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बारिश के मौसम में बरबटी की पत्तियों पर उभर रहे ये दाग, वैज्ञानिक ने बताया कैसे बचाएं फसलछत्तीसगढ़
7 सित॰ 2026, 5:55 am (18 दिन पहले)· 2

बारिश के मौसम में बरबटी की पत्तियों पर उभर रहे ये दाग, वैज्ञानिक ने बताया कैसे बचाएं फसल

बारिश के मौसम में बरबटी की फसल पर रतुआ और मोजेक रोग का खतरा बढ़ रहा है, कृषि विशेषज्ञ ने पत्तियों पर दिख रहे दागों को पहचानने और सही समय पर दवा छिड़कने की सलाह दी है।

बारिश के मौसम में बरबटी की खेती किसानों की कमाई बढ़ाने का अच्छा जरिया बनती है, लेकिन इसी मौसम में हवा में नमी बढ़ने और तापमान में उतार-चढ़ाव के चलते फसल पर कई तरह के रोगों का हमला भी तेज हो जाता है। बालोद स्थित कृषि विज्ञान केंद्र की पादप रोग विशेषज्ञ डॉ भीमेश्वरी साहू ने किसानों से अपील की है कि वे इन दिनों बरबटी के खेतों में पत्तियों की नियमित जांच करते रहें, ताकि रोग के शुरुआती लक्षण समय रहते पकड़ में आ सकें।

रतुआ रोग की पहचान कैसे करें

डॉ साहू के मुताबिक बारिश के दिनों में बरबटी की फसल पर रतुआ रोग लगने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। यह बीमारी फसल के लिए काफी नुकसानदायक मानी जाती है, क्योंकि अगर इसे शुरुआत में ही न रोका जाए तो यह पूरे खेत में तेजी से फैल सकती है और उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। इस रोग की पहचान भी आसान है, बरबटी की पत्तियों की ऊपरी सतह पर लोहे में जंग लगने जैसे भूरे-नारंगी दाग या निशान उभर आते हैं। कई बार किसान शुरुआती अवस्था में इन दागों को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर भारी नुकसान की वजह बन सकता है। इसलिए जैसे ही पत्तियों पर ऐसे निशान दिखें, तुरंत नियंत्रण के उपाय शुरू कर देने चाहिए।

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रतुआ रोग से बचाव के उपाय

डॉ भीमेश्वरी साहू ने बताया कि रतुआ रोग को काबू में करने के लिए मैंकोजेब और कार्बेंडाजिम की मिली-जुली दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए दो ग्राम दवा को एक लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। छिड़काव करते समय इस बात का खास ध्यान रखना जरूरी है कि दवा पौधे की हर पत्ती तक अच्छी तरह पहुंचे, तभी इसका असर पूरी तरह दिखाई देगा।

मोजेक रोग का खतरा भी बढ़ा

रतुआ के अलावा बरबटी की फसल में मोजेक रोग भी देखने को मिल रहा है। यह एक विषाणु जनित बीमारी है, यानी यह किसी वायरस के कारण फैलती है। इस रोग की चपेट में आने पर पत्तियां अपने सामान्य हरे रंग में नहीं रहतीं, बल्कि चितकबरी हो जाती हैं, यानी उन पर पीले और हरे रंग के धब्बे साफ नजर आने लगते हैं। अगर समय रहते इस पर काबू न पाया जाए तो पौधे की सामान्य बढ़वार रुक जाती है और आखिरकार फसल की पैदावार पर भी इसका बुरा असर पड़ता है।

वाहक कीटों पर काबू पाना जरूरी

डॉ साहू के अनुसार मोजेक रोग को फैलने से रोकने के लिए सबसे जरूरी काम उन कीटों को नियंत्रित करना है, जो इस वायरस को एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचाते हैं। इसके लिए डेढ़ एमएल इमिडाक्लोप्रिड प्रति लीटर पानी के साथ दो एमएल नीम का तेल प्रति लीटर पानी मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। यह छिड़काव 10 दिनों के अंतराल पर दोहराना चाहिए, इससे वाहक कीटों की संख्या पर लगाम लगाई जा सकती है और मोजेक रोग के फैलाव को काफी हद तक रोका जा सकता है।

किसानों के लिए जरूरी सलाह

डॉ भीमेश्वरी साहू ने कहा कि बारिश के मौसम में बरबटी के खेत की निगरानी हफ्ते में कम से कम दो बार जरूर करनी चाहिए, क्योंकि नमी वाले मौसम में रोग के लक्षण बहुत तेजी से बढ़ते हैं। जिन खेतों में पहले भी रतुआ या मोजेक रोग की शिकायत रह चुकी है, वहां छिड़काव का शेड्यूल पहले से तय कर लेना ज्यादा फायदेमंद रहता है। समय पर सही दवा और सही मात्रा में छिड़काव करने से फसल को बचाया जा सकता है और किसानों को नुकसान से राहत मिल सकती है।

सवाल-जवाब

बरबटी में रतुआ रोग की पहचान कैसे करें?
पत्तियों की ऊपरी सतह पर जंग जैसे भूरे-नारंगी दाग या निशान दिखाई देने पर रतुआ रोग की पहचान की जा सकती है।
रतुआ रोग से बचाव के लिए कौन सी दवा छिड़कें?
मैंकोजेब और कार्बेंडाजिम की मिली-जुली दवा दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़कने की सलाह दी गई है।
मोजेक रोग के लक्षण क्या हैं?
मोजेक रोग में बरबटी की पत्तियां सामान्य हरे रंग की बजाय चितकबरी यानी पीली-हरी दिखाई देने लगती हैं।
मोजेक रोग को कैसे रोका जा सकता है?
वाहक कीटों को नियंत्रित करने के लिए डेढ़ एमएल इमिडाक्लोप्रिड और दो एमएल नीम का तेल प्रति लीटर पानी मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
यह सलाह किसने दी है?
यह सलाह कृषि विज्ञान केंद्र बालोद की पादप रोग विशेषज्ञ डॉ भीमेश्वरी साहू ने दी है।
किसानों को खेत की जांच कितनी बार करनी चाहिए?
डॉ साहू के मुताबिक बारिश के मौसम में हफ्ते में कम से कम दो बार खेत की निगरानी करनी चाहिए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·17 दिन पहले

यह खबर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि नीति के एक महत्वपूर्ण पहलू को उजागर करती है। मानसूनी फसलों में कीट और रोग प्रबंधन सीधे तौर पर किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है। यदि समय पर कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह को जमीन पर लागू नहीं किया गया, तो उत्पादन लागत बढ़ना तय है, जिससे अंततः बाजार में सब्जियों की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·17 दिन पहले

बरबटी जैसी मानसूनी फसलों पर रोगों का यह संकट केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर खुदरा सब्जी बाजारों और खाद्य मुद्रास्फीति से जुड़ा हुआ है। जब फसल खराब होने से पैदावार घटती है, तो आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है और उपभोक्ताओं को बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ता है। इसलिए कृषि विज्ञान केंद्रों की इन समय पर दी गई चेतावनियों को नजरअंदाज करना व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिहाज से भी नुकसानदेह साबित हो सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·17 दिन पहले

बरबटी की फसल पर मंडराता यह कृषि संकट सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आजीविका को प्रभावित करता है। हालांकि यह मामला आपराधिक नहीं है, लेकिन खाद्य सुरक्षा और कृषि संसाधनों के नुकसान के ऐसे मामलों में समय पर प्रशासनिक व वैज्ञानिक हस्तक्षेप बेहद जरूरी है। यदि इन फंगस और वायरस जनित रोगों को शुरुआती स्तर पर नहीं रोका गया, तो यह बड़े पैमाने पर फसल बर्बादी का कारण बनेगा, जिससे बाजार में सब्जियों के दाम बढ़ने और कालाबाजारी जैसी आपराधिक गतिविधियों की आशंका भी पैदा हो सकती है। किसानों को इस दिशा में सतर्क रहने की सख्त आवश्यकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·17 दिन पहले

बरबटी जैसी दलहनी और सब्जी वर्गीय फसलों पर रतुआ व मोजेक का यह प्रकोप सीधे तौर पर ग्रामीण क्रय शक्ति को कमजोर करता है। मानसून के दौरान कृषि विज्ञान केंद्रों की सक्रियता और समयबद्ध फंगस-नाशक छिड़काव से न सिर्फ पैदावार सुरक्षित होती है, बल्कि आपूर्ति बाधित न होने से बाजार में अनावश्यक महंगाई पर भी लगाम लगती है।

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