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बिहार के समस्तीपुर में कभी 7 रुपये के टिकट पर उमड़ती थी भीड़, अब मैरिज हॉल में तब्दील हुआ ऐतिहासिक गोपाल सिनेमा हॉलबिहार
21 सित॰ 2026, 2:07 pm (4 दिन पहले)· 0

बिहार के समस्तीपुर में कभी 7 रुपये के टिकट पर उमड़ती थी भीड़, अब मैरिज हॉल में तब्दील हुआ ऐतिहासिक गोपाल सिनेमा हॉल

समस्तीपुर के पटोरी स्थित गोपाल सिनेमा हॉल में कभी दर्शक कतार लगाकर फिल्में देखते थे, लेकिन मनोरंजन के डिजिटल साधनों के प्रसार के बाद यह भवन अब विवाह भवन बन चुका है।

बिहार के समस्तीपुर जिले के पटोरी क्षेत्र में स्थित गोपाल सिनेमा हॉल कभी सिनेमा प्रेमियों की चहल-पहल का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उस दौर में नई फिल्म के बड़े पर्दे पर आने की घोषणा होते ही दर्शकों में गजब का कौतूहल देखने को मिलता था। लोग घंटों कतार में लगकर टिकट लेते थे और अपने पसंदीदा अभिनेताओं को पर्दे पर देखने के लिए बेसब्र रहते थे। आधुनिक दौर में जब स्मार्टफोन और डिजिटल तकनीक ने हर हाथ में मनोरंजन पहुंचा दिया है, तब सिनेमाघरों की वह पुरानी रौनक धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है। यह परिसर भी वक्त के थपेड़ों के साथ अपनी पहचान बदल चुका है और आज एक विवाह भवन के रूप में संचालित हो रहा है।

मनोरंजन के सीमित साधनों के बीच वर्ष 1998 में हुई थी शुरुआत

गोपाल सिनेमा हॉल के संचालन से जुड़े रहे पटोरी निवासी संतोष कुमार चौधरी ने बताया कि इस सिनेमाघर की स्थापना वर्ष 1998 में की गई थी। उन्होंने वर्ष 2002 के बाद कुछ समय तक इसके संचालन की जिम्मेदारी भी खुद संभाली थी। उस कालखंड में आम घरों के भीतर रंगीन टेलीविजन या मोबाइल फोन जैसी आधुनिक सुविधाएं सुलभ नहीं थीं। लोगों के पास मनोरंजन के विकल्प बेहद सीमित हुआ करते थे, जिस कारण किसी नई फिल्म का आना पूरे इलाके के लिए एक बड़े उत्सव जैसा माहौल बना देता था। सिनेमाघर ही सामूहिक मनोरंजन का सबसे बड़ा और सुलभ जरिया था, जहां परिवार और युवा वर्ग अपनी रोजमर्रा की व्यस्तताओं से निकलकर तीन घंटे बिताने पहुंचते थे।

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ससुरा बड़ा पैसा वाला ने बनाए थे दर्शकों के नए कीर्तिमान

संतोष कुमार चौधरी के अनुसार, वर्ष 2004 में रिलीज हुई चर्चित भोजपुरी फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसा वाला’ ने इस सिनेमा हॉल में ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी। इस फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की ऐसी दीवानगी थी कि यह लगातार लगभग एक महीने तक बड़े पर्दे पर दिखाई जाती रही। उस दौरान हर दिन लगभग 250 से 300 दर्शक फिल्म देखने के लिए हॉल में मौजूद रहते थे। उस जमाने में बड़े पर्दे पर कलाकारों को देखना लोगों के लिए एक भावनात्मक अनुभव हुआ करता था। धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज कलाकारों की फिल्मों को लेकर भी दर्शकों में इसी तरह का जबरदस्त उत्साह देखने को मिलता था, जिसके चलते हॉल के बाहर हमेशा लोगों का जमावड़ा लगा रहता था।

7 रुपये के शुरुआती टिकट और क्षमता से दोगुनी भीड़ का दौर

सिनेमा हॉल की दर्शक क्षमता के बारे में बताते हुए उन्होंने जानकारी दी कि हॉल के भीतर लगभग 164 से 165 सीटों की व्यवस्था थी। हालांकि, फिल्मों की लोकप्रियता के चरम पर कई मौकों पर सीटों की इस क्षमता से लगभग दोगुनी संख्या में लोग परिसर में पहुंच जाते थे। शुरुआत के दिनों में टिकट की दर मात्र 7 रुपये रखी गई थी। बाद के वर्षों में टिकट की कीमत को बढ़ाकर पहले 10 रुपये और फिर 14 रुपये तक किया गया, लेकिन टिकट दर बढ़ने के बावजूद दर्शकों की आवक में कोई कमी नहीं आई। उस दौर के सिनेमाघरों में आज के आधुनिक मल्टीप्लेक्स जैसी वातानुकूलित और लग्जरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, फिर भी लोग बड़े पर्दे पर फिल्म देखने के लिए पूरे चाव से पैसे खर्च करते थे।

अस्पताल से होते हुए विवाह भवन तक का सफर

समय के साथ तकनीक का दायरा विस्तृत हुआ और घरों में रंगीन टेलीविजन, इंटरनेट और स्मार्टफोन की उपलब्धता आम हो गई। ओटीटी और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ने दर्शकों को घर बैठे हर तरह की सामग्री उपलब्ध करा दी, जिससे बड़े पर्दे पर जाकर फिल्में देखने की जरूरत और उत्साह दोनों घटते चले गए। दर्शकों के अभाव में आखिरकार गोपाल सिनेमा हॉल को बंद करने का निर्णय लेना पड़ा। सिनेमा हॉल बंद होने के पश्चात इस इमारत में कुछ समय तक एक अस्पताल का संचालन किया गया। वक्त का चक्र आगे बढ़ा और वर्तमान समय में इस पूरे परिसर का उपयोग शादी-ब्याह के आयोजनों के लिए एक विवाह भवन के रूप में किया जा रहा है।

सवाल-जवाब

गोपाल सिनेमा हॉल समस्तीपुर में कहां स्थित है?
यह ऐतिहासिक सिनेमा हॉल समस्तीपुर जिले के पटोरी क्षेत्र में स्थित है।
गोपाल सिनेमा हॉल की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
इस सिनेमा हॉल की स्थापना वर्ष 1998 में हुई थी।
शुरुआत में इस सिनेमा हॉल के टिकट की कीमत कितनी थी?
शुरुआती दौर में यहां टिकट की कीमत करीब 7 रुपये थी, जो बाद में बढ़कर 10 रुपये और 14 रुपये हुई।
इस हॉल में किस फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की थी?
वर्ष 2004 में रिलीज हुई भोजपुरी फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसा वाला’ यहां लगातार लगभग एक महीने तक चली और प्रतिदिन 250 से 300 दर्शक पहुंचे।
सिनेमा हॉल की मूल दर्शक क्षमता कितनी थी?
हॉल के भीतर लगभग 164 से 165 सीटों की व्यवस्था की गई थी।
सिनेमा हॉल बंद होने के बाद इस भवन का क्या उपयोग किया गया?
सिनेमा हॉल बंद होने के बाद पहले यहां कुछ समय अस्पताल चला और वर्तमान में इसका इस्तेमाल विवाह भवन के रूप में हो रहा है।
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टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·3 दिन पहले

सिर्फ 7 रुपये का टिकट और उसमें भी सीटों से दोगुनी भीड़! आज के ज़माने में जब जेब में फोन और हर ओटीटी पर नई फिल्म है, तो वो लाइनें और वो 14 रुपये तक की टिकट वाली दीवानगी किसी फिल्मी कहानी जैसी ही लगती है।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

सात रुपये में सिनेमा देखना और भीड़ में धक्का खाना अलग ही मज़ा था। अब सब कुछ मोबाइल पर आ गया है, पर वो पुराना दौर बहुत याद आता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

रविकेश जी, सच कहा आपने। अब भले ही मनोरंजन जेब में आ गया है, पर सिनेमाहॉल में लाइन में लगकर टिकट लेने और उस जोश का कोई मुकाबला नहीं था।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

एक क्राइम संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि ऐसे ऐतिहासिक सार्वजनिक परिसरों का मनोरंजन केंद्रों से विवाह भवन में बदलना सिर्फ सांस्कृतिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह बदलते शहरीकरण और स्थानीय रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप में आए बड़े बदलाव को भी दर्शाता है। भविष्य में ऐसे परिसरों के व्यावसायिक उपयोग से क्षेत्र के भूमि उपयोग और स्थानीय प्रशासनिक नियमों पर भी असर पड़ सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·3 दिन पहले

करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, इस बदलाव का एक अन्य पहलू स्थानीय अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण पर इसके प्रभाव का है। जब ऐसे पारंपरिक मनोरंजन स्थल व्यावसायिक विवाह भवनों में बदलते हैं, तो क्षेत्र में भीड़ प्रबंधन, ट्रैफिक नियमों के पालन और स्थानीय करों से जुड़े प्रशासनिक मुद्दे खड़े हो सकते हैं। इससे जिला प्रशासन और नगर निकायों के भू-उपयोग नियमों की निगरानी पर भी नया दबाव बनता है।

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