चीन की अर्थव्यवस्था इस वक्त दो बिल्कुल उलटे संकेत एक साथ दे रही है। उसकी फैक्ट्रियां, खासकर हाई-टेक फैक्ट्रियां, पूरी रफ्तार से चल रही हैं, लेकिन जिन ग्राहकों, घर खरीदारों और कारोबारियों को यह पैसा बाज़ार में लौटाना है, वे लगभग खामोश पड़ गए हैं। साल की पहली छमाही के आंकड़ों में यही खाई सबसे साफ दिखती है, और बीएनवाई के जेफ यू के विश्लेषण का यही मुख्य निचोड़ है। उनके मुताबिक अर्थव्यवस्था का सारा बोझ इस वक्त उत्पादन उठा रहा है, जबकि घरेलू मांग लगातार कमज़ोर बनी हुई है।
सरकारी आकलन अब भी सकारात्मक
पहली छह महीनों को लेकर चीन का अपना आकलन कुल मिलाकर भरोसे वाला है। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो ने कहा कि बाहरी दबावों के बावजूद अर्थव्यवस्था "एक उचित दायरे में चली"। ब्यूरो ने तेज़ उत्पादन, स्थिर रोज़गार, कीमतों में हल्की बढ़त, मज़बूत विदेशी व्यापार और नए ग्रोथ इंजनों के तेज़ विकास को गिनाया। लेकिन इस आत्मविश्वास के साथ एक चेतावनी भी जुड़ी थी। अधिकारियों ने खुलकर माना कि बाहरी माहौल लगातार अस्थिर होता जा रहा है और घरेलू मांग अब भी नाकाफी है। यू के लिए यही स्वीकारोक्ति इस दलील को और मज़बूत करती है कि खर्च को दोबारा पटरी पर लाने के लिए और बड़े, सोच-समझकर उठाए गए रिफ्लेशन कदमों की ज़रूरत है।
ताकत उत्पादन में छिपी है
रिपोर्ट में उत्पादन के आंकड़े ही असली अच्छी खबर हैं। साल की शुरुआत से अब तक औद्योगिक वैल्यू एडेड साल-दर-साल 5.4% बढ़ा, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग 5.6% ऊपर रही और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग तो कहीं आगे 13.3% की छलांग के साथ सबसे तेज़ रही। छमाही बीतते-बीतते रफ्तार और बढ़ी। जून में उत्पादन साल-दर-साल 5.3% पर पहुंच गया, जो मई में 4.5% था। सबसे चमकदार बढ़त उन्हीं क्षेत्रों में दिखी जो चीन के आधुनिक तकनीक पर दांव से जुड़े हैं। 3D प्रिंटिंग उपकरणों का उत्पादन साल-दर-साल 48.5% उछला, लिथियम-आयन बैटरियां 39.3% और औद्योगिक रोबोट 28.0% बढ़े। ये आंकड़े मिलकर बताते हैं कि पुराने इंजन भले सुस्त पड़ रहे हों, अर्थव्यवस्था ऑटोमेशन, बिजली आधारित तकनीक और अगली पीढ़ी की मैन्युफैक्चरिंग पर पूरी ताकत झोंक रही है।
निवेश और प्रॉपर्टी में असली कमज़ोरी
असली दिक्कत निवेश और प्रॉपर्टी के आंकड़ों में खुलकर सामने आती है, जिन्हें यू ने अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ बताया है। ग्रामीण परिवारों को छोड़कर फिक्स्ड-एसेट निवेश पहली छमाही में साल-दर-साल 5.7% गिरा। इसे तोड़कर देखें तो तस्वीर असमान है। प्राथमिक क्षेत्र में निवेश 0.9% बढ़ा, लेकिन द्वितीयक क्षेत्र में 1.1% और सेवा यानी तृतीयक क्षेत्र में भारी 8.4% की गिरावट आई। इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और निजी निवेश, सब सिकुड़ गए। सबसे गहरी चोट रियल एस्टेट में लगी, जहां डेवलपमेंट निवेश 18.0% लुढ़क गया। यह इस बात की याद दिलाता है कि सालों से अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा प्रॉपर्टी संकट अब भी संभलने से कोसों दूर है।
रोज़गार और कर्ज़ ने थामा मोर्चा
श्रम और कर्ज़ के आंकड़े थोड़ी राहत देते हैं, हालांकि इतनी नहीं कि कमज़ोर मांग की तस्वीर को पलट दें। शहरी बेरोज़गारी दर पहली छमाही में औसतन 5.2% रही और जून में घटकर 5.0% पर आ गई, जबकि दूसरी तिमाही के अंत तक प्रवासी मज़दूरों की संख्या साल-दर-साल 0.5% बढ़ चुकी थी। पैसे के मोर्चे पर, अर्थव्यवस्था में कर्ज़ का सबसे बड़ा पैमाना माने जाने वाला कुल सोशल फाइनेंसिंग साल-दर-साल 7.4% बढ़कर ¥462.06 ट्रिलियन पर पहुंच गया। लेकिन नई पूंजी का प्रवाह पिछले साल के मुकाबले पतला रहा। पहली छमाही में अतिरिक्त फाइनेंसिंग एक साल पहले की इसी अवधि से ¥2.02 ट्रिलियन कम रही, जो बताता है कि कर्ज़ लेने और देने वाले, दोनों फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं।
यह खाई क्यों मायने रखती है
सारे टुकड़ों को साथ रखकर देखें तो चीन की समस्या की शक्ल साफ हो जाती है। अर्थव्यवस्था की सप्लाई साइड कोई मसला नहीं है। देश बना सकता है, और खूब बना सकता है, खासकर उन आधुनिक क्षेत्रों में जिन पर उसने अपना भविष्य टिका रखा है। जो चीज़ गायब है, वह है घर के अंदर इतनी मज़बूत मांग जो इस सारे उत्पादन को खपा सके। जब उत्पादन तेज़ हो रहा हो, लेकिन निवेश सिकुड़ रहा हो, प्रॉपर्टी गिरती जा रही हो और कर्ज़ की रफ्तार धीमी पड़ रही हो, तो खतरा यह है कि माल तो बनता रहे पर खरीदार न मिलें और कीमतें नरम बनी रहें। यही वजह है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो का "नाकाफी घरेलू मांग" वाला इशारा आने वाले महीनों में भारी पड़ सकता है।
बड़े प्रोत्साहन की दलील
अब बहस का रुख इसी ओर मुड़ रहा है कि क्या बीजिंग सिर्फ फैक्ट्रियों के भरोसे रहने के बजाय खपत बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को दोबारा गरमाने के लिए ठोस कदम उठाएगा। रिफ्लेशन का सीधा मतलब है मांग और कीमतों में जान फूंकने के लिए नीतिगत सहारा देना, फिर चाहे वह ब्याज दरों के ज़रिए हो, सरकारी खर्च से हो या लोगों की जेब में सीधे पैसा पहुंचाकर। पहली छमाही के आंकड़े इसी दलील को मज़बूती देते हैं। उत्पादन की मज़बूती दिखाती है कि क्षमता की कोई कमी नहीं है, जबकि गिरता निवेश और सुस्त खपत बताती है कि असली अड़चन मांग की तरफ है। जब तक घरेलू मांग नहीं लौटती, अकेले उत्पादन के दम पर टिकाऊ रफ्तार बनाए रखना चीन के लिए मुश्किल बना रहेगा।











