स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाने वाले युवाओं के बीच ऐसा कारोबार हमेशा पहली पसंद होता है, जिसमें शुरुआती पूंजी सीमित लगे और आमदनी हर मौसम में लगातार बनी रहे। अक्सर बिना ठोस तैयारी के शुरू किए गए नए काम जोखिम में पड़ जाते हैं, लेकिन प्रकृति और हरियाली से जुड़ा नर्सरी का काम साल के पूरे बारह महीने सुरक्षित कमाई का आधार बन सकता है। बिहार के भागलपुर में कई लोग इस व्यवसाय को अपनाकर कम निवेश के साथ नियमित मुनाफा कमा रहे हैं। इस पूरे मॉडल की ताकत यह है कि एक इकाई तैयार करने में दो से तीन रुपये का खर्च आता है, जबकि बाजार में वही चीज दस रुपये से लेकर सौ रुपये तक के भाव पर आसानी से बिक जाती है।
कलम तैयार करने की विधि से लागत में भारी कमी
नर्सरी के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय अशोक चौधरी के अनुसार, इस पूरे काम में मुनाफा बढ़ाने का सबसे कारगर तरीका खुद की सामग्री तैयार करना है। किसी बाहरी सप्लायर से तैयार पौध खरीदकर सीधे बेचने पर मार्जिन घट जाता है, जबकि यदि आप खुद ग्राफ्टिंग यानी कलम बांधने की तकनीक का इस्तेमाल करें तो लागत नगण्य रह जाती है। एक स्वस्थ कलम अथवा छोटा पौधा तैयार करने पर महज 2 से 3 रुपये की लागत बैठती है। यदि इस आरंभिक पौधे को स्थानीय बाजार में केवल 10 रुपये में भी बेच दिया जाए, तो प्रति इकाई 7 से 8 रुपये का सीधा शुद्ध लाभ हाथ आता है।
प्रतिदिन के कारोबार के हिसाब से यदि कोई व्यक्ति रोज सिर्फ 100 छोटे पौधे भी ग्राहकों तक पहुंचा दे, तो हर दिन एक सम्मानजनक और स्थिर बचत जमा होने लगती है। इसके अतिरिक्त, यदि पौधा तुरंत नहीं बिकता और वह बढ़कर दो से ढाई फीट की ऊंचाई हासिल कर लेता है, तो उसी पौधे का मूल्य बाजार में 75 से 100 रुपये तक पहुंच जाता है। समय बीतने के साथ पौधे का बड़ा होना इस काम में किसी नुकसान के बजाय अतिरिक्त लाभ में बदल जाता है।
नर्सरी के प्रकार और सुरक्षित निवेश का चुनाव
व्यावसायिक स्तर पर मुख्य तौर पर तीन श्रेणियों में नर्सरी स्थापित की जाती है। पहली श्रेणी सजावटी और फूलों की होती है, जिसमें लैंडस्केपिंग और बागवानी के विविध फूलदार पौधे शामिल रहते हैं। दूसरी श्रेणी फलदार पेड़ों की है, जिसमें आम, अमरूद और नींबू जैसे बारहमासी फलों के पौधे तैयार किए जाते हैं। तीसरी श्रेणी मौसमी सब्जियों और अल्पकालिक फसलों की होती है, जिसमें मिर्च, पपीता और विभिन्न सीजनल सब्जियों की पौध शामिल है।
जोखिम के पैमाने पर देखा जाए तो मौसमी सब्जियों अथवा पपीते की पौध में नुकसान की आशंका अपेक्षाकृत अधिक रहती है, क्योंकि यदि तय समयसीमा में उनकी बिक्री न हो तो वे खेत या थैलियों में ही खराब होने लगती हैं। दूसरी ओर, फल और फूलों के पौधों में बर्बादी का अंदेशा न के बराबर रहता है। यदि फलदार पौधे निर्धारित सप्ताह में नहीं भी बिकते, तो उनकी वृद्धि जारी रहती है और वे बाद में और भी अधिक कीमत पर बिकते हैं। समुचित तकनीकी देखरेख और निरंतर मेहनत के साथ यदि इस उपक्रम को आगे बढ़ाया जाए, तो यह साधारण पूंजी लगाने वाले व्यक्ति को भी कम समय में मजबूत वित्तीय स्थिति में ला सकता है।



















