झारखंड के कोडरमा जिले में स्थित एक दर्जी की दुकान आज के इस आधुनिक और रेडीमेड दौर में भी अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाए हुए है। तिलैया थाना के बेहद करीब चलने वाली यह दुकान पिछले पांच दशकों या कहें कि पांच पीढ़ियों से लोगों के लिए बेहतरीन कपड़े सिलने का काम कर रही है। समय के साथ-साथ इस दुकान का नाम भी बदला और काम करने का अंदाज भी काफी आधुनिक हो गया। लेकिन एक चीज जो इतने वर्षों में बिल्कुल नहीं बदली, वह है इसके ग्राहकों का इस दुकान पर अटूट विश्वास। साल 1919 में शुरू हुआ कपड़ों की सिलाई का यह ऐतिहासिक सफर आज के डिजिटल और आधुनिक युग में पूरी तरह से अपनी जगह मजबूत कर चुका है। वर्तमान समय में इस दुकान में कुल 18 कुशल कारीगरों की एक बेहतरीन टीम काम करती है, जो अलग-अलग तरह के कपड़ों की कटिंग, सिलाई और कस्टमाइज्ड फिटिंग के काम को बेहद बारीकी के साथ अंजाम देती है।
हाथ की सिलाई से शुरू हुआ था दादा-परदादा का यह सफर
इस ऐतिहासिक दुकान का संचालन करने वाले वर्तमान संचालक परवेज आलम ने अपनी विरासत के बारे में खुलकर बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि इस सिलाई व्यवसाय की नींव उनके परदादा तफज्जुल खलीफा ने साल 1919 में रखी थी। उस शुरुआती दौर में उन्होंने इस दुकान का नाम 'तफज्जुल टेलर' रखा था। वह ऐसा समय था जब बाजार में आधुनिक सिलाई मशीनें आसानी से उपलब्ध नहीं हुआ करती थीं। ऐसे में उनके परदादा ग्राहकों के कपड़ों की सिलाई पूरी तरह से अपने हाथों से, सुई-धागे की मदद से किया करते थे। इसके बाद व्यवसाय की बागडोर परवेज के दादा वाहिद खलीफा के हाथों में आई। उन्होंने न केवल इस पारिवारिक हुनर को जिंदा रखा, बल्कि दुकान की प्रतिष्ठा को आसपास के इलाकों में और अधिक फैलाया। पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हुए यह काम उनके पिता अब्दुल रशीद के पास पहुंचा। अब्दुल रशीद ने दुकान का नाम बदलकर 'चोला टेलर' रख दिया। उनके कार्यकाल के दौरान तकनीकी विकास हुआ और दुकान में पहली बार सिलाई मशीनों का इस्तेमाल शुरू हुआ, जिससे काम में तेजी आई। इसके बाद साल 2006 में इस पुश्तैनी काम की जिम्मेदारी परवेज आलम ने संभाली और उन्होंने इसका नाम बदलकर 'परफेक्ट टेलर' कर दिया।
समय के साथ बदल गए सिलाई के दाम और ग्राहकों के तरीके
परवेज आलम याद करते हुए बताते हैं कि साल 2006 में जब उन्होंने काम संभाला था, तब और आज के दौर में महंगाई और सिलाई की कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। साल 2006 के दौरान उनकी दुकान में एक शर्ट की सिलाई के लिए केवल 60 रुपये और एक पैंट की सिलाई के लिए 110 रुपये लिए जाते थे। इसके अलावा, उस समय काफी लोकप्रिय रहने वाले सफारी सूट की सिलाई 275 रुपये में होती थी, जबकि एक शानदार कोट-पैंट सिलवाने का खर्च लगभग 1500 रुपये आता था। वक्त बदला और आज के आधुनिक दौर में कीमतें भी बढ़ गईं। वर्तमान में इस दुकान पर शर्ट-पैंट की सिलाई का शुल्क बढ़कर लगभग 1000 रुपये हो चुका है, जबकि एक आकर्षक कोट-सूट की सिलाई का खर्च करीब 4500 रुपये तक पहुंच गया है। इसके साथ ही, ग्राहकों की मांग और काम करने का तरीका भी पूरी तरह बदल चुका है। आजकल बहुत से ग्राहक अपनी पसंद के कपड़े सिलवाने के लिए अपने स्मार्टफोन पर ऑनलाइन खोजे गए ट्रेंडी डिजाइन लेकर दुकान पर आते हैं। कारीगर भी इन ऑनलाइन डिजाइनों को देखकर ठीक उसी पैटर्न और स्टाइल में कपड़े सिलकर तैयार कर देते हैं।
ब्रांडेड कपड़ों पर भारी कस्टमाइज्ड फिटिंग का भरोसा
आज बाजार में बड़े से बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के रेडीमेड कपड़े मौजूद हैं, लेकिन फिर भी लोग परफेक्ट टेलर की फिटिंग पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। परवेज आलम के अनुसार, दुनिया के हर व्यक्ति के शरीर की बनावट, लंबाई और चौड़ाई पूरी तरह से अलग होती है। यही वजह है कि फैक्ट्रियों में थोक में बनने वाले ब्रांडेड रेडीमेड कपड़ों की फिटिंग हर किसी के शरीर पर बिल्कुल सटीक नहीं बैठती। कई बार लोग बहुत महंगे ब्रांडेड कपड़े खरीदने के बाद भी उसकी सही फिटिंग कराने के लिए उनके पास आते हैं। इसी लाजवाब फिटिंग की वजह से इस दुकान के ग्राहक सिर्फ कोडरमा शहर तक ही सीमित नहीं रह गए हैं। हजारीबाग, गिरिडीह, बरकट्ठा जैसी कई नजदीकी जगहों और कस्बों से लोग विशेष रूप से अपने कपड़े सिलवाने के लिए यहां आते हैं। परवेज ने एक दिलचस्प उदाहरण देने हुए बताया कि कोडरमा का ही रहने वाला एक व्यक्ति जो अब सालों से बेंगलुरु में बस चुका है, वह आज भी केवल उन्हीं से कपड़े सिलवाता है। वह बेंगलुरु से कूरियर के जरिए कपड़े कोडरमा भेजता है। यहां उसकी सटीक माप के अनुसार सिलाई और फिटिंग की जाती है और फिर से कूरियर के माध्यम से उन सिले हुए कपड़ों को वापस बेंगलुरु भेज दिया जाता है।
गुणवत्ता का खास नियम: कपड़े की कटिंग से पहले धुलाई
कपड़ों की शानदार और टिकाऊ फिटिंग सुनिश्चित करने के लिए परफेक्ट टेलर में एक बेहद अनोखी और कड़े नियम वाली प्रक्रिया का पालन किया जाता है। परवेज आलम बताते हैं कि जब भी कोई ग्राहक नया कपड़ा लेकर दुकान पर आता है, तो उसकी सीधे कटिंग नहीं की जाती। सबसे पहले उस कपड़े को पानी में अच्छी तरह से धोया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कपड़े का जो भी सिकुड़ना यानी श्रिंकेज हो, वह सिलाई से पहले ही हो जाए। कपड़े को धोने और अच्छी तरह सुखाने के बाद ही उस पर माप के अनुसार निशान लगाए जाते हैं और फिर कटिंग व सिलाई का मुख्य काम शुरू होता है। इस अनूठी प्रक्रिया से कपड़े की फिटिंग सिलाई के बाद और धोने के बाद भी हमेशा एक जैसी बनी रहती है। पांच पीढ़ियों के इस लंबे सफर में भले ही कपड़े सिलने के औजार, तकनीक और फैशन के डिजाइन बदल गए हों, लेकिन ग्राहकों को बेहतरीन गुणवत्ता और अटूट विश्वास देना आज भी इस परिवार का सबसे बड़ा संकल्प है।





















