नई दिल्ली में बिम्सटेक देशों के नेशनल सिक्योरिटी चीफ्स की 5वीं बैठक चल रही थी, तभी बंद कमरे से निकली एक खबर ने दुनिया भर के राजनयिकों के कान खड़े कर दिए. भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने म्यांमार के सुरक्षा प्रमुख यू तिन आंग सान के साथ अलग से एक गोपनीय मुलाकात की, जिसमें बॉर्डर की सुरक्षा से लेकर दोनों देशों के बीच मिलिट्री सहयोग बढ़ाने तक की रूपरेखा तय हुई. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक इस मीटिंग रूम के भीतर नॉर्थ-ईस्ट में छिपे उग्रवादियों, सीमा पार ड्रग्स तस्करी और म्यांमार में लगातार पैर पसार रहे चीन को काउंटर करने की पूरी रणनीति पर बात हुई.
सीमा और उग्रवाद पर भारत ने क्या साफ कर दिया
भारत की म्यांमार के साथ करीब 1,643 किलोमीटर लंबी खुली सीमा लगती है और यह सीमा हमारे चार पूर्वोत्तर राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम को छूती है. यही वजह है कि म्यांमार के भीतर की हलचल का सीधा असर भारत की अंदरूनी सुरक्षा पर पड़ता है और दिल्ली में होने वाली हर बड़ी बैठक में इस सीमा का जिक्र सबसे ऊपर रहता है.
भारत के कई उग्रवादी संगठन म्यांमार के घने जंगलों में अपने ठिकाने बनाकर बैठे हैं और वहीं से भारत में हमलों की साजिश रचते रहे हैं. सूत्रों की मानें तो अजीत डोभाल ने इस मुलाकात में म्यांमार को यह बात बिल्कुल साफ शब्दों में समझा दी कि भारत अपनी सुरक्षा से किसी भी हाल में समझौता नहीं करेगा और म्यांमार को अपनी जमीन से भारतीय उग्रवादियों की सफाई करनी ही होगी. यह मांग नई नहीं है, लेकिन इतने बड़े मंच पर दोनों देशों के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की सीधी बातचीत में इसे दोहराया जाना दिखाता है कि भारत अब इस मुद्दे पर टालमटोल बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है.
इसी के साथ भारत सरकार ने म्यांमार के साथ चला आ रहा बरसों पुराना फ्री मूवमेंट रिजीम पूरी तरह खत्म कर दिया है. इसका मतलब है कि अब दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा के आसानी से बॉर्डर पार आ-जा नहीं सकते. इतना ही नहीं, पूरी सीमा पर कटीले तारों की बाड़ लगाने का काम भी तेज रफ्तार से चल रहा है. इस गोपनीय बैठक में म्यांमार को यह संदेश भी दे दिया गया है कि भारत अब जमीन पर इस फैसले को पूरी सख्ती से लागू करेगा, यानी सिर्फ कागजों पर नहीं बल्कि हकीकत में बॉर्डर पर बदलाव दिखेगा.
बैठक में एक तीसरा बड़ा मुद्दा शरणार्थियों और नशे की तस्करी का भी उठा. म्यांमार के अंदर चल रही सैन्य हिंसा के चलते वहां के हजारों नागरिक सीमा पार कर मिजोरम और मणिपुर में शरण ले रहे हैं, जिससे इन राज्यों पर प्रशासनिक और सामाजिक दबाव लगातार बढ़ रहा है. साथ ही गोल्डन ट्राएंगल के रास्ते होने वाली ड्रग्स और हथियारों की तस्करी भी भारत के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई है. भारत ने म्यांमार की सेना से इन दोनों मोर्चों पर सख्त कार्रवाई की मांग रखी है ताकि सीमा पार से आने वाला यह दोहरा खतरा कम हो सके.
म्यांमार की सेना के लिए ये मुलाकात इतनी अहम क्यों
साल 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार की सेना यानी जुंटा को दुनिया भर में अलग-थलग कर दिया गया है. अमेरिका और यूरोपीय देशों ने म्यांमार पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, जिससे वहां की सत्ता पर काबिज सेना की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं और उसे बाहरी दुनिया से सहयोग जुटाना मुश्किल होता जा रहा है.
ऐसे हालात में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के साथ एक टेबल पर बैठना म्यांमार के सैन्य नेताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख और वैधता जताने का बड़ा मौका है. यह मुलाकात म्यांमार की सेना को यह दिखाने का एक जरिया देती है कि प्रतिबंधों के बावजूद वह पूरी तरह अलग-थलग नहीं पड़ी है.
दूसरी बड़ी वजह है म्यांमार की सेना का अपने ही मुल्क में कमजोर होता दबदबा. इस वक्त म्यांमार की सेना थ्री ब्रदरहुड एलायंस और पीपुल्स डिफेंस फोर्स यानी पीडीएफ जैसे लोकतंत्र समर्थक और जातीय विद्रोही गुटों के सामने बुरी तरह पिछड़ रही है. म्यांमार के कई बड़े प्रांतों के साथ-साथ भारत से सटी सीमाओं के बड़े हिस्सों पर भी विद्रोहियों का कब्जा हो चुका है. यही वजह है कि म्यांमार की सेना अब भारत से खुफिया जानकारी साझा करने और उग्रवादियों के खिलाफ तालमेल बढ़ाने की उम्मीद लगाए बैठी है, ताकि अपनी कमजोर पड़ती पकड़ को कुछ मजबूती दी जा सके.
तीसरी वजह पैसा और प्रोजेक्ट से जुड़ी है. भारत म्यांमार में कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और सित्तवे बंदरगाह का निर्माण कर रहा है. म्यांमार की सेना के लिए यह प्रोजेक्ट आर्थिक रूप से बेहद अहम है और इसकी सुरक्षा के लिए उसे भारत की मदद चाहिए, इसलिए भी वह भारत के साथ नजदीकी बनाए रखना चाहती है.
बीजिंग में क्यों बढ़ी बेचैनी
इस पूरी सीक्रेट मुलाकात की सबसे ज्यादा तपिश अगर कहीं महसूस हो रही है तो वह चीन की राजधानी बीजिंग में है. चीन हमेशा से म्यांमार को अपना एक मोहरा मानता आया है और उसने वहां चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा यानी सीएमईसी बनाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रखा है.
दरअसल चीन म्यांमार के रास्ते सीधे हिंद महासागर तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है, ताकि वह मलक्का स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता कम कर सके. अजीत डोभाल की यह मुलाकात चीन के इसी प्लान को सीधी टक्कर देती नजर आती है. भारत ने इस बैठक के जरिए म्यांमार को यह साफ जता दिया है कि वह अपने इस पड़ोसी देश को चीन का प्रॉक्सी नहीं बनने देगा और अपने पड़ोस में चीन की बढ़ती मौजूदगी को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेगा.
यह बात किसी से छिपी भी नहीं है कि म्यांमार के उत्तरी हिस्से में सक्रिय कई विद्रोही गुटों को चीन से ही हथियारों की सप्लाई मिलती रही है. भारत और म्यांमार के बीच बना यह सुरक्षा सहयोग चीन की इस दोहरी नीति को नाकाम करने की ताकत रखता है, क्योंकि एक तरफ चीन म्यांमार की सरकार से आर्थिक गलियारे के लिए हाथ मिलाए हुए है और दूसरी तरफ उसके विरोधी विद्रोही गुटों को हथियार भी मुहैया करा रहा है.
आगे भारत-म्यांमार रिश्तों की दिशा क्या होगी
भारत के लिए म्यांमार के साथ तालमेल बिठाना हमेशा से दोधारी तलवार पर चलने जैसा रहा है. एक तरफ भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते म्यांमार में जनता का राज देखना चाहता है, तो दूसरी तरफ जमीनी हकीकत और सुरक्षा से जुड़े तथ्य भी उतने ही अहम हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
सच यही है कि अपने पूर्वोत्तर राज्यों में शांति बनाए रखने के लिए म्यांमार की सत्ता पर काबिज सेना से हाथ मिलाना भारत की मजबूरी भी है और जरूरत भी. अजीत डोभाल और यू तिन आंग सान की यह मुलाकात पूरी तरह जमीनी हकीकत और दोनों देशों के असली हितों पर टिकी है. इस बैठक का सीधा असर आने वाले दिनों में भारत की अंदरूनी सुरक्षा से लेकर पूरे एशिया की राजनीति पर साफ देखने को मिलेगा.











