एप्पल, एनवीडिया, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अमेज़न जैसी कंपनियों को सालों-साल तक जबरदस्त मुनाफा कमाते देखकर भारत के कई निवेशकों के मन में एक ही सवाल बार-बार उठता है, क्या मुंबई या दिल्ली में बैठा कोई आम आदमी सच में इन दिग्गज कंपनियों का हिस्सा खरीद सकता है, और अगर हां, तो क्या इसका तरीका बेहद पेचीदा है या फिर आसान? अच्छी खबर यह है कि अमेरिकी बाजार के इन बड़े नामों में पैसा लगाना पूरी तरह मुमकिन है, और यह काम उतना मुश्किल नहीं है जितना नए निवेशक अक्सर मान बैठते हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां कहां लिस्टेड हैं
इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे गहरा शेयर बाजार है, और यहां की सबसे कीमती कंपनियां न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE) और नैस्डैक पर लिस्टेड हैं। ज्यादातर निवेशक जिन दो बेंचमार्क पर नजर रखते हैं, वे हैं डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज, जिसमें 30 ब्लू-चिप कंपनियां शामिल हैं, और एसएंडपी 500। असली कारोबार यहीं होता है। जैसे भारत में बाजार पर सेबी नजर रखती है, वैसे ही अमेरिका में यह जिम्मेदारी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के पास है, जो नियम बनाती है और उन्हें सख्ती से लागू भी करती है।
भारतीय निवेशकों के लिए दो रास्ते
शुरुआत करने के मोटे तौर पर दो तरीके हैं। पहला, किसी पारंपरिक ब्रोकर के जरिए सीधे निवेश करना, और दूसरा, अपना पैसा गिफ्ट सिटी यानी गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी के रास्ते लगाना। दोनों ही पूरी तरह वैध हैं, और आपके लिए कौन सा सही रहेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना कंट्रोल चाहते हैं और कितनी कम झंझट।
जब आप ब्रोकर वाला रास्ता चुनते हैं, तो आपका पैसा अमेरिकी डॉलर में भेजा जाता है, और खाता फंड होने के बाद आप सिर्फ शेयर ही नहीं, बल्कि बॉन्ड, डेरिवेटिव्स, वैकल्पिक संपत्तियां और ETF तक खरीद सकते हैं। यह रास्ता बड़े संस्थागत निवेशकों में खासा लोकप्रिय है, जो अक्सर फिडेलिटी, चार्ल्स श्वाब और रॉबिनहुड जैसे जमे-जमाए अमेरिकी ब्रोकरों के जरिए काम करते हैं। जो लोग भारतीय प्लेटफॉर्म पर ही टिके रहना चाहते हैं, उनके लिए भी वेस्टेड फाइनेंस और इंडमनी जैसे कई विकल्प मौजूद हैं।
गिफ्ट सिटी का रास्ता, आसान शब्दों में
दूसरा विकल्प नए निवेशकों के लिए शायद ज्यादा सुविधाजनक है। गिफ्ट सिटी के जरिए निवेश करने वाले लोग इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर (IFSC) के उस ढांचे के तहत अंतरराष्ट्रीय प्रतिभूतियां खरीद सकते हैं, जिसे ग्लोबल एक्सेस प्रोवाइडर (GAP) कहा जाता है, और इनमें अमेरिकी कंपनियों के शेयर भी शामिल हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको विदेश में कोई ब्रोकरेज खाता खोलने की झंझट से पूरी तरह बचत हो जाती है, और पूरा इंतजाम भारतीय नियमों के दायरे में ही रहता है, जो कई लोगों को भरोसा देता है।
शुरुआत करने के लिए कागजी कार्रवाई भी बेहद हल्की है। बस आपके पास पैन और आधार कार्ड होना चाहिए, और आपकी KYC डिजिलॉकर के जरिए पूरी हो जाए, फिर आप तैयार हैं। आप बस अपने गिफ्ट सिटी वॉलेट में पैसे डालते हैं, जो फिलहाल इंडमनी पर उपलब्ध है और जल्द ही ग्रो तथा ज़ेरोधा जैसे प्लेटफॉर्म पर भी आने की उम्मीद है, और शेयर खरीदना शुरू कर देते हैं।
कब खरीद सकते हैं शेयर
समय का ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि अमेरिकी बाजार का अपना समय है, ईस्टर्न टाइम (ET) के मुताबिक सुबह 9:30 से शाम 4:00 बजे तक। भारतीय समय (IST) में यह खिड़की अमेरिकी कैलेंडर के साथ बदलती रहती है। डेलाइट सेविंग टाइम के दौरान, यानी मार्च के मध्य से नवंबर की शुरुआत तक, आप रात 7:00 बजे से देर रात 1:30 बजे तक कारोबार कर सकते हैं। स्टैंडर्ड टाइम के दौरान, यानी नवंबर की शुरुआत से मार्च के मध्य तक, यह सत्र रात 8:00 बजे से 2:30 बजे तक चलता है। यानी भारतीय निवेशकों के लिए अमेरिकी शेयरों की खरीदारी ज्यादातर देर शाम और आधी रात के बाद का काम है।
मुनाफे पर कितना टैक्स
कैपिटल गेन टैक्स वह टैक्स है जो आपको तब चुकाना पड़ता है जब आप कोई संपत्ति, चाहे वह प्रॉपर्टी हो, सोना हो या शेयर, खरीद कीमत से ज्यादा दाम पर बेचकर मुनाफा कमाते हैं। यह मुनाफा दो हिस्सों में बंटता है। शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG), यानी 12 महीने या उससे कम समय तक रखे गए निवेश पर, 15% की सीधी दर से टैक्स लगता है। लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG), यानी 12 महीने से ज्यादा समय तक रखे गए निवेश पर, 12.5% टैक्स लगता है। इसमें एक राहत भी है, किसी वित्त वर्ष में LTCG के पहले 1.25 लाख रुपये पूरी तरह टैक्स से मुक्त रहते हैं।
क्या आपको दो बार टैक्स लगने की चिंता है, एक बार अमेरिका में और दूसरी बार अपने देश में? भारत और अमेरिका के बीच हुए डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट (DTAA) की वजह से यह परेशानी खत्म हो जाती है, जिसके चलते कैपिटल गेन पर आम तौर पर सिर्फ भारत में ही टैक्स लगता है।
दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों का हिस्सेदार बनना अब सिर्फ वॉल स्ट्रीट के अंदरूनी लोगों तक सीमित नहीं रहा। भारतीय निवेशकों के लिए अमेरिकी शेयरों ने वैश्विक स्तर पर संपत्ति बनाने की एक नई खिड़की खोल दी है। लेकिन समझदारी इसी में है कि छलांग लगाने से पहले नियम, टैक्स और जोखिम अच्छी तरह समझ लिए जाएं।




















