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देहरादून के विरासत मेले में पहुंची अफगानिस्तान की हस्तकला, काबुल का ओनिक्स पत्थर बना लोगों की पहली पसंदउत्तराखंड
4 नव॰ 2026, 9:30 am (2 दिन पहले)· 0

देहरादून के विरासत मेले में पहुंची अफगानिस्तान की हस्तकला, काबुल का ओनिक्स पत्थर बना लोगों की पहली पसंद

देहरादून के विरासत उत्सव में काबुल से लाए गए कुदरती ओनिक्स पत्थर से तराशी गई कलाकृतियां लोगों को आकर्षित कर रही हैं, जिनकी शुरुआती कीमत 350 रुपये है।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आयोजित विरासत मेले में इस बार अफगान कारीगरों की अनूठी शिल्पकला दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। यहां अफगानिस्तान से लाए गए काबुल के प्रसिद्ध ओनिक्स पत्थर से तैयार सजावटी सामान और घरेलू बर्तनों की विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है। इस पत्थर की प्राकृतिक आभा और भीतरी चमक किसी भी बनावटी रंग या केमिकल पॉलिश के बिना ही बेहद शाही और विलासितापूर्ण अहसास कराती है, जिसे देखकर मेले में आने वाले लोग दंग हैं। आगामी दिवाली पर्व को ध्यान में रखते हुए लोग अपने घरों की सजावट के साथ-साथ प्रियजनों को उपहार देने के लिए भी इन शिल्पों को जमकर पसंद कर रहे हैं।

कुदरती चमक और पारदर्शी बनावट की खासियत

काबुल के ओनिक्स पत्थर की सबसे बड़ी पहचान उसकी प्राकृतिक अर्ध-पारदर्शी यानी ट्रांसलूसेंट चमक मानी जाती है। जब भी इस पत्थर पर कोई हल्की रोशनी पड़ती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अपने भीतर से ही जगमगा रहा हो। इस पत्थर की सबसे विशिष्ट बात यह है कि इस पर ऊपर से कोई कृत्रिम रंग, पेंट या रासायनिक परत नहीं चढ़ाई जाती। पत्थर की यह अंतर्निहित गुणवत्ता ही इसे दुनिया भर के अन्य साधारण पत्थरों की तुलना में बेहद खास और राजसी बनाती है। इन्हीं खूबियों के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इंटीरियर और लक्जरी सजावट के लिए इस पत्थर की काफी मांग रहती है।

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अफगान कारीगरों की महीने भर की बारीक मेहनत

इस प्रदर्शनी स्टॉल के संचालक जमशेद के अनुसार, इन खूबसूरत कलाकृतियों का निर्माण अफगानिस्तान के प्रसिद्ध खदमत ग्रुप द्वारा कराया जाता है, जिसके प्रबंध निदेशक अब्दुल वली शाराफजाई हैं। उन्होंने बताया कि इस पत्थर से एक अत्यंत छोटा सा शो-पीस तराशने में भी लगभग एक पूरे महीने का समय लग जाता है। हालांकि पत्थरों की कुछ बेहद बारीक कटाई का काम मशीनों की मदद से पूरा किया जाता है, परंतु वास्तविक आकार देने, घिसाई करने और उन पर अंतिम चमक लाने की पूरी प्रक्रिया कुशल कारीगर अपने हाथों से ही पूरी करते हैं। यही मानवीय श्रम और पारंपरिक हुनर इन वस्तुओं को अद्वितीय बनाता है।

छोटे शो-पीस से लेकर फव्वारे और रसोई के बर्तन तक

विरासत मेले के इस स्टॉल पर काबुल ओनिक्स की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित की गई है। यहां मेज पर रखने वाले छोटे सजावटी नमूनों से लेकर बड़े आकार के पानी के फव्वारे तक उपलब्ध हैं। विशेष रूप से फलों के आकार में तराशे गए सेब और अंगूर के गुच्छे, विभिन्न जानवरों की आकर्षक मूर्तियां, टेबल पर रखी जाने वाली घड़ियां और दीवार घड़ियां लोगों को बहुत लुभा रही हैं। केवल सजावटी सामान ही नहीं, बल्कि दैनिक उपयोग में आने वाले बर्तन जैसे चाय का सेट, पानी के जग, कप-प्लेट और मसाले कूटने वाला इमामदस्ता भी इस प्राकृतिक पत्थर से बेहद कुशलता से तैयार किए गए हैं।

घर की सजावट, वास्तु संतुलन और रखरखाव

इन कलाकृतियों को आवासीय परिसर के किसी भी हिस्से में सजाया जा सकता है। बैठक कक्ष यानी ड्राइंग रूम में इसका पानी का फव्वारा स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और घर के वास्तु दोषों को संतुलित करने में मदद मिलती है। डाइनिंग टेबल या सेंटर टेबल पर रखा ओनिक्स का सेब या अंगूर का गुच्छा घर आने वाले मेहमानों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लेता है। इसके अलावा, काबुल ओनिक्स की मजबूती और टिकाऊपन भी इसकी प्रमुख विशेषता है। यह पत्थर आसानी से टूटता या चटकता नहीं है और दशकों तक इसकी प्राकृतिक चमक यूं ही बरकरार रहती है। यदि समय के साथ इस पर धूल जम जाए, तो महज एक हल्के नम कपड़े से पोंछते ही यह पत्थर दोबारा पूरी तरह नए जैसा चमकने लगता है।

त्योहारी सीजन में उपहार के किफायती विकल्प

दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के मौके पर अपनों को पारंपरिक और यादगार भेंट देने के लिए ये कलाकृतियां एक बेहतरीन माध्यम बन रही हैं। स्टॉल पर प्रत्येक बजट वर्ग के ग्राहकों के लिए विकल्प मौजूद हैं। यहां उत्पादों की शुरुआती कीमत मात्र 350 रुपये है, जिसमें छोटे आकार के शो-पीस या फलों के मॉडल खरीदे जा सकते हैं। वहीं बड़े और जटिल नक्काशीदार फव्वारे अथवा संपूर्ण टी-सेट कुछ हजार रुपये की कीमत में उपलब्ध कराए गए हैं। मेले में आने वाले लोग न केवल अपने आशियाने को नया और भव्य रूप देने के लिए बल्कि रिश्तेदारों और मित्रों को सौगात देने के लिए भी इनकी खरीदारी कर रहे हैं।

सवाल-जवाब

देहरादून के विरासत फेस्ट में कौन सा पत्थर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है?
मेले में अफगानिस्तान के काबुल से लाया गया प्राकृतिक ओनिक्स पत्थर और उससे बनी कलाकृतियां लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई हैं।
काबुल ओनिक्स पत्थर की सबसे प्रमुख विशेषता क्या है?
इस पत्थर में प्राकृतिक ट्रांसलूसेंट चमक होती है जो रोशनी पड़ते ही अंदर से चमकती है, और इस पर किसी भी तरह के कृत्रिम रंग या पेंट का उपयोग नहीं किया जाता।
इन कलाकृतियों को कौन सा समूह तैयार करता है?
इन हस्तशिल्पों को अफगानिस्तान का खदमत ग्रुप तैयार करता है, जिसके मैनेजिंग डायरेक्टर अब्दुल वली शाराफजाई हैं।
एक छोटे ओनिक्स पीस को तैयार करने में कितना समय लगता है?
कारीगरों द्वारा एक छोटे से छोटे शो-पीस को तराशने, आकार देने और पॉलिश करने में लगभग एक महीने का समय लग जाता है।
विरासत फेस्ट के स्टॉल पर किस तरह की वस्तुएं मिल रही हैं?
यहां सेब और अंगूर के आकार के शो-पीस, जानवरों की मूर्तियां, घड़ियां, बड़े फव्वारे और जग, कप-प्लेट व इमामदस्ता जैसे बर्तन उपलब्ध हैं।
विरासत फेस्ट में ओनिक्स उत्पादों की शुरुआती कीमत क्या है?
स्टॉल पर छोटे उत्पादों की शुरुआती कीमत 350 रुपये है, जबकि बड़े फव्वारे और पूरे सेट कुछ हजार रुपये में मिल रहे हैं।
काबुल ओनिक्स की सफाई और रखरखाव कैसे किया जाता है?
इस पत्थर को किसी खास केमिकल की जरूरत नहीं होती, केवल एक हल्के गीले कपड़े से पोंछते ही यह दोबारा नए जैसा चमकने लगता है।
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टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·2 दिन पहले

देहरादून के इस मेले में अफगानिस्तान के पत्थरों से बनी कलाकृतियां और बर्तन सचमुच बहुत सुंदर लग रहे हैं, खासकर दिवाली के लिए।

Arjun Mehta@arjun-mehta·2 दिन पहले

देहरादून के इस मेले में अफगानिस्तान के पत्थरों की इतनी तारीफ सुनकर वाकई हैरानी हुई। कारीगरों की इतनी मेहनत के बाद इनकी कीमतें क्या वाकई आम लोगों की पहुँच में हैं या सिर्फ बड़े खरीदारों के लिए हैं?

Ravikash Gupta@ravikash·2 दिन पहले

अ अर्जुन जी, 350 रुपये से शुरू होने वाली कीमत सुनकर तो लगता है कि ये चीजें आम लोगों के बजट में भी आराम से आ सकती हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 दिन पहले

देहरादून के मेले में अफगानिस्तान का यह ओनिक्स पत्थर सचमुच कमाल का लग रहा है। बिना किसी केमिकल पॉलिश के इसकी प्राकृतिक चमक और पारदर्शी बनावट देखकर ही सुकून मिलता है। दिवाली पर घर की सजावट और तोहफों के लिए यह बहुत ही बढ़िया और अलग विकल्प है, और साढ़े तीन सौ रुपये से शुरुआत होना तो सोने पर सुहागा है।

Rohan Verma@rohan-verma·2 दिन पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने। 350 रुपये से शुरुआत होना वाकई इस अनोखी कला को घर तक लाने का एक बेहतरीन मौका दे रहा है।

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