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झारखंड में मक्के की फसल पर फफूंद का साया, कृषि वैज्ञानिक ने दी खेत से जल निकासी की अहम सलाहझारखंड
24 सित॰ 2026, 11:40 am (20 घंटे पहले)· 0

झारखंड में मक्के की फसल पर फफूंद का साया, कृषि वैज्ञानिक ने दी खेत से जल निकासी की अहम सलाह

सितंबर की बारिश के बीच पलामू में मक्के के दानों में दूध भरने की अवस्था के दौरान जलभराव और अतिरिक्त नमी से तना व भुट्टा सड़न का खतरा बढ़ गया है, जिससे बचाव के लिए कृषि विशेषज्ञ ने आवश्यक उपाय सुझाए हैं।

सितंबर के दौरान झारखंड के कई इलाकों में हुई बारिश धान की खेती के लिए काफी लाभकारी सिद्ध हो रही है। पर्याप्त पानी मिलने से खेतों में जरूरी नमी सुरक्षित है, जिससे धान के पौधों के विकास को गति मिल रही है। इसके विपरीत, यही लगातार होने वाली वर्षा और जमीन में अत्यधिक नमी की मौजूदगी कुछ दूसरी फसलों के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकती है। खरीफ के इस मौसम में अलग-अलग फसलों की आवश्यकताएं भिन्न होती हैं, इसलिए काश्तकारों को अपने खेतों की स्थिति के मुताबिक विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।

दूध भरने की अवस्था में जलभराव से फफूंद का खतरा

कृषि वैज्ञानिक डॉ० प्रमोद कुमार ने स्थिति का विश्लेषण करते हुए बताया कि पलामू में मक्के की काश्त करने वाले किसानों के लिए सितंबर की बरसात कुछ खास परिस्थितियों में चिंता का विषय बन रही है। विशेषकर जब मक्के के भुट्टों में दाने बनने और उनमें दूध भरने की प्रक्रिया चल रही हो, उस संवेदनशील समय में खेत में लगातार नमी बने रहना बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। खेतों में पानी जमा रहने से फफूंदजनित बीमारियों के तेजी से फैलने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे समय में काश्तकारों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपने मक्के के खेतों की नियमित देखरेख करें और कहीं भी पानी का ठहराव न होने दें।

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तना सड़न और कीटों के प्रकोप से कमजोर होते पौधे

लगातार आर्द्रता और गीली मिट्टी की वजह से फसलों में हानिकारक कीटों के हमले की संभावना काफी तेज हो जाती है। अत्यधिक नमी के वातावरण में मक्के की फसल में तना सड़न की गंभीर समस्या उभर सकती है। इस बीमारी के प्रभाव से पौधे के मुख्य तने के भीतरी हिस्से में सड़न पैदा होने लगती है, जिसके चलते पूरा पौधा खोखला और कमजोर होकर जमीन पर गिर सकता है। तना प्रभावित होने के कारण कई बार ऊपरी पत्तियां भी तेजी से सूखने लगती हैं। किसानों को चाहिए कि खेत में घूमकर ऐसे संदिग्ध लक्षणों की फौरन पहचान करें और बीमारी को फैलने से रोकने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाएं।

भुट्टा सड़न से पैदावार और दानों की गुणवत्ता को क्षति

डॉ० प्रमोद कुमार ने इस बात पर भी जोर दिया कि मक्के में भुट्टा सड़न का रोग किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान पहुंचा सकता है। इस फफूंदजनित विकार के आक्रमण से भुट्टों पर साफ तौर पर फफूंद की परत दिखाई देने लगती है, जिससे अंदर मौजूद दाने काले अथवा भूरे रंग के होकर पूरी तरह सड़ जाते हैं। खेतों में लंबे समय तक नमी टिके रहने और कीटों द्वारा भुट्टों में किए जाने वाले बारीक सुराखों के चलते यह बीमारी और अधिक विकराल रूप धारण कर लेती है। इसी वजह से समय-समय पर भुट्टों की ऊपरी और भीतरी जांच करते रहना बेहद जरूरी है।

पत्तियों पर झुलसा, रस्ट और डाउन मिल्ड्यू के मुख्य लक्षण

मक्के की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य रोगों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पत्ती झुलसा रोग लगने पर पत्तियों के ऊपर लंबे भूरे या फिर पीले-भूरे रंग के धब्बे उभर आते हैं। संक्रमण गहराने पर धीरे-धीरे समूची पत्तियां सूखकर नष्ट होने लगती हैं। दूसरी तरफ, रस्ट रोग के हमले की दशा में पत्तियों की सतह पर नारंगी या भूरे रंग के छोटे-छोटे फफोलेनुमा दाने या निशान दिखने लगते हैं।

इसके अतिरिक्त, डाउन मिल्ड्यू नामक रोग की चपेट में आने पर मक्के की पत्तियों पर पीली धारियां और चकत्ते नजर आने लगते हैं। कई मौकों पर पत्तियों की निचली सतह पर सफेद या हल्के धूसर रंग की फफूंद भी जमी हुई देखी जा सकती है। बरसात के दिनों में खेतों के भीतर अतिरिक्त नमी बने रहने पर इन तमाम विकारों पर कड़ी नजर रखना हर किसान के लिए अनिवार्य हो जाता है।

संतुलित पोषण, दवा का चयन और आगामी मौसम की तैयारी

मक्के के पौधों में दूध भरने के नाजुक दौर में खेत के भीतर किसी भी सूरत में पानी का भराव नहीं होने देना चाहिए। अत्यधिक गीलापन तने और भुट्टे की सड़न को तेजी से न्योता देता है। किसानों को यह भी सावधानी बरतनी चाहिए कि वे फसल में आवश्यकता से अधिक यूरिया या नाइट्रोजन का छिड़काव बिल्कुल न करें, बल्कि पौधे की जरूरत के आधार पर ही संतुलित खाद का उपयोग करें। यदि खेत में कोई रोगग्रस्त पौधा या सूखी पत्तियां दिखाई दें, तो उन्हें काटकर खेत से बाहर निकाल देना संक्रमण रोकने का बेहतर उपाय है।

पत्तियों पर धब्बे, झुलसा, रस्ट अथवा भुट्टे में सड़न जैसे लक्षण सामने आने पर बिना सोचे-समझे किसी भी कीटनाशक या दवा का अंधाधुंध छिड़काव नहीं करना चाहिए। जब रोग की सटीक पहचान हो जाए, तभी कृषि विशेषज्ञ अथवा कृषि विभाग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक सुझाई गई फफूंदनाशी दवा पेंडीमैथिलिन का प्रयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही, अगले बुवाई सत्र में रोगों के जोखिम को घटाने के लिए हमेशा स्वस्थ बीजों, रोगरोधी किस्मों और वैज्ञानिक फसल चक्र का पालन करना सबसे सुरक्षित रणनीति साबित होगा।

सवाल-जवाब

सितंबर की बारिश से झारखंड में किन फसलों को लाभ और नुकसान हुआ है?
सितंबर की बारिश धान की फसल के विकास के लिए काफी लाभदायक साबित हो रही है, जबकि मक्के की फसल में अधिक नमी के कारण बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
मक्के की फसल में दूध भरने की अवस्था में जलभराव से क्या नुकसान हो सकता है?
इस अवस्था में खेत में पानी जमा रहने से पौधों में फफूंदजनित रोगों, तना सड़न और भुट्टा सड़न का जोखिम काफी बढ़ जाता है।
मक्के में तना सड़न रोग के मुख्य लक्षण क्या हैं?
तना सड़न होने पर तने के अंदर सड़न शुरू हो जाती है, पत्तियां सूखने लगती हैं और पौधा कमजोर होकर गिर सकता है।
भुट्टा सड़न रोग होने पर दानों की क्या स्थिति होती है?
इस रोग में भुट्टे पर फफूंद दिखती है और दाने काले या भूरे पड़कर पूरी तरह सड़ने लगते हैं।
पत्ती झुलसा, रस्ट और डाउन मिल्ड्यू रोगों की पहचान कैसे की जाए?
झुलसा में पत्तियों पर लंबे भूरे धब्बे, रस्ट में नारंगी-भूरे फफोले और डाउन मिल्ड्यू में पीली धारियां व निचली सतह पर सफेद फफूंद दिखाई देती है।
मक्के के खेत में पानी जमा होने पर किसानों को क्या प्राथमिक उपाय करने चाहिए?
खेत से अतिरिक्त पानी तुरंत बाहर निकालें, यूरिया का जरूरत से ज्यादा प्रयोग न करें और रोगग्रस्त पत्तियों को खेत से हटा दें।
रोग दिखने पर किस दवा के प्रयोग की सलाह दी गई है?
रोग की सही पहचान के बाद कृषि विशेषज्ञ या विभाग की अनुशंसा पर फफूंदनाशी दवा पेंडीमैथिलिन का इस्तेमाल किया जा सकता है।
आगामी मौसम में मक्के को रोगों से बचाने के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं?
अगले सत्र में स्वस्थ बीजों का इस्तेमाल, रोगरोधी किस्मों का चयन और उचित फसल चक्र अपनाना आवश्यक बताया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·18 घंटे पहले

बरसात के मौसम में खेतों से पानी न निकलना मक्के की फसल पर भारी पड़ रहा है। किसानों को समय रहते जल निकासी पर ध्यान देना चाहिए ताकि फफूंद और तना सड़न से फसल बच सके।

Arjun Mehta@arjun-mehta·18 घंटे पहले

डॉ० प्रमोद कुमार ने पलामू के मक्का किसानों के लिए ठीक समय पर चेतावनी दी है। सितंबर की बारिश से भुट्टों में फफूंद लगना वाकई चिंता की बात है।

Ravikash Gupta@ravikash·18 घंटे पहले

अर्जुन जी, बात तो सही है पर मुझे लगता है किसान जल निकासी वैसे भी कर लेते हैं, इतनी बड़ी चेतावनी की शायद जरूरत नहीं थी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·19 घंटे पहले

वैज्ञानिक साहब पानी निकालने की सलाह तो दे रहे हैं, पर पलामू के खेतों में जलभराव रोकने का कोई पक्का इंतजाम है क्या? बारिश रुक जाए तब तो ठीक, वरना सिर्फ सलाह से खेत थोड़ी बच जाएंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·19 घंटे पहले

करण भाई, बात तो सही है आपकी। पलामू में जल निकासी के पक्के इंतजाम न होने से किसानों की मुश्किलें हर साल बढ़ जाती हैं।

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