भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से शुरू की गई विशेष विदेशी मुद्रा स्वॉप सुविधा को वित्तीय प्रणाली में डॉलर की तरलता मजबूत करने के प्रयासों के तहत जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। केंद्रीय बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 21 अगस्त 2026 तक इस विशेष व्यवस्था के जरिए कुल 72.85 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई जा चुकी है। यह पहल ऐसे समय में बेहद अहम साबित हो रही है जब रुपया और वैश्विक मुद्रा बाजार लगातार बाहरी दबावों का सामना कर रहे हैं।
FCNR(B) जमाओं की रही सबसे बड़ी हिस्सेदारी
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा योगदान नॉन-Resident (बैंक) यानी FCNR(B) जमाओं का रहा है। बैंकों ने अकेले इस रास्ते से 65.397 अरब डॉलर जुटाए हैं, जो इस विशेष सुविधा के तहत एकत्रित कुल राशि का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि अनिवासी भारतीयों द्वारा की जाने वाली विदेशी मुद्रा जमाएं देश में फॉरेन करेंसी लाने का सबसे मजबूत जरिया बनकर उभरी हैं।
विभिन्न माध्यमों से जुटाए गए आंकड़े
केंद्रीय बैंक के आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि FCNR(B) के अलावा अन्य रास्तों से भी विदेशी मुद्रा जुटाई गई है। ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स यानी OFCBs के जरिए 4.86 अरब डॉलर का योगदान मिला। इसके अलावा, एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स यानी ECBs के माध्यम से 2.591 अरब डॉलर की राशि जुटाई गई। इन तीनों अलग-अलग रास्तों ने मिलकर देश के भीतर विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।
क्या होती है FCNR(B) जमा योजना?
FCNR(B) का मतलब फॉरेन करेंसी नॉन-Resident (बैंक) अकाउंट होता है। यह एक ऐसी टर्म डिपॉजिट है जिसे अनिवासी भारतीय पारंपरिक भारतीय रुपये के बजाय अधिकृत विदेशी मुद्राओं में ही भारतीय बैंकों के पास रख सकते हैं। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये जमाएं विदेशी मुद्रा के रूप में ही denominat रहती हैं। इसका मतलब यह है कि जमाकर्ता को पारंपरिक रुपये वाली जमाओं की तरह विनिमय दर के उतार-चढ़ाव के जोखिम का सामना नहीं करना पड़ता।
भारतीय बैंकों के दृष्टिकोण से देखें तो FCNR(B) जमाएं उन्हें विदेशी मुद्रा में फंडिंग हासिल करने का बेहतरीन साधन देती हैं। रिजर्व बैंक के विशेष स्वॉप अरेंजमेंट के तहत बैंक पात्र स्रोतों से विदेशी मुद्रा जुटाते हैं और उसे केंद्रीय बैंक के पास जमा करके उसके बदले रुपये की तरलता प्राप्त करते हैं।
यह स्वॉप तंत्र काफी सीधा और पारदर्शी है। बैंक सबसे पहले FCNR(B) जैसे पात्र माध्यमों से विदेशी मुद्रा एकत्र करते हैं और फिर रिजर्व बैंक की स्वॉप सुविधा का उपयोग करके उस विदेशी मुद्रा को रुपयों के साथ बदल लेते हैं। परिणाम यह होता है कि बैंकों को अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए जरूरी रुपये की तरलता मिल जाती है, जबकि रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा पहुंच जाती है।
इस पूरी व्यवस्था से वित्तीय प्रणाली में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता स्वतः मजबूत होती है और केंद्रीय बैंक को हाजिर मुद्रा बाजार में सीधे हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस सुविधा को वैश्विक वित्तीय बाजारों और रुपये पर पड़ रहे दबाव के बीच वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के मकसद से तैयार किया गया था।
विभिन्न मार्गों के लिए निर्धारित समयसीमा
हालांकि तीनों रास्तों को विदेशी मुद्रा प्रवाह को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू किया गया था, लेकिन उनकी समयसीमा अलग-अलग तय की गई है। FCNR(B) विंडो की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2026 है, जबकि ECBs और OFCBs की सुविधाएं 31 दिसंबर 2026 तक उपलब्ध रहेंगी। इसका सीधा मतलब यह है कि बैंकों के पास इस विशेष व्यवस्था के तहत अतिरिक्त FCNR(B) जमाएं लाने के लिए अब केवल बेहद सीमित समय बचा है।



















