चरखे से बुनाई की पारंपरिक प्रक्रिया

इस पूरी व्यवस्था का आधार रासायनिक खादों और कीटनाशकों से मुक्त रहकर पारंपरिक तरीके से देसी कपास उगाना है। तुला से जुड़ी जाह्नवी के अनुसार, इस मुहिम का मुख्य मकसद मिट्टी की सेहत सुधारते हुए पूरी तरह प्राकृतिक वस्त्र तैयार करना है। फसल तैयार होने के बाद कपास से चरखे की मदद से सूत काता जाता है। इसके बाद ग्रामीण बुनकर हथकरघे पर सूत को सलीके से बुनकर कपड़ा तैयार करते हैं, जिससे मशीनों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाती है।

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फूल-पत्तियों से रंगाई और नारियल के छिलकों के बटन

तैयार कपड़ों को आकर्षक रंग देने के लिए किसी भी तरह की सिंथेटिक या रासायनिक डाई का उपयोग नहीं किया जाता। रंगाई की पूरी प्रक्रिया फूलों, पत्तियों और वनस्पतियों के प्राकृतिक अर्क से पूरी की जाती है। पर्यावरण संरक्षण का ध्यान इस हद तक रखा गया है कि परिधानों में लगने वाले बटन भी प्लास्टिक के बजाय नारियल के छिलकों से गढ़े जाते हैं। इन खूबियों के कारण यह कपड़ा पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल रहता है और उपयोग के बाद मिट्टी में आसानी से घुलकर नष्ट हो जाता है।

त्वचा की सुरक्षा और हर मौसम में आराम

बाजार में मिलने वाले सामान्य परिधानों में मौजूद केमिकल और कृत्रिम डाई पसीने के संपर्क में आकर त्वचा के रोमछिद्रों के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इससे कई तरह की एलर्जी, खुजली और त्वचा संबंधी गंभीर विकारों का खतरा बना रहता है। इसके विपरीत, देसी कपास से हथकरघे पर बने परिधान मौसम के अनुसार बेहद आरामदायक साबित होते हैं। ये गर्मियों में शरीर को ठंडक और सर्दियों में सुखद गर्माहट प्रदान करते हैं। पसीना सोखने की अद्भुत क्षमता के कारण इन्हें संवेदनशील त्वचा के लिए पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है।

पारदर्शी आय मॉडल और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार

इस पूरे कार्यप्रणाली की सबसे अहम खूबी इसका पारदर्शी वित्तीय ढांचा है। हर परिधान की बिक्री से हासिल होने वाली धनराशि का सीधा हिस्सा खेती करने वाले किसान, सूत कातने वाले, हथकरघा बुनकर और सिलाई करने वाले कारीगरों तक पहुंचता है। इस पहल में बड़े पैमाने पर ग्रामीण महिलाएं शामिल हैं, जिन्हें अपने घरों में रहकर ही सम्मानजनक आजीविका मिल रही है। इसके अतिरिक्त, साल के अंत में अर्जित मुनाफे का एक हिस्सा सीधे किसान परिवारों को वितरित किया जाता है। नवजात शिशुओं से लेकर वयस्कों तक के लिए यह मुहिम भारत की लुप्तप्राय हथकरघा कला और देसी कपास की समृद्ध विविधता को बचाने का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है।

सवाल-जवाब

तुला पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य रासायनिक खादों के बिना पारंपरिक देसी कपास उगाना, उसे प्राकृतिक कपड़ों में बदलना और ग्रामीण बुनकरों को स्वावलंबी बनाना है।
इन कपड़ों में किस प्रकार के बीजों और सूत का प्रयोग होता है?
इनमें हाइब्रिड बीजों के स्थान पर पुरानी देसी किस्मों के बीज बोए जाते हैं और फिर कपास से चरखे द्वारा सूत काता जाता है।
कपड़ों की रंगाई के लिए किस सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है?
रंगाई में किसी भी रासायनिक डाई की जगह फूलों, पत्तियों और प्राकृतिक वनस्पतियों के अर्क का उपयोग होता है।
कपड़ों के बटन किस चीज से तैयार किए जाते हैं?
इन परिधानों में प्लास्टिक के बजाय नारियल के छिलकों से बने बटन लगाए जाते हैं ताकि कपड़ा पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल रहे।
साधारण कपड़ों की तुलना में देसी कपास का कपड़ा स्वास्थ्य के लिए क्यों बेहतर है?
यह पसीना सोखने में सक्षम है और इसमें कोई रासायनिक डाई नहीं होती, जिससे पसीने के जरिए केमिकल त्वचा में जाने का खतरा खत्म हो जाता है।
इस मॉडल से ग्रामीण महिलाओं और कारीगरों को क्या लाभ मिल रहा है?
बिक्री का सीधा हिस्सा कताई, बुनाई और सिलाई करने वाले कारीगरों को मिलता है, जिससे ग्रामीण महिलाओं को घर पर ही सम्मानजनक आजीविका और वार्षिक मुनाफे में भागीदारी मिलती है।
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