पाली में गणेश चतुर्थी के पर्व को लेकर जहां एक तरफ चारों तरफ उत्सव और उत्साह का माहौल नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजा बली सर्कल के पास रखी हुई कुछ अधूरी और मुस्कुराती हुई प्रतिमाएं एक ऐसी व्यथा बयान कर रही हैं जिसमें खुशियों से ज्यादा तन्हाई और दर्द छिपा हुआ है। इस जगह पर पिछले 45 सालों से एक स्थानीय परिवार मिट्टी को संवारकर भगवान की सुंदर आकृतियां गढ़ने का काम कर रहा है। यह केवल इनके लिए जीविका कमाने का कोई माध्यम नहीं है, बल्कि इनका पूरा जीवन इसी कला के इर्द-गिर्द घूमता है। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि उन्हें इस काम के अलावा और कुछ नहीं आता है और उनके परिवार का भरण-पोषण इन्हीं मूर्तियों के जरिए होता है।
बीते साल की तबाही और भारी नुकसान
इस जश्न और रोशनी के पीछे का यथार्थ बहुत ही पीड़ादायक है। पिछले वर्ष गणेश चतुर्थी के अवसर पर भारी बारिश के कारण इस परिवार की कई मूर्तियां पानी भरने से नष्ट हो गई थीं, जिससे इन्हें लगभग 4.5 लाख रुपये का बहुत बड़ा वित्तीय घाटा उठाना पड़ा था। उस समय इन्हें पूरी उम्मीद थी कि इस बार की बिक्री से उस पुराने घाटे की भरपाई हो जाएगी, लेकिन हालात इसके बिल्कुल विपरीत साबित हुए और इनकी लागत तक वसूल नहीं हो पायी है।
गहने गिरवी रखने की मजबूरी और बाजार का सन्नाटा
इस साल एक बार फिर नई उम्मीदों का दामन थामते हुए इस परिवार ने बप्पा की नई प्रतिमाओं का निर्माण किया है। इस बार भी इन्होंने काम को आगे बढ़ाने के लिए दो लाख रुपये से ज्यादा की पूंजी लगा दी है। जब जेब बिल्कुल खाली थी और हाथ में कोई नगदी नहीं बची थी, तब इन्हें अपनी घर की महिलाओं के जेवर तक गिरवी रखने पड़ गए। इसके बावजूद त्योहार अब बेहद करीब आ चुका है, लेकिन बाजारों में खरीदारों की भारी कमी बनी हुई है। लोग आते हैं, मूर्तियों को देखते हैं और मोलभाव करके आगे निकल जाते हैं। खरीदारों की संख्या इतनी कम है कि लागत निकलना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार का कहना है कि उन्होंने अपने गहने गिरवी रखकर बप्पा को इसलिए गढ़ा था ताकि दूसरों के घरों में खुशियां आ सकें, लेकिन आज उनके खुद के घर का चूल्हा जलने पर संकट मंडरा रहा है.
प्रशासन से मदद की गुहार और कला बचाने की जद्दोजहद
पिछले पैंतालीस सालों की इस लंबी कलात्मक यात्रा के मुहाने पर खड़ा यह परिवार आज आर्थिक तंगी के उस दौर से गुजर रहा है जहां से आगे का रास्ता पूरी तरह धुंधला नजर आता है। इस हुनरमंद परिवार ने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के सामने गुहार लगाई है कि उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान की जाए ताकि उनकी यह पुरानी हस्तकला और उनका परिवार इस संकट से उबर सके। पूरे देश में गणपति के स्वागत की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन उन हाथों के बारे में कोई नहीं सोचता जो इन मूर्तियों में जान फूंकते हैं। पिछले साल साढ़े चार लाख का घाटा झेलने वाले इस परिवार के पास आज जीवन चलाने का कोई अन्य जरिया नहीं बचा है और सरकार से इन्हें मदद का इंतजार है।



















