अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार तीन कारोबारी सत्रों से जारी गिरावट पर ब्रेक लगाते हुए भारतीय रुपये ने गुरुवार को शानदार रिकवरी दर्ज की। संयुक्त राज्य अमेरिका की ट्रेजरी यील्ड में आई तेज गिरावट के कारण ग्रीनबैक पर दबाव बढ़ा, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं के प्रति निवेशकों का रुझान बेहतर हुआ। विदेशी मुद्रा बाजार में USD/INR जोड़ी सुधरकर 95.62 के स्तर के आसपास आ गई, जबकि ताजा कारोबारी सत्र के दौरान यह 95.61 के स्तर के पास कारोबार करती देखी गई। रुपये में आई इस मजबूती का मुख्य कारण अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की वह घोषणा रही, जिसमें उसने अपने दीर्घकालिक बॉन्ड बायबैक कार्यक्रमों के आकार को दोगुना करने की योजना का खुलासा किया। इस कदम से अमेरिकी उधारी लागत को सीमित करने में मदद मिली और लंबी अवधि की बॉन्ड यील्ड में भारी गिरावट दर्ज की गई।
बॉन्ड बायबैक दोगुना करने के ऐलान से अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बड़ी गिरावट
अमेरिकी वित्तीय बाजारों में उस समय बड़ा बदलाव देखने को मिला जब ट्रेजरी विभाग ने तरलता सहायता बायबैक परिचालन का दायरा बढ़ाने का निर्णय लिया। अमेरिकी वित्तीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, दीर्घकालिक नाममात्र प्रतिभूतियों के लिए बायबैक का अधिकतम आकार प्रति ऑपरेशन 2 अरब डॉलर से बढ़ाकर कम से कम 4 अरब डॉलर कर दिया जाएगा। इस रणनीतिक कदम का मुख्य उद्देश्य तेजी से बढ़ती उधारी लागत पर अंकुश लगाना है। इस घोषणा के सामने आते ही अमेरिकी ऋण बाजार में प्रतिफल दरें नीचे गिर गईं।
बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, 30 साल की अवधि वाले अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड मंगलवार के बंद स्तर से लगभग 2 प्रतिशत घटकर 5.18 प्रतिशत के करीब आ गई। इसी तरह, 10 साल की अवधि वाले अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड भी बुधवार को हुई गिरावट को बनाए रखते हुए 4.64 प्रतिशत के पास टिकी रही। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई इस नरमी ने सुरक्षित परिसंपत्ति के रूप में अमेरिकी डॉलर के आकर्षण को कम कर दिया। छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत को मापने वाला अमेरिकी डॉलर सूचकांक (DXY) बुधवार को दर्ज किए गए अपने सात हफ्तों के निचले स्तर 98.77 के आसपास दबाव में दिखाई दिया। बॉन्ड यील्ड में कमी आने से वैश्विक निवेशकों का जोखिम लेने का रुझान बढ़ा है, जिससे भारतीय रुपये जैसी जोखिम वाली मुद्राओं की मांग में सुधार हुआ है।
फेडरल रिजर्व की जुलाई बैठक के मिनट्स और मौद्रिक नीति का परिदृश्य
दूसरी ओर, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति समिति यानी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) की जुलाई बैठक के मिनट्स भी जारी किए गए। मिनट्स से संकेत मिलता है कि समिति के कई सदस्य इस पक्ष में थे कि यदि मुद्रास्फीति उच्च स्तर पर बनी रहती है, तो ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की आवश्यकता हो सकती है। हालांकि, कुछ सदस्यों ने तत्काल दर वृद्धि से परहेज करने का समर्थन किया और तर्क दिया कि अभी रुकने से भविष्य में अतिरिक्त दर वृद्धि की जरूरत से बचा जा सकता है।
इस नीतिगत परिदृश्य पर वित्तीय बाजार अनुसंधान फर्म जैफरीज के विश्लेषकों ने अपनी टिप्पणी दी है। जैफरीज के विश्लेषकों का मानना है कि "बैठक के बाद से जारी हुए आर्थिक आंकड़ों का अर्थ यह है कि मिनट्स अब पुरानी आर्थिक तस्वीर पेश करते हैं।" इसका तात्पर्य यह है कि जुलाई बैठक के बाद आए आंकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति को बदल दिया है, जिससे फेड द्वारा निकट भविष्य में आक्रामक रुख अपनाने की संभावना कम हो गई है।
USD/INR का तकनीकी विश्लेषण: सपोर्ट और रेजिस्टेंस के प्रमुख स्तर
तकनीकी चार्ट पर USD/INR की चाल एक सीमित दायरे में घूमती हुई दिखाई दे रही है। 14-अवधि का रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) 51.72 पर बना हुआ है, जो न्यूट्रल रेखा 50 से मामूली ऊपर है। वर्तमान में लाइव RSI स्तर 51 के आसपास बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि बाजार में खरीदारी की मामूली रुचि तो है, लेकिन कोई मजबूत ट्रेंडिंग आवेग मौजूद नहीं है।
गिरावट की स्थिति में, USD/INR जोड़ी के लिए पहला निकटतम सपोर्ट 20-अवधि के एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) के पास 95.55 के आसपास स्थित है। लाइव डेटा के अनुसार 20-ईएमए 95.57 पर और 50-ईएमए 95.47 पर मौजूद है। यदि गिरावट इस स्तर से नीचे बढ़ती है, तो 12 अगस्त का निचला स्तर 95.29 अगला सपोर्ट होगा। इसके नीचे 5 अगस्त का निचला स्तर 94.83 जोड़ी के लिए एक बड़ा तकनीकी सहारा माना जा रहा है। लाइव पिवट संकेतकों के अनुसार, S1 सपोर्ट 95.53 और S2 सपोर्ट 95.44 पर स्थित है।
उछाल की स्थिति में, USD/INR को अपनी तेजी जारी रखने के लिए 19 अगस्त के उच्चतम स्तर 95.76 को मजबूती से पार करना होगा। इस स्तर से ऊपर जाने के बाद ही जोड़ी 96.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर की ओर बढ़ सकती है। लाइव रेजिस्टेंस स्तरों में R1 95.72 और R2 95.83 पर देखा जा रहा है। व्यापक दृष्टिकोण से, USD/INR का 52 हफ्तों का दायरा 85.86 से 97.05 के बीच रहा है, और 50-दिवसीय तथा 200-दिवसीय मूविंग एवरेज में गोल्डन क्रॉस संरचना बनी हुई है।
भारतीय रुपये की चाल तय करने वाले बुनियादी आर्थिक कारक
भारतीय रुपया वैश्विक और बाहरी कारकों के प्रति बेहद संवेदनशील मुद्राओं में शामिल है। रुपये के मूल्य को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें सबसे महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। इसके अलावा, चूंकि वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की विनिमय दर और देश में आने वाला विदेशी निवेश रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने और इसे स्थिर बनाए रखने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में सीधा हस्तक्षेप करता है। इसके साथ ही, आरबीआई देश में खुदरा मुद्रास्फीति को अपने 4 प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास सीमित रखने के लिए ब्याज दरों का समायोजन करता है। आमतौर पर, ऊंची ब्याज दरें रुपये को मजबूती प्रदान करती हैं। इसका कारण 'कैरी ट्रेड' की प्रक्रिया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय निवेशक कम ब्याज दर वाले देशों से कर्ज लेकर भारत जैसे उच्च ब्याज दर वाले देशों में पैसा लगाते हैं ताकि दरों के अंतर से लाभ कमाया जा सके।
इसके अतिरिक्त, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर, व्यापार संतुलन और वास्तविक ब्याज दरें (ब्याज दर घटा मुद्रास्फीति) भी रुपये के मूल्य को प्रभावित करती हैं। मजबूत आर्थिक विकास दर विदेशी निवेशकों को आकर्षित करती है, जिससे रुपये की मांग बढ़ती है। व्यापार घाटे में कमी आने से भी रुपया मजबूत होता है। यदि भारत में मुद्रास्फीति अन्य देशों की तुलना में तेजी से बढ़ती है, तो यह रुपये के लिए नकारात्मक होती है क्योंकि इससे आयात महंगा हो जाता है। हालांकि, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए जब आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाता है, तो विदेशी पूंजी के आगमन से रुपये को पुनः समर्थन मिलता है।
वैश्विक मुद्रा, कमोडिटी और क्रिप्टोकरेंसी बाजारों का हाल
अमेरिकी बॉन्ड बायबैक और डॉलर की कमजोरी का असर अन्य वैश्विक परिसंपत्तियों पर भी देखने को मिला। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान GBP/USD जोड़ी में थोड़ी गिरावट आई और यह 11 मई के बाद के अपने उच्चतम स्तर से नीचे खिसककर 1.3600 के स्तर से नीचे आ गई। हालांकि, तकनीकी आधार अभी भी बुलिश बना हुआ है। दूसरी ओर, EUR/USD जोड़ी मई के अंत के बाद के अपने उच्चतम स्तर के पास 1.1700 के आंकड़े से ठीक नीचे समेकन (कंसोलिडेशन) के दौर में प्रवेश कर गई है।
सुरक्षित निवेश मानी जाने वाली सोने की कीमतों में भी जून की शुरुआत के बाद के उच्चतम स्तर से थोड़ा मुनाफावसूली देखी गई। बुधवार को सोने में 3 प्रतिशत से अधिक की बड़ी तेजी दर्ज की गई थी, जिसके बाद गुरुवार को FOMC मिनट्स और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच डॉलर की बिकवाली थमी और सोने पर मामूली दबाव आया।
डिजिटल परिसंपत्ति बाजार में, अमेरिकी ट्रेजरी द्वारा बॉन्ड बायबैक के बाद क्रिप्टोकरेंसी बाजार में आए उछाल के चलते प्रमुख ऑल्टकॉइन्स स्थिर बने हुए हैं। रिपल (XRP) पिछले दिन की 10 प्रतिशत की बढ़त के बाद लगभग $1.0951 पर कारोबार कर रहा है। इसी तरह सोलाना (SOL) और कार्डानो (ADA) में भी तेजी के बाद स्थिरता देखी जा रही है, जिससे व्यापक वित्तीय बाजारों में तरलता की स्थिति में सुधार का संकेत मिलता है।



















