आमतौर पर जब कोई रिहायशी इमारत पुरानी होने लगती है, तो लोग उसकी ऊपरी साज-सज्जा, पुताई या छोटे-मोटे मरम्मत कार्य कराकर यह मान लेते हैं कि इमारत पूरी तरह सुरक्षित है. हकीकत में दीवारों पर ताजा पेंट चढ़ा देने से ढांचे की आंतरिक ताकत या उसकी मौजूदा स्थिति का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. किसी भी पुरानी रिहायशी संरचना में प्रयुक्त ईंट, सीमेंट, मसाला और अन्य बुनियादी निर्माण सामग्रियों की आंतरिक स्थिति का व्यवस्थित तकनीकी विश्लेषण बेहद जरूरी होता है. यदि दीवारों पर बारीक या गहरी दरारें उभरने लगें, छत के निचले या ऊपरी हिस्से में लगातार सीलन जमी रहे, कंक्रीट के भीतर दबे सरिए में जंग के निशान दिखें अथवा कोई मुख्य दीवार अपनी सीध से झुकती नजर आए, तो ऐसे गंभीर लक्षणों को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
वैज्ञानिक लैब जांच से सामने आती है निर्माण सामग्री की वास्तविक गुणवत्ता
आगरा में पिछले 16 वर्षों से भवन निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय सिविल इंजीनियर अजय भदौरिया के अनुसार, पुरानी इमारतों की वास्तविक स्थिति की पहचान के लिए वैज्ञानिक लैब टेस्टिंग का सहारा लिया जा सकता है. किसी तकनीकी विशेषज्ञ की सीधी देखरेख में दीवार से सीमेंट और मसाले का एक छोटा नमूना लिया जाता है. इसके अतिरिक्त ढांचे में लगी ईंटों और जरूरत पड़ने पर चूने अथवा अन्य प्रयुक्त सामग्रियों के सैंपल्स भी जुटाए जाते हैं. इन नमूनों को आधुनिक प्रयोगशाला में विश्लेषित किया जाता है, जिससे यह साफ तौर पर पता चल जाता है कि दशकों पूर्व लगाई गई निर्माण सामग्री में आज कितनी भार सहने की क्षमता बची है और उसकी गुणवत्ता किस स्तर तक घिस चुकी है.
जांच का खर्च और आगरा में उपलब्ध परीक्षण केंद्र
इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया पर होने वाले खर्च का ब्योरा देते हुए अजय भदौरिया ने स्पष्ट किया कि आगरा में अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं के माध्यम से लगभग 5 से 6 हजार रुपये के सामान्य खर्च में पुरानी इमारत की निर्माण सामग्री की गहन जांच कराई जा सकती है. यह परीक्षण सीमेंट की पकड़, ईंट की संपीड़न क्षमता और मसाले की सघनता का सटीक तकनीकी आंकड़ा पेश करता है. उनके मुताबिक, आगरा शहर के संजय प्लेस, भगवान टॉकीज के पास, रोहता और शास्त्रीपुरम जैसे प्रमुख इलाकों में ऐसी प्रयोगशालाएं मौजूद हैं, जहां मकान मालिक जाकर इस प्रकार के परीक्षण संपन्न करा सकते हैं.
सिर्फ लैब रिपोर्ट पर्याप्त नहीं, स्ट्रक्चरल इंजीनियर का मुआयना भी अनिवार्य
हालांकि, केवल निर्माण सामग्री की प्रयोगशाला जांच के आधार पर यह अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरी इमारत भविष्य में कितने वर्षों तक सुरक्षित खड़ी रहेगी. अजय भदौरिया ने आगाह किया कि इसके लिए किसी पेशेवर स्ट्रक्चरल इंजीनियर द्वारा पूरे भवन का जमीनी स्तर पर तकनीकी मुआयना कराया जाना भी समान रूप से आवश्यक है. पूरे ढांचे, बीम, कॉलम और लोड-बेयरिंग दीवारों की समग्र स्थिति का पेशेवर मूल्यांकन होने के बाद ही यह तय हो पाता है कि इमारत को सामान्य मरम्मत की दरकार है, ढांचे को जैकेटिंग या रेट्रोफिटिंग जैसे मजबूतीकरण की आवश्यकता है अथवा किसी अन्य बड़े संरचनात्मक बदलाव की जरूरत आन पड़ी है.
खतरे के शुरुआती संकेत और समय रहते तकनीकी दखल का महत्व
पुरानी इमारतों में अक्सर दिखाई देने वाले कुछ बदलाव सीधे तौर पर सुरक्षा जोखिम की ओर इशारा करते हैं. दीवारों पर उभरती चौड़ी दरारें, छत के अंदरूनी स्लैब में लगातार रिसने वाला पानी, प्लास्टर उखड़ने के बाद सरिए में लगी जंग या किसी दीवार का भार के दबाव में बाहर की तरफ झुक जाना ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें अनदेखा करना खतरनाक साबित हो सकता है. यदि समय रहते इन तकनीकी गड़बड़ियों की पहचान कर ली जाए, तो किसी बड़े हादसे की आशंका को टाला जा सकता है और जरूरी रेट्रोफिटिंग या समयोचित मरम्मत कराकर इमारत की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है.
60 साल तक चल सकता है सही तकनीक और गुणवत्ता से बना मकान
सिविल इंजीनियर अजय भदौरिया का मानना है कि किसी भी भवन का जीवनकाल मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि निर्माण के समय किस दर्जे की सामग्री लगाई गई थी और कारीगरी का तकनीकी स्तर क्या था. निर्माण के दौरान अव्वल दर्जे का सीमेंट, जंग-रोधी सरिया, पक्की ईंटें, उपयुक्त बालू और अन्य मानक सामग्रियों का चयन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए. इसके साथ-साथ कुशल कारीगरों और सही सिविल इंजीनियरिंग मानकों का पालन भी बेहद जरूरी होता है. उनके अनुसार, उच्च गुणवत्ता की सामग्री और सटीक निर्माण पद्धतियों से तैयार की गई रिहायशी इमारत लगभग 60 साल तक बेहद मजबूती से टिकी रह सकती है. हालांकि, यह कोई निश्चित सीमा नहीं है, क्योंकि जमीन की भौगोलिक बनावट, नींव की गहराई, वास्तु व संरचनात्मक डिजाइन, मौसमी मार तथा समय-समय पर होने वाला रख-रखाव भी इमारत की कुल उम्र को सीधे प्रभावित करते हैं.
नियमित देखरेख और समय-समय पर मरम्मत से टलते हैं बड़े नुकसान
इमारत बनकर तैयार हो जाने के बाद उसकी निरंतर देखभाल करना भी उतना ही आवश्यक होता है जितना निर्माण के दौरान ध्यान रखना. अजय भदौरिया ने सलाह दी है कि हर एक-दो साल के अंतराल पर मकान की समग्र स्थिति का तकनीकी मुआयना कराया जाना चाहिए. जहां भी प्लास्टर झड़ने, हल्की दरार आने या पानी के रिसाव के लक्षण दिखें, वहां तत्काल रेनोवेशन अथवा मरम्मत का कार्य करा लेना चाहिए. ऐसी नियमित देखरेख से दीवारों, छतों और प्लास्टर में पनपने वाली छोटी-मोटी खामियां शुरुआती स्तर पर ही दुरुस्त हो जाती हैं, जिससे आगे चलकर इमारत के भारी नुकसान और खर्चीली मरम्मत की नौबत नहीं आती.

















