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हैदराबाद के निज़ाम का दिया दान बना ब्रिटेन की राजधानी में सेंट्रल मस्जिद की नींवतेलंगाना
20 सित॰ 2026, 3:56 pm (11 दिन पहले)· 1

हैदराबाद के निज़ाम का दिया दान बना ब्रिटेन की राजधानी में सेंट्रल मस्जिद की नींव

लंदन की प्रसिद्ध रीजेंट्स पार्क मस्जिद की शुरुआत सातवें निज़ाम के 60,000 पाउंड के योगदान से हुई थी, जो ताज महल की शैली में बनने वाली थी।

ब्रिटेन की राजधानी के मध्य में खड़ी लंदन सेंट्रल मस्जिद अपने अंदर दशकों पुराना अनोखा इतिहास समेटे हुए है। बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि इस विश्वविख्यात इबादतगाह की ऐतिहासिक जड़ें भारत में तत्कालीन हैदराबाद रियासत के शाही परिवार की आर्थिक मदद से जुड़ी हुई हैं।

केंसिंग्टन में शिलान्यास और शाही परिवार का सहयोग

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 4 जून 1937 को हुई थी, जब केंसिंग्टन स्थित मॉर्निंगटन एवेन्यू में लंदन निज़ामिया मस्जिद की नींव रखी गई। इस ऐतिहासिक शिलान्यास समारोह में हैदराबाद के प्रिंस ऑफ बेरार, नवाब मीर हिमायत अली खान यानी आज़म जाह बहादुर खुद उपस्थित रहे। उनके पिता तथा हैदराबाद के सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने इस धार्मिक स्थल के लिए 60,000 पाउंड की बहुत बड़ी आर्थिक सहायता दी थी। उस दौर में पूरे निर्माण कार्य का अनुमानित खर्च करीब 1,00,000 पाउंड आंका गया था।

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ताज महल की तर्ज पर डिजाइन और विश्व युद्ध की बाधा

प्रारंभिक खाके के तहत इस धार्मिक इमारत को आगरा के ताज महल की स्थापत्य शैली पर तैयार करने का विचार था। मकसद यह था कि पश्चिमी मुल्क में इस्लामी वास्तुकला की एक नायाब मिसाल कायम की जा सके। हालांकि, जब काम शुरू होने की दिशा में कदम बढ़े, तभी 1939 में छिड़े द्वितीय विश्व युद्ध के संकट और अंतरराष्ट्रीय अफरातफरी ने इस पूरी योजना की रफ्तार को पूरी तरह रोक दिया।

रीजेंट्स पार्क में जमीन का आवंटन और नया मोड़

युद्धकाल के दौरान वर्ष 1940 में ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सल्तनत में मौजूद इस्लामी समुदाय और लंदन में एक विशाल इबादतगाह की अहमियत को स्वीकार किया। शासन स्तर पर रीजेंट्स पार्क के पास एक नया भूखंड इस काम के लिए तय किया गया। वक्त बीतने के साथ पुरानी निज़ामिया मस्जिद से जुड़े न्यास और उसके तमाम वित्तीय कोष को इसी नई योजना में समाहित कर दिया गया।

सर फ्रेडरिक गिबर्ड का नया स्वरूप और 1978 में पूर्णता

यद्यपि ताज महल जैसा दिखने वाला पुराना ढांचा तो हकीकत में तब्दील नहीं हो पाया, परंतु विख्यात ब्रिटिश वास्तुकार सर फ्रेडरिक गिबर्ड ने इसे समकालीन और भव्य स्थापत्य का रूप प्रदान किया। कई दशकों के लंबे सफर और निर्माण प्रक्रिया के बाद आखिरकार वर्ष 1978 में यह इमारत मुकम्मल हुई। वर्तमान समय में लंदन सेंट्रल मस्जिद तथा रीजेंट्स पार्क मस्जिद के तौर पर पहचानी जाने वाली यह जगह ब्रिटेन के मुसलमानों का सबसे अहम केंद्र है, जिसमें हैदराबाद रियासत का योगदान हमेशा याद किया जाता है।

सवाल-जवाब

लंदन सेंट्रल मस्जिद की नींव कब रखी गई थी?
इस मस्जिद की शुरुआती परियोजना की नींव 4 जून 1937 को केंसिंग्टन के मॉर्निंगटन एवेन्यू में रखी गई थी।
हैदराबाद के किस निज़ाम ने इस मस्जिद के लिए दान दिया था?
हैदराबाद के सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने इस मस्जिद के निर्माण के लिए 60,000 पाउंड की राशि दान की थी।
शिलान्यास समारोह में हैदराबाद रियासत से कौन शामिल हुआ था?
शिलान्यास के मौके पर प्रिंस ऑफ बेरार, नवाब मीर हिमायत अली खान यानी आज़म जाह बहादुर उपस्थित थे।
मस्जिद के निर्माण की कुल अनुमानित लागत कितनी थी?
उस समय इस धार्मिक स्थल के निर्माण का कुल बजट लगभग 1,00,000 पाउंड आंका गया था।
शुरुआती योजना के अनुसार मस्जिद का डिजाइन कैसा होना था?
शुरुआती योजना के तहत इस इमारत की वास्तुकला को आगरा के ताज महल की तर्ज पर तैयार किया जाना तय हुआ था।
मस्जिद का मूल काम किस वजह से रुक गया था?
साल 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने और वैश्विक उथल-पुथल की वजह से इसका काम बीच में रुक गया था।
रीजेंट्स पार्क में यह मस्जिद किस वास्तुकार ने डिजाइन की और कब बनकर तैयार हुई?
इसे मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार सर फ्रेडरिक गिबर्ड ने डिजाइन किया और यह 1978 में बनकर पूरी तरह तैयार हुई।
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टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·10 दिन पहले

एक लाइफस्टाइल और डिजाइन पर्यवेक्षक के रूप में, यह कहानी वास्तुकला और शाही विरासत के एक बेहतरीन सांस्कृतिक संगम को दर्शाती है। आगरा के राजसी ताजमहल से प्रेरित डिजाइन से लेकर सर फ्रेडरिक गिबर्ड की समकालीन आधुनिक वास्तुकला तक का सफर यह दिखाता है कि कैसे ऐतिहासिक सौंदर्यशास्त्र वैश्विक जीवन शैली के लैंडमार्क में बदल जाता है। हैदराबाद के निजाम की भव्यता और ब्रिटिश आधुनिकता का यह मेल सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक अद्वितीय ऐतिहासिक डिजाइन और लाइफस्टाइल विरासत का प्रतीक है जो आज भी लंदन की पहचान में झलकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·10 दिन पहले

1937 में हैदराबाद रियासत द्वारा दिया गया 60,000 पाउंड का दान केवल एक धार्मिक सहयोग नहीं, बल्कि उस दौर के अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह और कूटनीतिक सॉफ्ट पावर का एक मजबूत वित्तीय प्रमाण है। तत्कालीन अनुमानित बजट के 60 प्रतिशत हिस्से का वित्तपोषण यह दर्शाता है कि भारतीय रियासतों का वैश्विक वित्तीय प्रभाव कितना गहरा था। युद्ध और विस्थापन के बावजूद ट्रस्ट के परिसंपत्ति प्रबंधन ने परियोजना को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता दी, जो आज भी लंदन में उपमहाद्वीप की ऐतिहासिक मौजूदगी को रेखांकित करता है।

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·10 दिन पहले

सहकर्मी के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह प्रकरण औपनिवेशिक दौर में भारतीय रियासतों के अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेश और सांस्कृतिक कूटनीति के व्यवस्थित प्रबंधन को उजागर करता है। सातवें निज़ाम द्वारा 60,000 पाउंड की शुरुआती पूंजी और बाद में द्वितीय विश्व युद्ध की उथल-पुथल के बीच मूल ट्रस्टीशिप का ब्रिटिश सरकार की नई योजना में विलय, उस समय के जटिल कानूनी-वित्तीय ढांचे की मजबूती को सिद्ध करता है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि आजादी से पूर्व भारतीय पूंजी और रणनीतिक परोपकार ने वैश्विक स्तर पर किस प्रकार स्थायी बुनियादी ढांचे के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाई, जिसकी वित्तीय विरासत आज भी लंदन में दर्ज है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·10 दिन पहले

कानूनी और संस्थागत ट्रस्ट प्रबंधन के नज़रिए से यह इतिहास बेहद दिलचस्प है कि कैसे युद्धकालीन संकट और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद सीमा-पार की वसीयती संपत्तियों और वित्तीय फंड्स की कानूनी शुचिता बरकरार रही। 1937 के निज़ामिया ट्रस्ट के फंड को बाद में रीजेंट्स पार्क परियोजना के साथ औपचारिक रूप से समाहित किया जाना यह रेखांकित करता है कि जब सार्वजनिक धर्मार्थ न्यासों का प्रशासन विधिक प्रक्रियाओं और पारदर्शिता के साथ हो, तो दशकों की देरी के बाद भी दानकर्ताओं की मूल कानूनी मंशा सुरक्षित रहती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·10 दिन पहले

करन के कानूनी विश्लेषण को भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से आगे बढ़ाएं तो यह घटनाक्रम औपनिवेशिक काल की 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति और राज्य-शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1940 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा रीजेंट्स पार्क में जमीन आवंटित करना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि साम्राज्य भर के मुस्लिम सैनिकों और जनसांख्यिकी को युद्ध प्रयासों में साधे रखने की एक सोची-समझी कूटनीतिक नीति थी। हैदराबाद रियासत की यह फंडिंग दर्शाती है कि भारतीय देशी रियासतें वैश्विक मंच पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल रही थीं। आज भी यह मस्जिद बहुसांस्कृतिक ब्रिटेन में ऐतिहासिक भारतीय कूटनीति और सार्वजनिक नीति के स्थायी प्रभाव का प्रमाण है।

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