देश की राजधानी में शिक्षा हासिल करने आए सात होनहार युवाओं की जिंदगी एक भयानक हादसे की बलि चढ़ गई। दिल्ली के सत्य निकेतन क्षेत्र में एक अवैध और जर्जर इमारत के अचानक जमींदोज हो जाने से सात छात्रों की दर्दनाक मौत हो गई। इस हादसे ने न केवल छात्रों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि उस प्रशासनिक नाकामी को भी बेनकाब किया है जो अवैध निर्माणों और खतरनाक छात्रावासों को फलने-फूलने देती है। मध्य प्रदेश के कटनी से दिल्ली आकर संघ लोक सेवा आयोग (IAS) की तैयारी कर रहा अक्षत इस हादसे का शिकार बन गया। वहीं देवास का रहने वाला अर्पित, जो रक्षाबंधन का त्योहार अपने परिवार के साथ मनाकर उसी सुबह दिल्ली वापस लौटा था, इस दुर्घटना में नहीं बच सका। दुर्ग से उच्च शिक्षा की उम्मीद लेकर आया युवराज, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से दिल्ली के कॉलेज में दाखिला लेने वाला अभिषेक और औरैया का पवन, जिनके मन में पढ़कर कुछ बड़ा करने के सपने थे, वे सभी इस हादसे में काल के गाल में समा गए।
माचिस की डिबिया जैसे कमरों में वसूली और अवैध निर्माण की हकीकत
सत्य निकेतन में जिस स्थान पर यह दुखद घटना घटी, वहां छात्रों को माचिस की डिबिया जैसे बेहद छोटे और संकरे कमरों में रहने के लिए मजबूर किया जाता था। पीजी हॉस्टल के नाम पर चलाए जा रहे इन असुरक्षित ठिकानों में रहने वाले हर छात्र से हर महीने 20 हजार रुपये तक की भारी रकम वसूली जाती थी। जिस इमारत के ढहने से यह हादसा हुआ, उसके पास केवल ग्राउंड फ्लोर के अलावा सिर्फ एक मंजिल बनाने की ही आधिकारिक अनुमति थी। इसके बावजूद नियम-कानूनों को ताक पर रखकर इस पर चार मंजिलों का निर्माण कर दिया गया था। दुर्घटना के बाद हरकत में आई पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मकान मालिक को राजस्थान के भिवाड़ी से गिरफ्तार कर लिया। जांच में यह बात सामने आई कि यह संपत्ति मकान मालिक की पत्नी के नाम दर्ज थी, जिसके चलते पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया है। इसके अतिरिक्त, जो बेटा इस पीजी का संचालन देख रहा था, उसे भी पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
प्रशासनिक कार्रवाई, निलंबन और दिल्ली के कोचिंग हब का कड़वा सच
हादसे की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने दिल्ली नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर और एग्जीक्यूटिव इंजीनियर समेत कुल पांच जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। हालांकि, यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या महज कुछ अफसरों पर निलंबन की कार्रवाई कर देने से उन पीड़ित परिवारों का गम कम हो सकता है जिन्होंने अपने युवा बेटों को हमेशा के लिए खो दिया है। दिल्ली में इस तरह के हादसे पहली बार नहीं हुए हैं। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले चार वर्षों के दौरान दिल्ली में इमारतों के गिरने की 133 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। इन हादसों में 1133 से अधिक इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं या गिरीं, जिनमें 100 से ज्यादा बेकसूर लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। हर बार हादसे के बाद जांच बिठाई जाती है और निलंबन की औपचारिक प्रक्रिया पूरी की जाती है, लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति फिर से पुरानी स्थिति में लौट आती है और अवैध निर्माण का यह खेल बदस्तूर जारी रहता है।
तंग गलियां और सुरक्षा मानकों की अनदेखी
दिल्ली में हादसों का खतरा केवल सत्य निकेतन तक ही सीमित नहीं है। मुखर्जी नगर, गोविंदपुरी, संत नगर और राजेंद्र नगर जैसे प्रमुख छात्र बहुल इलाकों में खतरनाक पीजी और हॉस्टल भरे पड़े हैं। इन क्षेत्रों में मात्र तीन से चार फीट चौड़ी संकरी गलियां हैं, जिनमें सात से आठ मंजिलों वाली ऊंची-ऊंची इमारतें बिना किसी पुख्ता सुरक्षा इंतजामों के खड़ी कर दी गई हैं। जहां भी बड़े अस्पताल मौजूद हैं, उनके आसपास मरीजों के परिजनों को ठहराने के नाम पर अवैध गेस्ट हाउस बना दिए गए हैं। इन गेस्ट हाउसों के चारों तरफ केमिस्ट की दुकानें, डायग्नोस्टिक सेंटर, ढाबे और खाने-पीने की दुकानें खुल जाती हैं। संकरी गलियों में रेहड़ी-पटरी वालों का कब्जा रहता है, जिससे रास्ता और भी तंग हो जाता है। इन इमारतों में निर्माण और सुरक्षा के हर नियम का उल्लंघन किया जाता है। यदि यहां कभी आग लग जाए या इमारत गिर जाए, तो मौके पर न तो फायर ब्रिगेड की गाड़ियां पहुंच सकती हैं और न ही मरीजों को ले जाने के लिए एम्बुलेंस दाखिल हो सकती है। स्थानीय नेताओं, पुलिस और नगर निगम के अफसरों की मिलीभगत से यह जानलेवा कारोबार बिना किसी रुकावट के चलता रहता है। जब तक इस माफिया पर स्थाई रूप से नकेल कसने के लिए कोई दीर्घकालिक मास्टर प्लान नहीं बनाया जाता, तब तक छात्रों और आम नागरिकों की जान पर यह तलवार लटकती रहेगी।
मध्य प्रदेश के सागर में जहरीली शराब से 22 की मौत
अवैध निर्माणों की तरह ही जहरीली शराब का कारोबार भी निर्दोष लोगों की जान ले रहा है। मध्य प्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब पीने के कारण मरने वालों की संख्या बढ़कर 22 तक पहुंच गई है। इसके अलावा, लगभग 160 लोग फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से कई की हालत अत्यंत नाजुक बनी हुई है। पीड़ित सभी लोगों ने एक ही ब्रांड की शराब का सेवन किया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने 20 आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया है और 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। फोरेंसिक और रासायनिक जांच में यह बात उजागर हुई है कि शराब में एथेनॉल की जगह मेथेनॉल मिलाया गया था। मेथेनॉल एक अत्यधिक विषैला रसायन है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से ऑयल पेंट के सॉल्वेंट, ईंधन और विभिन्न औद्योगिक रसायनों को बनाने में किया जाता है। मानव शरीर में इसका प्रवेश जानलेवा साबित होता है।
विभागों में खींचतान और गुजरात में नकली शराब की फैक्टरी का पर्दाफाश
सागर त्रासदी के बाद राज्य सरकार ने आबकारी विभाग पर गाज गिराते हुए सहायक आबकारी कमिश्नर, सहायक जिला आबकारी अधिकारी और आबकारी सब-इंस्पेक्टर को सस्पेंड कर दिया है। हालांकि, निलंबित अधिकारियों का तर्क है कि आबकारी विभाग की जिम्मेदारी केवल सरकारी शराब दुकानों पर बिकने वाले उत्पाद की जांच करना है, जबकि अवैध रूप से बेची जाने वाली शराब पर रोक लगाना पूरी तरह पुलिस प्रशासन का काम है। इस बीच, मध्य प्रदेश के ग्वालियर और इंदौर में भी पुलिस ने छापेमारी कर भारी मात्रा में अवैध शराब जब्त की है। दूसरी ओर, पूर्ण शराबबंदी वाले राज्य गुजरात के मोरबी से भी एक चिंताजनक मामला सामने आया है। मोरबी में पुलिस ने नकली शराब बनाने वाली एक फैक्टरी पर छापा मारा। शराब माफिया वहां खतरनाक रसायनों और रंगों के मिश्रण से नकली शराब तैयार कर रहे थे और उसे नामी ब्रांडेड व्हिस्की की खाली बोतलों में भरकर बाजार में बेच रहे थे। पुलिस ने मौके से 400 लीटर शुद्ध अल्कोहल, सैकड़ों लीटर तैयार नकली शराब, 1400 खाली बोतलें और विभिन्न ब्रांडों के स्टिकर बरामद किए हैं। इस मामले में फैक्टरी को सील करते हुए पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है।



















