सितंबर के दौरान झारखंड के कई इलाकों में हुई बारिश धान की खेती के लिए काफी लाभकारी सिद्ध हो रही है। पर्याप्त पानी मिलने से खेतों में जरूरी नमी सुरक्षित है, जिससे धान के पौधों के विकास को गति मिल रही है। इसके विपरीत, यही लगातार होने वाली वर्षा और जमीन में अत्यधिक नमी की मौजूदगी कुछ दूसरी फसलों के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकती है। खरीफ के इस मौसम में अलग-अलग फसलों की आवश्यकताएं भिन्न होती हैं, इसलिए काश्तकारों को अपने खेतों की स्थिति के मुताबिक विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।
दूध भरने की अवस्था में जलभराव से फफूंद का खतरा
कृषि वैज्ञानिक डॉ० प्रमोद कुमार ने स्थिति का विश्लेषण करते हुए बताया कि पलामू में मक्के की काश्त करने वाले किसानों के लिए सितंबर की बरसात कुछ खास परिस्थितियों में चिंता का विषय बन रही है। विशेषकर जब मक्के के भुट्टों में दाने बनने और उनमें दूध भरने की प्रक्रिया चल रही हो, उस संवेदनशील समय में खेत में लगातार नमी बने रहना बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। खेतों में पानी जमा रहने से फफूंदजनित बीमारियों के तेजी से फैलने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे समय में काश्तकारों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपने मक्के के खेतों की नियमित देखरेख करें और कहीं भी पानी का ठहराव न होने दें।
तना सड़न और कीटों के प्रकोप से कमजोर होते पौधे
लगातार आर्द्रता और गीली मिट्टी की वजह से फसलों में हानिकारक कीटों के हमले की संभावना काफी तेज हो जाती है। अत्यधिक नमी के वातावरण में मक्के की फसल में तना सड़न की गंभीर समस्या उभर सकती है। इस बीमारी के प्रभाव से पौधे के मुख्य तने के भीतरी हिस्से में सड़न पैदा होने लगती है, जिसके चलते पूरा पौधा खोखला और कमजोर होकर जमीन पर गिर सकता है। तना प्रभावित होने के कारण कई बार ऊपरी पत्तियां भी तेजी से सूखने लगती हैं। किसानों को चाहिए कि खेत में घूमकर ऐसे संदिग्ध लक्षणों की फौरन पहचान करें और बीमारी को फैलने से रोकने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाएं।
भुट्टा सड़न से पैदावार और दानों की गुणवत्ता को क्षति
डॉ० प्रमोद कुमार ने इस बात पर भी जोर दिया कि मक्के में भुट्टा सड़न का रोग किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान पहुंचा सकता है। इस फफूंदजनित विकार के आक्रमण से भुट्टों पर साफ तौर पर फफूंद की परत दिखाई देने लगती है, जिससे अंदर मौजूद दाने काले अथवा भूरे रंग के होकर पूरी तरह सड़ जाते हैं। खेतों में लंबे समय तक नमी टिके रहने और कीटों द्वारा भुट्टों में किए जाने वाले बारीक सुराखों के चलते यह बीमारी और अधिक विकराल रूप धारण कर लेती है। इसी वजह से समय-समय पर भुट्टों की ऊपरी और भीतरी जांच करते रहना बेहद जरूरी है।
पत्तियों पर झुलसा, रस्ट और डाउन मिल्ड्यू के मुख्य लक्षण
मक्के की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य रोगों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पत्ती झुलसा रोग लगने पर पत्तियों के ऊपर लंबे भूरे या फिर पीले-भूरे रंग के धब्बे उभर आते हैं। संक्रमण गहराने पर धीरे-धीरे समूची पत्तियां सूखकर नष्ट होने लगती हैं। दूसरी तरफ, रस्ट रोग के हमले की दशा में पत्तियों की सतह पर नारंगी या भूरे रंग के छोटे-छोटे फफोलेनुमा दाने या निशान दिखने लगते हैं।
इसके अतिरिक्त, डाउन मिल्ड्यू नामक रोग की चपेट में आने पर मक्के की पत्तियों पर पीली धारियां और चकत्ते नजर आने लगते हैं। कई मौकों पर पत्तियों की निचली सतह पर सफेद या हल्के धूसर रंग की फफूंद भी जमी हुई देखी जा सकती है। बरसात के दिनों में खेतों के भीतर अतिरिक्त नमी बने रहने पर इन तमाम विकारों पर कड़ी नजर रखना हर किसान के लिए अनिवार्य हो जाता है।
संतुलित पोषण, दवा का चयन और आगामी मौसम की तैयारी
मक्के के पौधों में दूध भरने के नाजुक दौर में खेत के भीतर किसी भी सूरत में पानी का भराव नहीं होने देना चाहिए। अत्यधिक गीलापन तने और भुट्टे की सड़न को तेजी से न्योता देता है। किसानों को यह भी सावधानी बरतनी चाहिए कि वे फसल में आवश्यकता से अधिक यूरिया या नाइट्रोजन का छिड़काव बिल्कुल न करें, बल्कि पौधे की जरूरत के आधार पर ही संतुलित खाद का उपयोग करें। यदि खेत में कोई रोगग्रस्त पौधा या सूखी पत्तियां दिखाई दें, तो उन्हें काटकर खेत से बाहर निकाल देना संक्रमण रोकने का बेहतर उपाय है।
पत्तियों पर धब्बे, झुलसा, रस्ट अथवा भुट्टे में सड़न जैसे लक्षण सामने आने पर बिना सोचे-समझे किसी भी कीटनाशक या दवा का अंधाधुंध छिड़काव नहीं करना चाहिए। जब रोग की सटीक पहचान हो जाए, तभी कृषि विशेषज्ञ अथवा कृषि विभाग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक सुझाई गई फफूंदनाशी दवा पेंडीमैथिलिन का प्रयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही, अगले बुवाई सत्र में रोगों के जोखिम को घटाने के लिए हमेशा स्वस्थ बीजों, रोगरोधी किस्मों और वैज्ञानिक फसल चक्र का पालन करना सबसे सुरक्षित रणनीति साबित होगा।
























