घर के आंगन में तुलसी का पौधा होना बेहद शुभ माना जाता है क्योंकि यह वातावरण को शुद्ध रखने के साथ-साथ कई तरह के औषधीय लाभ भी देता है। इसकी पत्तियों में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण सर्दी-जुकाम से राहत दिलाते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। इसके अलावा इसकी महक से छोटे-मोटे कीड़े दूर रहते हैं और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक यह घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। हालांकि इस नायाब पौधे की सही देखभाल न की जाए तो यह बहुत जल्दी मुरझा कर सूख जाता है।
तुलसी लगाने का सही समय और दिशा
बाजार में मुख्य रूप से दो प्रकार की किस्में मिलती हैं, जिन्हें रामा तुलसी और श्यामा तुलसी कहा जाता है। दोनों के बीच मुख्य अंतर इनकी पत्तियों के रंग और स्वाद का होता है। रामा तुलसी की पत्तियां हल्के हरे रंग की और मीठी होती हैं, जबकि श्यामा तुलसी की पत्तियां गहरे हरे से लेकर बैंगनी रंग की होती हैं और इनकी सुगंध काफी तेज होती है। श्यामा तुलसी भगवान कृष्ण को प्रिय होने के कारण कृष्ण तुलसी भी कहलाती है और इसका उपयोग मुख्य रूप से औषधीय कार्यों में होता है। घर में लगाने और पूजा-पाठ के लिए रामा तुलसी को सबसे उत्तम माना जाता है। इसे लगाने के लिए सबसे अच्छे दिन गुरुवार और शुक्रवार हैं, जबकि सबसे बढ़िया महीना अक्टूबर से नवंबर यानी कार्तिक मास या फरवरी का माना जाता है। वास्तु के अनुसार इसे हमेशा ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व या पूर्व दिशा में रखना चाहिए।
गमला खरीदते समय और पानी देते वक्त रखें ध्यान
नर्सरी में तुलसी का साधारण पौधा तीस से साठ रुपये के बीच मिल जाता है और गमले समेत इसकी कीमत अस्सी से सौ रुपये तक होती है। खरीदते समय यह ध्यान रखें कि पौधा कम से कम एक महीने पुराना और स्वस्थ हो। चूंकि यह गर्मियों का पौधा है, इसलिए इसे रोजाना कम से कम आठ घंटे की धूप मिलनी चाहिए। पौधे में पानी हमेशा जरूरत के हिसाब से ही डालें क्योंकि ज्यादा पानी देने से जड़ें सड़ सकती हैं और उनमें फंगस लग सकती है। पौधे की रिपॉटिंग या कटाई-छंटाई केवल मानसून के सीजन में या फरवरी के महीने में ही करनी चाहिए, गर्मियों में ऐसा करने से बचना चाहिए। गमले में गिरने वाली पीली पत्तियों को तुरंत हटा देना चाहिए क्योंकि उनमें मौजूद कीड़े मिट्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
मिट्टी हमेशा ऐसी होनी चाहिए जिससे अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल सके ताकि जलभराव की समस्या न हो। हर दस से पंद्रह दिन के अंतराल पर मिट्टी की हल्की गुड़ाई करते रहना बेहद जरूरी है ताकि जड़ों तक धूप पहुंच सके। बारिश के मौसम में पौधे को ऐसी जगह पर रखें जहां हल्का पानी ही पड़े और गर्मियों में इसे पूरे दिन की तेज धूप से बचाकर रखें। मिट्टी तैयार करते समय चालीस प्रतिशत सामान्य बगीचे की मिट्टी, तीस प्रतिशत वर्मी कंपोस्ट या पुरानी गोबर की खाद और तीस प्रतिशत कोकोपीट या धान की भूसी का इस्तेमाल करना चाहिए।
पौधे को घना और हरा-भरा बनाने के लिए जब यह छह से सात इंच का हो जाए, तो इसकी मुख्य शाखा के ऊपरी हिस्से को काट दें ताकि यह अपनी ऊर्जा अन्य शाखाओं को बढ़ाने में लगाए। कुछ महीनों बाद फिर से प्रूनिंग करने से पौधा घना हो जाता है। इसके अलावा पौधे में आने वाली मंजरी यानी फूलों को समय-समय पर हटाते रहना चाहिए क्योंकि बीज बनाने में पौधा अपनी ताकत खर्च कर देता है जिससे उसकी सामान्य ग्रोथ रुक जाती है। कीड़ों से बचाव के लिए हर पंद्रह से बीस दिन के अंतराल पर नीम के तेल का छिड़काव करते रहें।
पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए गमले में दो से तीन मुट्ठी वर्मी कंपोस्ट या पुरानी गोबर की खाद डाली जा सकती है। इसके साथ ही एक चम्मच नीम की खली और हल्दी पाउडर मिलाने से पौधे को जरूरी ग्रोथ मिलती है और वह फंगस से सुरक्षित रहता है। खाद डालने से पहले मिट्टी की गुड़ाई करना न भूलें। अगर वर्मी कंपोस्ट उपलब्ध न हो तो एक चम्मच ताजी चाय की पत्ती या कॉफी पाउडर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा सरसों की खली, चार से पांच दिन पुराना मट्ठा जिसे आधे लीटर पानी में मिलाया गया हो, या फिर आलू और केले के छिलकों का पाउडर भी बहुत फायदेमंद साबित होता है।
अगर आपकी तुलसी सूख रही है या उसकी पत्तियां पीली पड़ रही हैं, तो सबसे पहले सूखी टहनियों को काटकर उसकी हार्ड प्रूनिंग कर दें। इसके बाद दो चम्मच बोरेक्स यानी सुहागा मिट्टी में मिला दें जो एक बेहतरीन फफूंदनाशक का काम करता है। इसके अलावा पचास ग्राम गुड़ को एक लीटर पानी में घोलकर चौबीस घंटे बाद पौधे में डालने से सूखा हुआ पौधा भी दोबारा हरा-भरा हो जाता है।



















