जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 2025 के पदोन्नति नियमों के आधार पर की जा रही नियुक्तियों और प्रमोशन पर किसी भी प्रकार की रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि फिलहाल वे अंतरिम आवेदन पर विचार कर रहे हैं, इसलिए राज्य सरकार का पक्ष सामने आना अत्यंत आवश्यक है। न्यायालय ने मध्य प्रदेश सरकार को अपना औपचारिक जवाब दायर करने के लिए 13 जुलाई तक की समय सीमा निर्धारित की है। इस तारीख तक पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया पर कोई भी अस्थायी प्रतिबंध लागू नहीं रहेगा।
प्रशासनिक कार्यों की पूर्ण स्वतंत्रता
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि राज्य सरकार प्रशासनिक स्तर पर अपना काम जारी रखने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है। सरकारी मशीनरी को पदोन्नति से संबंधित तैयारियां करने या अन्य संबंधित गतिविधियों को आगे बढ़ाने में किसी भी तरह की कानूनी बाधा नहीं है। सुनवाई के दौरान सपाक्स और अजाक्स के प्रतिनिधियों के बीच तीखी बहस देखी गई, जिसके बाद न्यायालय ने सरकार को अपने स्तर पर कार्य जारी रखने की छूट दी है।
विभिन्न पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान सपाक्स के पक्ष ने यह आरोप लगाया कि राज्य सरकार अपने वादों से मुकर रही है। उन्होंने दावा किया कि पिछली सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से सकारात्मक आश्वासन दिया गया था और उनके पास संबंधित वीडियो साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। इसके विपरीत, अजाक्स के वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने तर्क दिया कि अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड में प्रमोशन प्रक्रिया को रोकने का कोई भी लिखित आदेश दर्ज नहीं है। उनके अनुसार, केवल मौखिक आश्वासनों के आधार पर सरकारी कामकाज को ठप नहीं किया जा सकता है।
अदालत का दृष्टिकोण
सपाक्स की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा ने अदालत को याद दिलाया कि महाधिवक्ता ने पहले भरोसा दिलाया था कि मामले के अंतिम फैसले तक नए नियमों के तहत पदोन्नति नहीं की जाएगी। उन्होंने इस दावे को पुष्ट करने के लिए पिछले सत्र के वीडियो फुटेज पेश करने की पेशकश की और तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की मांग की। हालांकि, दोनों पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देने से मना कर दिया और प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दे दी।











