अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुमूल्य धातुओं की कीमतों पर दबाव गहराने लगा है, जिसके चलते शुक्रवार के शुरुआती एशियाई कारोबार में सोना लुढ़ककर 4,275 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर आ गया। ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई नई तेजी ने मुद्रास्फीति के फिर से सिर उठाने की चिंताओं को हवा दे दी है। इसके साथ ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और अधिक बढ़ोतरी किए जाने की बढ़ती संभावनाओं ने सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। बाजार में निवेशकों का ध्यान अब मौद्रिक नीति के भविष्य के रुख पर पूरी तरह केंद्रित हो चुका है, जहां दुनिया भर के प्रमुख नीति निर्माता आने वाले दिनों में कठोर फैसले ले सकते हैं।
फेडरल रिजर्व के सख्त रुख और नीति निर्माताओं के बयान
अमेरिकी केंद्रीय बैंक की हालिया टिप्पणियों ने स्पष्ट कर दिया है कि महंगाई के खिलाफ उसकी लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। नीति निर्माता पॉलसन की ओर से दिए गए बयानों ने बाजार में सख्त संदेश पहुंचाया है। भाषणों का विश्लेषण करने वाले भाषण ट्रैकर पैमाने पर पॉलसन की टिप्पणियों को 7 के सामान्य आधारभूत स्कोर की तुलना में 8.1 का उच्च स्तर दिया गया, जिससे यह साफ झलकता है कि नीति निर्माता लगातार बनी हुई महंगाई को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं। पॉलसन ने जोर देकर कहा कि केंद्रीय बैंक को आने वाले समय में एक बार फिर से ब्याज दरों में इजाफा करने की आवश्यकता पड़ सकती है। उनका यह भी मानना रहा कि सितंबर महीने में की गई दरों की बढ़ोतरी ने मौद्रिक नीति को महंगाई से मुकाबला करने के लिए बेहतर स्थिति में खड़ा किया है, लेकिन लड़ाई अभी बाकी है।
नीति निर्माताओं का आकलन है कि अंतर्निहित मुद्रास्फीति लगातार जिद्दी बनी हुई है। इसका एक प्रमुख कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI तकनीक के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर हो रहे बुनियादी ढांचे के निर्माण को माना जा रहा है, जो संसाधनों और ऊर्जा की मांग बढ़ाकर कीमतों पर दबाव बना रहा है। फेडरल रिजर्व का लक्ष्य मुद्रास्फीति की दर को वापस 2 प्रतिशत के दायरे में लाना है, जिसके लिए बैंक आवश्यकता पड़ने पर वित्तीय परिस्थितियों को और अधिक कड़ा करने के लिए पूरी तरह तैयार दिखता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का लचीलापन और श्रम बाजार में जारी मजबूती इस नीतिगत रुख को सहारा दे रहे हैं। चूंकि मुद्रास्फीति की स्थिति और अधिक बिगड़ी नहीं है, इसलिए केंद्रीय बैंक का पूरा ध्यान केवल तात्कालिक गिरावट पर प्रतिक्रिया देने के बजाय कीमतों में अचानक आने वाले किसी भी नए उछाल को सख्ती से रोकने पर टिका हुआ है।
इसी सिलसिले में फेडरल रिजर्व के रुख को मापने वाला समग्र फेड भावना सूचकांक बिना किसी बदलाव के 148.18 के स्तर पर स्थिर बना रहा। यह उच्च स्तर इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि केंद्रीय बैंक के अधिकारियों का व्यापक संवाद अब भी पूरी तरह से सख्ती के दायरे में है। डॉलर की मजबूती का पूरा आधार इस बात पर टिका है कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहेंगी और जरूरत पड़ने पर उन्हें और बढ़ाया भी जा सकता है। आने वाले सत्र में न्यूयॉर्क फेड के अध्यक्ष जॉन विलियम्स और क्लीवलैंड फेड की अध्यक्ष बेथ हैमैक के भाषण होने वाले हैं, जिन पर अब वैश्विक बाजारों की निगाहें टिकी हुई हैं।
तकनीकी विश्लेषण और चार्ट पर प्रमुख स्तर
दैनिक तकनीकी चार्ट पर नजर डालें तो सोने की जोड़ी यानी XAU/USD निकट अवधि में मंदड़ियों के प्रभाव में नजर आ रही है। भाव वर्तमान में 100 दिवसीय मूविंग एवरेज यानी 100-डे MA और बॉलिंजर बैंड की मध्य रेखा से नीचे बने हुए हैं, जो कमजोरी का स्पष्ट संकेत है। हालांकि, तकनीकी रूप से कीमतें बॉलिंजर बैंड के निचले दायरे के ऊपर टिकी हुई हैं, जिससे इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि बाजार में किसी भी समय एक सुधारात्मक उछाल देखने को मिल सकता है। 14 अवधियों वाला रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स यानी RSI लगभग 44 के स्तर पर चल रहा है। यह स्तर बाजार के अत्यधिक बिकवाली के दायरे में जाने का संकेत नहीं देता, बल्कि यह दर्शाता है कि गति अभी भी मंदी की तरफ झुकी हुई है।
उछाल की स्थिति में सर्राफा के सामने पहला महत्वपूर्ण प्रतिरोध 100 दिवसीय मूविंग एवरेज के आसपास लगभग 4,310 डॉलर पर आएगा। यदि कीमतें इस बाधा को पार कर जाती हैं, तो अगला बड़ा प्रतिरोध बॉलिंजर मध्य रेखा के पास 4,360 डॉलर पर देखने को मिलेगा। इसके बाद यदि तेजी और आगे बढ़ती है, तो ऊपरी बॉलिंजर बैंड 4,480 डॉलर के स्तर पर एक बेहद मजबूत बाधा साबित होगा। दूसरी ओर, गिरावट आने पर 4,240 डॉलर पर स्थित निचला बॉलिंजर बैंड तत्काल समर्थन के तौर पर काम करेगा। यदि सोने की दैनिक क्लोजिंग इस 4,240 डॉलर के समर्थन स्तर से नीचे हो जाती है, तो कीमतों में आगे और भी तेज गिरावट आ सकती है, जिससे भाव पिछले निचले स्तरों और मनोवैज्ञानिक स्तरों की ओर खिसक सकते हैं। इससे पहले के कारोबारी सत्र में भी सोना 4,250 डॉलर प्रति औंस के निचले स्तर तक फिसला था, जिसके बाद आई रिकवरी काफी सुस्त रही थी।
मुद्रास्फीति और अमेरिकी डॉलर के साथ सोने का संबंध
सोना मानव इतिहास में हजारों सालों से विनिमय के माध्यम और मूल्य के संचय के रूप में एक केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है। आधुनिक समय में आभूषणों में इसके इस्तेमाल और चमक के अलावा, सोने को दुनिया भर में एक सर्वमान्य सुरक्षित निवेश संपत्ति यानी सेफ हेवन के रूप में दर्जा प्राप्त है। उथल-पुथल, मंदी के डर या भू-राजनीतिक संकट के दौरान निवेशक अपनी पूंजी की रक्षा के लिए सोने की तरफ रुख करते हैं। सोने की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी सरकार या किसी विशिष्ट जारीकर्ता की देनदारी पर निर्भर नहीं होता, इसी वजह से इसे मुद्रा के अवमूल्यन और अनियंत्रित मुद्रास्फीति के खिलाफ सबसे असरदार बचाव साधन माना जाता है।
हालांकि, सोने का अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड के साथ विपरीत संबंध देखने को मिलता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का कारोबार डॉलर यानी XAU/USD में होता है, इसलिए डॉलर के मजबूत होने पर अन्य मुद्राओं के खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे इसकी मांग गिरती है। इसके अलावा, सोना रखने पर निवेशकों को कोई नियमित ब्याज या यील्ड नहीं मिलती। जब फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है या बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है, तब पूंजी गैर-उपज वाली पीली धातु से निकलकर आकर्षक ब्याज देने वाले बॉन्ड और डॉलर की तरफ मुड़ने लगती है। यही कारण है कि कच्चे तेल के महंगे होने से महंगाई का खतरा बढ़ा तो जरूर है, पर उस खतरे को काबू में करने के लिए ब्याज दरें बढ़ने के डर ने सोने की चमक को फीका कर दिया है।
केंद्रीय बैंकों की रिकॉर्ड खरीदारी और वैश्विक भंडार
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक सोने के सबसे बड़े खरीदार और धारक हैं। आर्थिक संकट और मुद्रा के तेज उतार-चढ़ाव के समय अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं को संबल देने के लिए केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का विविधीकरण करते हैं और सोना खरीदते हैं। भारी सोने का भंडार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और उसकी सॉल्वेंसी यानी भुगतान क्षमता के प्रति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसा पैदा करता है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों ने वर्ष 2022 में अपने भंडार में 1,136 टन सोना जोड़ा था, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 70 अरब डॉलर थी। यह रिकॉर्ड इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक खरीद दर्ज की गई थी।
हाल के वर्षों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक विशेष रूप से आक्रामक होकर अपने सोने के भंडार में इजाफा कर रहे हैं। चीन, भारत और तुर्की जैसे देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर पर निर्भरता घटाने और रणनीतिक सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से लगातार भारी मात्रा में सोना खरीद रहे हैं। इन उभरते बाजारों द्वारा की जाने वाली दीर्घकालिक खरीद सोने की कीमतों को लंबी अवधि में एक ठोस आधार प्रदान करती है। जोखिम वाली संपत्तियों जैसे शेयर बाजारों में जब भारी तेजी आती है, तो सोने पर दबाव बनता है, लेकिन शेयर बाजारों में जब घबराहट और बिकवाली फैलती है, तब यह कीमती धातु निवेशकों की पहली पसंद बन जाती है।
विदेशी मुद्रा बाजार और केंद्रीय बैंकों के अन्य फैसले
वैश्विक मुद्रा बाजारों में अमेरिकी डॉलर की व्यापक मजबूती का असर अन्य प्रमुख मुद्राओं पर भी साफ देखा गया है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर यानी AUD/USD ने लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज की और यह टूटकर 0.7000 के बेहद अहम मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब आ गया। इसके साथ ही ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा अपने 200 दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज यानी 200-डे SMA से नीचे फिसल गई। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल और फेड द्वारा दरें बढ़ाने के बढ़ते दांवों ने अमेरिकी डॉलर को दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी जोखिम से जुड़ी मुद्राओं पर दबाव बन गया है।
उधर एशियाई बाजार में जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर यानी USD/JPY तीन सप्ताह के उच्चतम स्तर से गिरकर 158.00 के आसपास सिमट गया। जापानी बॉन्ड यील्ड में आई तेजी और बैंक ऑफ जापान की संभावित बाजार दखलअंदाजी की चर्चाओं ने येन को थोड़ी राहत दी। इसी बीच, बैंक ऑफ जापान ने मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाते हुए अपनी अल्पकालिक ब्याज दर को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया। यह निर्णय 7-2 के बहुमत से लिया गया, जो ठीक वैसा ही रहा जैसी बाजार पहले से उम्मीद कर रहा था। इन तमाम वैश्विक घटनाक्रमों और ब्याज दरों के कड़े होते माहौल ने वित्तीय बाजारों में तरलता को सीमित किया है, जिसका सीधा नुकसान सोने जैसी गैर-ब्याज वाली संपत्तियों को उठाना पड़ रहा है।





















