अगर आपने जीवन में कभी किसी लक्ष्य के बेहद करीब पहुंचकर असफलता का स्वाद चखा है, तो रस्क मीडिया के बैनर तले बनी यह नई वेब सीरीज आपकी अपनी कहानी जैसी महसूस होगी। हालिया रिलीज हुई वेब सीरीज का यह नाइन टू FIVE रिव्यू बताता है कि कैसे यह शो महज एक दफ्तरी कहानी न रहकर आज के मेट्रो शहरों में रहने वाले युवाओं की असुरक्षा, उम्मीदों और कॉर्पोरेट दबाव का एक सजीव दस्तावेज बन जाता है। इस पूरी कहानी के केंद्र बिंदु में अनुज नाम का एक सीधा-साधा युवक है, जिसे उसके दोस्त और आसपास के लोग 'लगभग कुमार' कहकर पुकारते हैं। अनुज की जिंदगी का ट्रैजिडी-कॉमेडी पहलू यह है कि वह हर जगह पूरी शिद्दत से मेहनत करता है, लेकिन सफलता की अंतिम सीढ़ी पर पहुंचकर पिछड़ जाता है। कभी पढ़ाई के दौर में दूसरे स्थान पर रह जाना, कभी अपनी प्रेम कहानी में थोड़ा चूक जाना और कभी अपने करियर के बड़े मुकाम पर पहुंचते-पहुंचते रह जाना, अनुज की यह नियति बन चुकी है।
स्टार्टअप कल्चर और 'लगभग कुमार' की प्रासंगिक कहानी
कहानी में नया मोड़ तब आता है जब अनुज को 'किवी ऐप' नाम के एक उभरते हुए स्टार्टअप में नौकरी हासिल करने का अवसर मिलता है। इस नई नौकरी के साथ अनुज के मन में अपने असफलताओं के सिलसिले को तोड़ने और जिंदगी को नए सिरे से संवारने की एक उम्मीद जगती है। हालांकि, कॉर्पोरेट दुनिया की राह उतनी आसान नहीं होती जितनी बाहर से नजर आती है। इस नए दफ्तर में कदम रखते ही अनुज का सामना ऑफिस पॉलिटिक्स, काम की अंधी दौड़, अपने अस्तित्व को साबित करने के दबाव और व्यक्तिगत जीवन में आने वाले अप्रत्याशित तूफानों से होता है। यह सीरीज बड़े ही यथार्थवादी और ताजगी भरे अंदाज में दिखाती है कि कैसे आज की युवा पीढ़ी अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लगातार खुद को दांव पर लगाती है।
लेखन और पटकथा में बिखरी रोजमर्रा की असलियत
इस वेब सीरीज की मूल पटकथा को सिद्धार्थ तिवारी और व्योम छारया ने मिलकर तैयार किया है। लेखकों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने इसमें किसी भी तरह का बनावटी या अति-नाटकीय बॉलीवुड स्टाइल ड्रामा ठूंसने की कोशिश नहीं की है। इसके बजाय, उन्होंने आज के शहरी युवाओं के दैनिक जीवन की उन वास्तविक समस्याओं को चुना है, जिनसे हर आम इंसान खुद को जुड़ा हुआ पाता है। सीरीज का पहला एपिसोड जहां अनुज की शुरुआती जिंदगी और उसके स्टार्टअप इंटरव्यू की जद्दोजहद को दिखाता है, वहीं आगे चलकर किराए के मकान की किल्लत और मकान मालिक की लगातार किचकिच को बहुत ही सजीव ढंग से पेश करता है। दफ्तर के माहौल में अनुज और उसकी सहकर्मी यशस्विनी के बीच की व्यावसायिक केमिस्ट्री बेहद स्वाभाविक लगती है। तीसरे एपिसोड में एक बड़ा ट्विस्ट आता है, जब अनुज को अपनी गर्लफ्रेंड के साथ कुछ ऐसे गोपनीय और चौंकाने वाले दस्तावेज मिलते हैं जो पूरी कहानी की दिशा बदल देते हैं। यह पटकथा सिर्फ दफ्तरी राजनीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इंसान के भीतर छिपे असफलता के डर और टूटते रिश्तों की पेचीदगियों को भी गहराई से छूती है।
अभिनय और किरदारों की सहज जुगलबंदी
मुख्य भूमिका में नजर आ रहे अभिनेता प्रीत कमानी ने अनुज के किरदार में पूरी तरह से प्राण फूंक दिए हैं। प्रीत की शारीरिक भाषा, उनके चेहरे के बदलते हाव-भाव और संवाद अदायगी में एक ऐसा खिंचाव है जो अनुज की बेबसी और उसके बाद भी हार न मानने की जिद्दी नीयत को बराबरी से दिखाता है। वहीं दूसरी ओर, दीपक के वरिष्ठ किरदार में राजेश कुमार ने अपनी बेहतरीन अदाकारी की छाप छोड़ी है। राजेश कुमार की कॉमिक टाइमिंग और चेहरे पर आने वाले हल्के-फुल्के एक्सप्रेशन इस गंभीर और तनावपूर्ण कहानी में दर्शकों को राहत के पल देते हैं। यशस्विनी के रूप में भाग्यश्री लिमये ने अपनी खूबसूरती और सहज अभिनय से स्क्रीन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ा है। उनका आत्मविश्वास, अपने काम के प्रति ईमानदारी और मजबूत व्यवहार कहानी को एक अलग ऊंचाई देता है। इसके अतिरिक्त सहायक कलाकारों में अनुज के फ्लैटमेट सुजल का किरदार निभा रहे कलाकार और दफ्तर के अन्य साथियों ने भी अपनी भूमिकाओं को बखूबी निभाया है। तान्या शर्मा भले ही छोटे रोल में दिखती हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी भी असरदार साबित होती है।
व्योम छारया का सधा हुआ निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी
निर्देशक व्योम छारया ने इस सीरीज के जरिए यह साबित कर दिया है कि वे आज के युवाओं के मन और उनकी कार्यशैली को बहुत गहराई से समझते हैं। उनका निर्देशन अत्यंत सधा हुआ और प्रभाव छोड़ने वाला है। उन्होंने सीन्स में बेवजह का भावुक ड्रामा डालने के बजाय वास्तविक परिस्थितियों की गंभीरता पर ध्यान केंद्रित किया है। दफ्तर के तनावपूर्ण माहौल, तेजी से बदलते स्टार्टअप कल्चर और किरदारों के आपसी संवादों के बीच व्योम ने एक बेहतरीन संतुलन बनाया है। वे दर्शकों तक यह स्पष्ट संदेश पहुंचाने में सफल रहे हैं कि जिंदगी में हर वक्त नंबर वन बने रहना ही सब कुछ नहीं होता। यही परिपक्वता इस सीरीज को साधारण ऑफिस ड्रामा से अलग बनाकर एक विचारोत्तेजक ड्रामा बनाती है।
संवाद, संगीत और तकनीकी पक्ष
तकनीकी मोर्चे पर सिनेमैटोग्राफी ने कहानी के मूड को पूरी तरह से पकड़ा है। कैमरे ने जहां एक तरफ चमक-दमक वाले स्टार्टअप ऑफिस की तेज रोशनी और आधुनिक इंटीरियर को कैद किया है, वहीं दूसरी तरफ अनुज के छोटे और तंग किराए के कमरे में मद्धम रोशनी के जरिए उसकी आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव को बयां किया है। शहर की व्यस्त सड़कों और दफ्तर की कैंटीन के दृश्य मेट्रोपोलिस शहर की भागदौड़ को बहुत ही सटीकता से दिखाते हैं। सीरीज का बैकग्राउंड स्कोर सीन्स के तनाव को और गहरा करता है। सबसे ज्यादा तारीफ के काबिल इसके संवाद हैं, जो न सिर्फ मनोरंजक हैं बल्कि जिंदगी की गहरी सच्चाई को बेहद आसान शब्दों में व्यक्त करते हैं। दीपक द्वारा अनुज को दिया गया गुरुमंत्र कि 'लगभग होना कोई हार नहीं है', लंबे समय तक याद रहता है।
सीरीज की कमियां और कमजोर कड़ियां
तमाम खूबियों के बावजूद इस सीरीज में कुछ खामियां भी नजर आती हैं। पहला और दूसरा एपिसोड बीच-बीच में थोड़ा धीमा महसूस होता है, जहां कहानी अनुज की व्यक्तिगत उलझनों और उसके अपार्टमेंट के मुद्दों में जरूरत से ज्यादा उलझ जाती है। इसके अलावा, तान्या शर्मा और अन्य सह-कलाकारों के किरदारों को पटकथा में वह गहराई नहीं मिल सकी है जो मुख्य किरदारों को दी गई है। कुछ सब-प्लॉट्स काफी हद तक कयास लगाने योग्य हैं, जिससे दर्शक आगे होने वाली घटनाओं का अंदाजा पहले ही लगा लेते हैं।
अंतिम फैसला: क्यों देखी जानी चाहिए यह सीरीज?
इन छिटपुट कमियों को दरकिनार कर दें तो 'नाइन टू फाइव' एक बेहद ही ईमानदार, प्रासंगिक और मनोरंजक वेब सीरीज है। यह हर उस युवा को देखनी चाहिए जो अपने करियर के शुरुआती चरण में असफलता, तनाव और ऑफिस की राजनीति से जूझ रहा है। यह शो आपको हंसाता भी है, भावुक भी करता है और सबसे बढ़कर यह सिखाता है कि हमेशा पहले पायदान पर न रहना कोई गुनाह नहीं है।



















