राजस्थान में इस बार मानसून का मौसम निराशाजनक रहा है। बारिश के असमान और कमजोर वितरण के कारण राज्य के अधिकांश जिलों में औसत से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है। इस मौसमी बेरुखी का सीधा असर कृषि उत्पादन और भविष्य में पेयजल की उपलब्धता पर पड़ना तय है। हालांकि मानसून के सत्र में अभी लगभग 15 दिन बाकी हैं और इस दौरान होने वाली संभावित बारिश से कुछ हद तक स्थिति में सुधार की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन जल संकट की पूरी भरपाई होना असंभव सा लगता है।
बांधों में पिछले साल की तुलना में 28 फीसदी कम पानी
मानसून अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है, लेकिन राज्य के जल स्रोतों की मौजूदा स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। मानसून सत्र का अधिकांश समय बीत जाने के बाद भी प्रदेश के 693 बांध अपनी कुल भराव क्षमता के केवल 59.43 फीसदी तक ही पहुंच पाए हैं। अगर पिछले साल की इसी अवधि से तुलना की जाए तो तस्वीर काफी अलग थी, जब राज्य के बांध 87.21 फीसदी तक भर चुके थे। इस प्रकार इस साल जल भंडारों में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 28 फीसदी कम पानी उपलब्ध है।
पिछले साल के बचे पानी से मिली थी मजबूत शुरुआत
राजस्थान जैसे शुष्क राज्य में यह आंकड़ा महज एक संख्या नहीं है, बल्कि आने वाले महीनों की जीवन रेखा है। मानसून समाप्त होने के बाद इसी पानी का उपयोग पेयजल, सिंचाई और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए किया जाना है। इस साल राहत की बात यह रही कि मानसून की शुरुआत से पहले बांधों में पिछले साल की अच्छी बारिश का पर्याप्त पानी बचा हुआ था, जिसके चलते 15 जून से पहले ही जल भंडार 44.46 फीसदी भरे हुए थे। हालांकि 15 जून के बाद बारिश के मौसम में नई आवक केवल 15 फीसदी के आसपास ही सिमट कर रह गई, जिससे उम्मीद के मुताबिक पानी बांधों तक नहीं पहुंच सका।
192 बांध पड़े हैं पूरी तरह खाली
राज्य के जल प्रबंधन के सामने इस बार गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। कुल 693 बांधों में से 192 बांध पूरी तरह से खाली अवस्था में हैं। स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल 72 बांध ही अपनी पूरी क्षमता तक भर सके हैं, जबकि शेष 429 बांधों में पानी तो आया है लेकिन वे अपनी पूरी क्षमता से बहुत नीचे हैं। इसका मतलब है कि अधिकांश जलाशयों में आंशिक पानी तो उपलब्ध है, लेकिन आगामी दिनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए यह नाकाफी साबित हो सकता है।
सभागवार आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी असंतुलन दिखाती है। कोटा संभाग में बांधों का जलभराव सबसे बेहतर यानी 74.33 फीसदी दर्ज किया गया है। इसके अलावा बांसवाड़ा में 60.79 फीसदी, जयपुर में 59.81 फीसदी और भरतपुर संभाग में 52.88 फीसदी पानी उपलब्ध है। उदयपुर संभाग के बांधों में जलस्तर 44.96 फीसदी तक पहुंचा है। सबसे चिंताजनक स्थिति जोधपुर संभाग की है, जहां बांधों में मात्र 17.52 फीसदी पानी ही पहुंच पाया है, जो पश्चिमी राजस्थान में सूखे के गहरे संकट को दर्शाता है।
बीसलपुर और रामगढ़ बांध की स्थिति
राजधानी जयपुर और आसपास के बड़े हिस्से को पानी पिलाने वाले प्रमुख बीसलपुर बांध में भी इस बार जलस्तर पूर्ण क्षमता तक नहीं पहुंच पाया है और यह 74.87 फीसदी भरा हुआ है। वहीं ईसरदा बांध में जलभराव 54.14 फीसदी दर्ज किया गया है। इसके अलावा ऐतिहासिक रामगढ़ बांध इस मानसून में भी पूरी तरह सूखा ही रह गया है। यदि मानसून के बचे हुए दिनों में झमाझम बारिश नहीं होती है, तो आगामी वर्ष में राजस्थान को अत्यंत सीमित जल संसाधनों के साथ काम चलाना होगा।
भविष्य की चुनौतियां और जल संरक्षण की जरूरत
कम पानी का यह संकट केवल बांधों के आसपास के क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका दूरगामी प्रभाव कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पेयजल व्यवस्था और भूजल स्तर पर भी पड़ेगा। मानसून की पूर्ण विदाई से पहले अब केवल आसमान की तरफ ही निगाहें टिकी हुई हैं। यदि अंतिम समय में बादल मेहरबान होते हैं तो कुछ राहत मिल सकती है, अन्यथा पानी की एक-एक बूंद का प्रबंधन करना और उसका संयमित उपयोग करना ही एकमात्र विकल्प बचेगा। पारंपरिक रूप से जल संरक्षण के लिए पहचाने जाने वाले इस राज्य के लिए यह वक्त एक बार फिर पुरानी परंपराओं और सहेजने की संस्कृति को अपनाने का है।





















