निजी और कॉरपोरेट क्षेत्र में लगातार हो रही उथल-पुथल ने कामकाजी युवाओं के सोचने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। दफ्तरों में अनिश्चितता, छंटनी की दहशत और अत्यधिक मानसिक तनाव के बीच अब स्मार्टफोन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स आजीविका का एक बड़ा माध्यम बनकर उभरे हैं। कभी केवल मनोरंजन और शौक का जरिया माने जाने वाले वीडियो निर्माण को आज युवा एक पूर्णकालिक पेशे के रूप में अपना रहे हैं। पारंपरिक नौकरियों में पद और सुरक्षा के डांवाडोल होने के साथ ही डिजिटल दुनिया एक आकर्षक विकल्प के रूप में स्थापित हो रही है।
कॉरपोरेट जगत में गहराता छंटनी का संकट
साल 2026 कॉरपोरेट जगत में कार्यरत वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए बेहद कठिन साबित हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में 1.8 लाख से अधिक लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं, जो औसतन 722 लोग प्रतिदिन की दर बैठती है। इस दौर में छंटनी केवल एक शब्द नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के लिए एक कड़वी सच्चाई बन गई है।
स्टाफिंग फर्म टीमलीज के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 तक ही लगभग 10,000 से 15,000 तकनीकी पेशेवर मौन विदाई यानी 'साइलेंट एग्जिट' का शिकार हो चुके थे। पूरे वर्ष के लिए यह अनुमान 25,000 से 35,000 कर्मचारियों तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।
तकनीकी नौकरियों में गिरावट और स्वचालन का असर
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, इस पूरे संकट के पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रसार और स्वचालन मुख्य वजह बनकर सामने आए हैं। कई तरह की पुरानी भूमिकाएं अब पूरी तरह निष्प्रभावी हो गई हैं।
इसी रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि नए स्नातकों यानी फ्रेशर्स के लिए आईटी क्षेत्र में नियुक्तियां अपने चरम स्तर से 80 प्रतिशत तक घट चुकी हैं। वहीं सक्रिय तकनीकी रिक्तियों की संख्या जून 2026 में 28 महीनों के निचले स्तर लगभग 93,000 पर पहुंच गई। दफ्तरों में जब पदोन्नति की सीढ़ी हिलती दिखी, तो युवाओं को फॉलोअर्स और डिजिटल पहुंच अधिक सुरक्षित रास्ता प्रतीत होने लगी।
इंजीनियरिंग छोड़कर व्लॉगिंग की राह
पहले के दौर में जहां वीडियो बनाने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था, वहीं आज प्रभाव पैदा करने वाले इन्फ्लुएंसर्स को समाज में न केवल सराहना मिल रही है, बल्कि वे कॉरपोरेट वेतन से अधिक आमदनी भी जुटा रहे हैं। इसका एक जीता-जागता उदाहरण ऑटोमोटिव इन्फ्लुएंसर प्रियंका प्रसाद हैं, जो सोशल मीडिया पर @seagullsgirlfriend नाम से सक्रिय हैं।
प्रियंका प्रसाद ने अपनी पुरानी कॉरपोरेट जिंदगी और नए सफर पर बात करते हुए बताया कि उन्होंने पांच वर्षों तक एक जापानी फिनटेक कंपनी में वरिष्ठ सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम किया था, जहां उनका मासिक वेतन लगभग 2 लाख रुपये था। उन्होंने कहा, "पांच साल बाद लगा कि मैं बिना छुट्टी लिए लगातार काम कर रही हूं और तनाव के कारण धड़कनें हमेशा तेज रहती थीं। अत्यधिक थकान के बाद मैंने इस्तीफा दे दिया। अब इंस्टाग्राम पर 90,000 फॉलोअर्स हैं, मुझे यात्रा करने की पूरी आजादी है, मैं अपनी खुद की मालिक हूं और तय कर सकती हूं कि मुझे क्या करना है और क्या नहीं।"
सस्ता इंटरनेट और कस्बों में क्रिएटर क्रांति
इस पूरे बदलाव की नींव पिछले पांच वर्षों में बेहद सस्ते डेटा और किफायती स्मार्टफोन के विस्तार से तैयार हुई है। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण यानी ट्राई के आंकड़ों के अनुसार, भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2020 के 62.2 करोड़ से बढ़कर 2025 तक लगभग 95.8 करोड़ पर पहुंच गई।
खास बात यह है कि क्षेत्रीय भाषाओं की लोकप्रियता के कारण ग्रामीण भारत में भी इंटरनेट का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। आज छोटे शहरों के क्रिएटर इस पूरी अर्थव्यवस्था में सबसे तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस की क्रिएटर इकोनॉमी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2020 में जहां मात्र 96 लाख क्रिएटर थे, वहीं 2025 तक इनकी अनुमानित संख्या बढ़कर 4.12 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश का हर 10 में से 1 इंटरनेट यूजर किसी न किसी रूप में कंटेंट बना रहा है, और भारत के कुल क्रिएटर्स में से 66 प्रतिशत महानगरों से बाहर के इलाकों में रहते हैं।
कमाई का गणित और मुद्रीकरण की सीमाएं
कंटेंट क्रिएशन के इस बड़े आंकड़े के बीच सबसे बड़ा सवाल कमाई का है। भले ही देश में 4 करोड़ से अधिक क्रिएटर मौजूद हैं, लेकिन इनमें से केवल 8 से 10 प्रतिशत लोग ही प्रभावी ढंग से मुद्रीकरण कर पाते हैं और वास्तविक आय जुटाने में सफल होते हैं।
अपनी आय के संदर्भ में प्रियंका प्रसाद ने साझा किया कि शुरुआत के कुछ महीने मुश्किल भरे रहे, लेकिन निरंतरता बनाए रखने के कारण 6 से 8 महीनों के भीतर इंस्टाग्राम से कमाई शुरू हो गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब उन्हें एक रील के 30,000 से 40,000 रुपये तक मिल जाते हैं, जिससे महीने में पांच वीडियो बनाकर वे अपने पुराने कॉरपोरेट वेतन के बराबर कमा लेती हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आय हर महीने एक जैसी नहीं रहती, कभी यह पुराने वेतन से कम तो कभी ज्यादा होती है, और कुछ रील्स पर उन्हें 1 लाख रुपये तक की प्राप्ति भी हो जाती है।
यूट्यूब और इंस्टाग्राम का राजस्व ढांचा
यूट्यूब पर आय का मुख्य जरिया विज्ञापन राजस्व होता है, हालांकि वैश्विक स्तर पर भारत की विज्ञापन दरें काफी कम हैं। लंबे वीडियो पर अधिकांश चैनलों को 1,000 व्यूज के बदले 50 से 200 रुपये की कमाई होती है, जबकि शॉर्ट्स वीडियो लंबे प्रारूप की तुलना में केवल 10 प्रतिशत के आसपास ही राजस्व देते हैं।
कमाई की यह दर विषय और वर्ग पर भी निर्भर करती है। उदाहरण के तौर पर, मनोरंजन सामग्री पर 1,000 व्यूज के लिए महज 10 से 40 रुपये मिलते हैं, जबकि वित्त और निवेश से जुड़े विषयों पर यह दर 80 से 250 रुपये तक पहुंच जाती है। इसके विपरीत, यदि दर्शक अमेरिका के हों, तो प्रति 1,000 व्यूज पर 670 से 1,340 रुपये तक की कमाई होती है, यही कारण है कि विदेशी दर्शकों की संख्या भारतीय चैनलों की आय को काफी बढ़ा देती है।
दूसरी तरफ इंस्टाग्राम भारत में प्रति व्यू के आधार पर सीधा भुगतान नहीं करता, इसलिए यहां क्रिएटर की आय पूरी तरह ब्रांड अनुबंधों पर निर्भर करती है। 50,000 से कम फॉलोअर्स वाले नैनो क्रिएटर प्रायोजित पोस्ट के लिए 1,000 से 12,000 रुपये तक लेते हैं। वहीं 50,000 से 100,000 फॉलोअर्स वाले माइक्रो क्रिएटर 8,000 से 80,000 रुपये प्रति पोस्ट तक शुल्क लेते हैं।
सरकारी नीतियां और कानूनी सुरक्षा
क्रिएटर्स की इस बढ़ती ताकत को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी इस अर्थव्यवस्था को औपचारिक ढांचा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। साल 2026 के आम बजट में सरकार ने देशभर के 15,000 माध्यमिक विद्यालयों और 500 कॉलेजों में एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर लैब्स स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए 250 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है ताकि छात्रों को डिजिटल निर्माण के क्षेत्र में आवश्यक प्रशिक्षण और अवसर मिल सकें।
इसके अलावा, अप्रैल 2026 में राज्यसभा द्वारा नेशनल क्रिएटर इकोनॉमी बिल पारित किया गया, जो डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स और यूट्यूबर्स को औपचारिक पहचान प्रदान करता है। पत्र सूचना कार्यालय के अनुसार, इस कानून के तहत ब्रांड अनुबंधों का मानकीकरण किया गया है, उच्च आय वाले क्रिएटर्स के लिए पंजीकरण अनिवार्य किया गया है, और स्वास्थ्य बीमा तथा सेवानिवृत्ति लाभ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से क्रिएटर वेलफेयर फंड के गठन का प्रावधान रखा गया है।
डिजिटल माध्यमों पर सफल होने वालों को काम के घंटों की स्वतंत्रता और रचनात्मक स्वायत्तता तो मिलती है, परंतु परिवर्तन की राह चुनने वाले युवाओं के सामने यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या यह नई अर्थव्यवस्था उन्हें पारंपरिक 9 से 5 की नौकरी जैसा दीर्घकालिक वित्तीय स्थायित्व प्रदान कर पाएगी।



















