तिलहन की कटाई और मड़ाई का काम पूरा होने के बाद खेतों में अक्सर पौधों के सूखे डंठल बिखरे रह जाते हैं। सुल्तानपुर समेत पूरे अवध क्षेत्र में आम बोलचाल में इसे पिंजी या सरसों का डंडा कहा जाता है। ज्यादातर किसान इसे बेकार अवशेष या कूड़ा मानकर या तो खेत में ही छोड़ देते हैं या फिर अनुपयोगी समझकर बाहर फेंक देते हैं। उचित प्रबंधन और थोड़ी सी मेहनत से यही सूखा बायोमास किसानों की अतिरिक्त कमाई का एक मजबूत जरिया बन सकता है। कई ऐसे पारंपरिक और व्यावसायिक तरीके मौजूद हैं, जिनके जरिए इस कृषि अपशिष्ट से बाजार में नियमित आमदनी हासिल की जा सकती है।
सफाई के लिए बड़े पैमाने पर उपयोगी झाड़ू का निर्माण
व्यावसायिक नजरिए से सरसों के सूखे डंठल बहुत काम के साबित होते हैं। किसान अनिल कुमार के मुताबिक इन डंठलों को आपस में व्यवस्थित रूप से बांधकर मजबूत झाड़ू बनाई जा सकती है। यद्यपि ये झाड़ू लंबे समय तक चलने वाली स्थायी झाड़ू नहीं होतीं, लेकिन खलिहानों, बड़े चबूतरों और खुले विस्तृत परिसरों की त्वरित सफाई के लिए इन्हें बेहद कारगर माना जाता है। ग्रामीण और कस्बाई बाजारों में ऐसी कच्ची झाड़ू आसानी से 25 से 30 रुपये प्रति नग के भाव पर बिक जाती हैं, जिससे बिना किसी बड़े निवेश के तुरंत नकद राशि मिल जाती है।
पशु बाड़ों के लिए सुरक्षात्मक टटिया का निर्माण
गांवों में पशुओं की देखभाल और घरेलू भंडारण के लिए टटिया का व्यापक प्रयोग होता है। ग्रामीण परिवार इसका इस्तेमाल जानवरों को कड़ाके की ठंड और तेज हवाओं से बचाने के लिए बाड़ा घेरने, भूसा ढकने और उपलों को वर्षा या नमी से सुरक्षित रखने में करते हैं। जब सरसों के सूखे डंठलों को अरहर के डंठलों के साथ मिलाकर एक सघन जालीदार टटिया तैयार की जाती है, तो वह काफी टिकाऊ और हवा रोकने में सक्षम बनती है। स्थानीय स्तर पर ऐसी एक टटिया बाजार में लगभग 1000 रुपये तक में बिकती है, जिससे किसानों को डंठल की अच्छी कीमत मिल जाती है।
ईंट भट्ठों के लिए बायोमास ईंधन के रूप में आपूर्ति
ईंट निर्माण उद्योग में सरसों के डंठल की नियमित और भारी मांग रहती है। ईंट पकाने के दौरान भट्ठों में कोयले के साथ आग को तेजी से भड़काने और आंच को समान रूप से फैलाने के लिए यह सूखा डंठल अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है। भट्ठों पर बेचने के लिए जरूरी शर्त यह है कि डंठल अच्छी तरह से थ्रेशर से मड़ा हुआ हो और छोटे-छोटे टुकड़ों में कटा हुआ हो। इस तरह तैयार किए गए मड़े हुए डंठल की कीमत बाजार में लगभग 800 रुपये प्रति कुंतल तक पहुंच जाती है, जिससे किसान थोक स्तर पर मोटी कमाई कर सकते हैं।
खेत की उर्वरता बढ़ाने के लिए पोषक जैविक खाद
यदि किसान इन डंठलों को सीधे बाजार में बेचना नहीं चाहते, तो वे अपनी खुद की फसल के लिए इनसे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार कर सकते हैं। इसके लिए खेत या घर के पास एक चौड़ा परंतु कम गहराई वाला गड्ढा खोदना होता है। इस गड्ढे में सरसों के सूखे डंठलों को अच्छी तरह बिछाकर उसके ऊपर करीब 3 इंच मिट्टी की परत चढ़ा दी जाती है। इसके उपरांत उस पर हल्का पानी छिड़क कर नमी बना दी जाती है। लगभग 2 से 3 महीने के भीतर यह सारा वानस्पतिक कचरा प्राकृतिक रूप से गलकर सड़ जाता है, जिससे पौधों के लिए पोषक तत्वों से भरपूर शुद्ध जैविक खाद तैयार हो जाती है।



















