महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और सांसद संजय राउत का समीकरण हमेशा चर्चा का विषय रहा है। लंबे समय तक दोनों के बीच बेहद करीबी रिश्ता देखने को मिला, लेकिन इस जुड़ाव की शुरुआत वैसी नहीं थी जैसी अक्सर समझी जाती है। एक शुरुआती दौर ऐसा भी था जब बालासाहेब ठाकरे को संजय राउत का काम और अंदाज बिल्कुल रास नहीं आता था। हालात यहां तक थे कि वे संजय राउत से मिलना या उन्हें इंटरव्यू देना तक गंवारा नहीं करते थे। जब कभी मुलाकात की नौबत आई तो तीखी नाराजगी और खरी-खोटी सुनने को मिली। इसके बावजूद कुछ ऐसा घटा जिसने शिवसेना प्रमुख की राय को हमेशा के लिए बदल दिया और दोनों के बीच विश्वास की नई बुनियाद रख दी।
संजय राउत की पुस्तक विमोचन पर राज ठाकरे ने साझा किए संस्मरण
इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ा दिलचस्प वाकया महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने एक सार्वजनिक मंच पर साझा किया। अवसर था सांसद संजय राउत की नई पुस्तक 'बोध कीर्तन' के विमोचन समारोह का, जहां राज ठाकरे मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद थे। राज ठाकरे ने बताया कि वे संजय राउत के शुरुआती पत्रकारीय जीवन के करीबी गवाह रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बालासाहेब और संजय राउत के संबंधों की शुरुआती डगर बेहद पथरीली थी। एक दौर ऐसा था जब साक्षात्कार के दौरान बालासाहेब ने संजय राउत पर जमकर गुस्सा निकाला था और ऐसी तल्ख शब्दावली इस्तेमाल की थी, जिसे सार्वजनिक मंच पर दोहराना भी सहज नहीं है।
जब लोकप्रभा में अपराध जगत की खबरों से चर्चा में थे संजय राउत
राज ठाकरे ने पुरानी कड़ियों को जोड़ते हुए बताया कि संजय राउत का संपर्क उनसे पहले उनके चाचा बालासाहेब ठाकरे से हो चुका था। उस शुरुआती दौर में राउत को बालासाहेब के भारी रोष का सामना करना पड़ता था। उस समय संजय राउत 'लोकप्रभा' साप्ताहिक में कार्यरत थे और मुंबई के अंडरवर्ल्ड और गैंगवार की भीतरी हलचलों पर लिखी अपनी खोजी रिपोर्टों के लिए जाने जाते थे। उनकी रिपोर्टिंग इतनी धारदार और वास्तविक घटनाओं पर आधारित होती थी कि खुद राज ठाकरे नियमित रूप से उनके लेख पढ़ा करते थे।
उसी दौर में राज ठाकरे अपने बनाए कार्टून लेकर 'इंडियन एक्सप्रेस' के दफ्तर जाया करते थे। वहीं दफ्तर के गलियारों में उनकी मुलाकात संजय राउत से शुरू हुई थी। उस समय मुंबई पत्रकारिता में राउत की पहचान जमीनी हकीकत और अपराध की दुनिया की बारीकियों को बेबाकी से पन्नों पर उतारने वाले एक तेजतर्रार पत्रकार के रूप में बन चुकी थी।
सामना की शुरुआत और शिवसेना की नीतियों पर आलोचना
संजय राउत के पत्रकारीय काम का एक दूसरा पहलू भी था जो बालासाहेब की नाराजगी का मुख्य कारण बना। साल 1988 और 1989 के आसपास जब शिवसेना के अपने मुखपत्र 'सामना' की शुरुआत हो रही थी, उस दौरान राउत ने शिवसेना और उसके फैसलों को लेकर कई आलोचनात्मक आलेख लिखे थे। मुखर विरोध और तीखी समीक्षा के चलते बालासाहेब ठाकरे उनसे सख्त खफा रहते थे। मंच पर हल्के-फुल्के अंदाज में बोलते हुए राज ठाकरे ने यह भी कहा कि बालासाहेब उस समय संजय राउत के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल करते थे, उसे सार्वजनिक रूप से बोल पाना संभव नहीं है।
शिवसेना भवन में हुआ ऐतिहासिक इंटरव्यू
एक दिन संजय राउत ने राज ठाकरे से संपर्क किया और 'लोकप्रभा' के लिए बालासाहेब ठाकरे का एक विस्तृत साक्षात्कार लेने की इच्छा जाहिर की। राज ठाकरे व्यक्तिगत तौर पर राउत की लेखनी से प्रभावित थे, लेकिन वे भली-भांति जानते थे कि बालासाहेब के मन में राउत के प्रति कितनी तल्खी है। इसके बावजूद राज ठाकरे ने एक प्रयास करने का मन बनाया और सीधे बालासाहेब के पास पहुंच गए।
राज ठाकरे के मुताबिक जब उन्होंने बालासाहेब के सामने यह प्रस्ताव रखा कि क्या वे संजय राउत को साक्षात्कार का वक्त देंगे, तो बदले में उन्हें कई तरह की तीखी खरी-खोटी सुननी पड़ी। राज ठाकरे ने हंसते हुए याद किया कि वे शब्द अब पूरी तरह याद भी नहीं हैं। इसके बाद भी राज ठाकरे पीछे नहीं हटे और उन्होंने बालासाहेब को मनाया कि संजय राउत एक कुशल और मेहनती पत्रकार हैं, इसलिए उन्हें एक मौका देकर देखना चाहिए।
काफी समझाने-बुझाने के बाद बालासाहेब आखिरकार मिलने को राजी हो गए। तय कार्यक्रम के अनुसार शिवसेना भवन में एक बैठक आयोजित हुई, जिसमें बालासाहेब ठाकरे, संजय राउत और राज ठाकरे मौजूद थे। जैसे ही बातचीत आगे बढ़ी, संजय राउत ने बेझिझक होकर बेहद तीखे, असहज और कड़े सवाल दागने शुरू कर दिए। सवालों की चुभन से बालासाहेब का पारा चढ़ गया और उन्होंने बातचीत के दौरान ही राउत पर तीखी भाषा में अपना गुस्सा उतार दिया। यह पूरी बातचीत टेप रिकॉर्डर पर रिकॉर्ड की जा रही थी।
बिना किसी संपादन के जस की तस छापी पूरी बातचीत
इस पूरे प्रसंग का सबसे निर्णायक मोड़ साक्षात्कार के प्रकाशित होने के बाद सामने आया। जब 'लोकप्रभा' के पन्नों पर यह बातचीत छपकर आई, तो संजय राउत ने बालासाहेब द्वारा अपने ऊपर की गई तीखी टिप्पणियों और खरी-खोटी को हटाया नहीं था। राउत ने पूरी बातचीत को बिना किसी कांट-छांट के जस का तस पाठकों के सामने रख दिया, जैसी वह शिवसेना भवन के कमरे में घटी थी।
राज ठाकरे के अनुसार बालासाहेब ने कभी सार्वजनिक तौर पर इस बात की प्रशंसा नहीं की, लेकिन इस कदम ने भीतर ही भीतर बालासाहेब के दिल में संजय राउत के प्रति सम्मान का भाव जगा दिया। उन्हें लगा कि इस पत्रकार में सच को झेलने और पेश करने का वास्तविक हौसला है। राज ठाकरे ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति अपने विरुद्ध की गई कड़वी से कड़वी बात और अपमानजनक शब्दों को भी बिना संकोच के प्रकाशित करने का साहस रखता हो, उसकी ईमानदारी और निष्ठा संदेह से परे होती है।
राज ठाकरे ने कहा कि बालासाहेब के मन में यह बात बैठ गई थी कि संजय राउत अपने ऊपर हुए शाब्दिक वार को भी दबाने या छुपाने की कोशिश नहीं करते। पत्रकारिता की यही निडरता और साफगोई आखिरकार शिवसेना प्रमुख को भा गई।
सामना के संपादक पद तक का सफर
इस घटनाक्रम के कुछ समय बाद शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' के शीर्ष संपादकीय नेतृत्व को लेकर मंथन शुरू हुआ। एक दिन बालासाहेब ठाकरे ने सीधे संजय राउत को अपने पास बुलवाया। दोनों के बीच आमने-सामने बातचीत हुई और इसके फौरन बाद संजय राउत को 'सामना' का संपादक नियुक्त कर दिया गया।
इस प्रकार जिस पत्रकार को बालासाहेब ठाकरे अपनी चौखट पर फटकने नहीं देना चाहते थे और जिनके नाम पर भारी गुस्सा जाहिर करते थे, वही संजय राउत आगे चलकर उनके सबसे करीबी राजनीतिक सिपहसालार और अखबार के मुख्य संपादक बने। 'बोध कीर्तन' के विमोचन समारोह में सामने आया यह वाकया केवल एक मुलाकात की कहानी नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि पेशेवर निडरता और सच को बिना लाग-लपेट के सामने रखने की हिम्मत कैसे घोर विरोध को भी गहरे विश्वास में तब्दील कर सकती है।















