संयुक्त राष्ट्र महासभा के वैश्विक मंच पर भाषण देते हुए इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और गाजा में सैन्य कार्रवाई के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने वैश्विक बिरादरी के सामने स्पष्ट किया कि हमास के विरुद्ध इजरायल का कड़ा रुख कोई सामयिक रणनीति भर नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता और अस्तित्व को बचाए रखने का अंतिम प्रयास है। इस दौरान उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन के एक बेहद संवेदनशील प्रसंग को साझा किया, जिसमें दशकों पूर्व उनके बड़े भाई द्वारा कहे गए पांच शब्दों ने उनकी संपूर्ण सोच और इजरायल की सुरक्षा रणनीति को दिशा दी थी।
1967 के संकट और सामूहिक कब्रों की तैयारी का संस्मरण
अपने संबोधन में नेतन्याहू ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए 1967 के सिक्स-डे वॉर से ठीक पहले के अत्यंत तनावपूर्ण पलों का ब्योरा दिया। उस दौर में नेतन्याहू अमेरिका के फिलाडेल्फिया में अपनी पढ़ाई कर रहे थे। उस समय इजरायल के चारों तरफ गंभीर सैन्य खतरा मंडरा रहा था, क्योंकि मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेनाएं संयुक्त रूप से हमले की तैयारी में जुटी हुई थीं। देश के वजूद पर ऐसा अभूतपूर्व संकट था कि संभावित विनाश की आशंका के चलते शहरों के अंदर नागरिकों के अंतिम संस्कार के लिए सामूहिक कब्रें पहले ही खोदी जाने लगी थीं।
संघर्ष की शुरुआत होने से महज पांच दिन पहले 17 वर्ष की उम्र में नेतन्याहू अपनी पढ़ाई छोड़कर वापस इजरायल पहुंचे। उस समय पूरा राष्ट्र ब्लैकआउट के अंधेरे और भयावह सन्नाटे में डूबा हुआ था। ऐसे अनिश्चित और भयभीत वातावरण के बीच युवा नेतन्याहू अपने 21 वर्षीय बड़े भाई योनातन योनी नेतन्याहू से मिलने पहुंचे, जो उस समय इजराइली सेना की पैराट्रूपर यूनिट में बतौर अधिकारी सेवा दे रहे थे।
रामला के बागानों में वह ऐतिहासिक संवाद
दोनों भाइयों की यह मुलाकात रामला के पास संतरे के बागों में बने एक सैन्य शिविर में हुई, जहां सैनिकों के अस्थायी तंबू लगाए गए थे। चारों तरफ युद्ध की तैयारियों के बीच दोनों भाई गले मिले। एक फौजी केतली में तैयार की गई गर्म कॉफी पीते हुए 17 वर्षीय नेतन्याहू ने अपने बड़े भाई से वह प्रश्न पूछा जो उस समय इजरायल के हर नागरिक के मन में कौंध रहा था कि आगे क्या होने वाला है और देश का भविष्य क्या रहेगा।
योनी ने अपने छोटे भाई की ओर देखा और अत्यंत शांत भाव से एक ऐसा वाक्य कहा जिसने हमेशा के लिए नेतन्याहू के दृष्टिकोण को बदल दिया। योनी ने कहा था कि इजरायल जीतेगा क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है। नेतन्याहू के अनुसार, ये पांच शब्द केवल उस युद्ध के लिए नहीं थे, बल्कि वे पूरे देश के अस्तित्व का मूल सिद्धांत बन गए। यदि इजरायल पराजित होता है, तो उसका नाम मिट जाएगा, इसलिए विजय कोई साधारण विकल्प नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।
एनटेबे ऑपरेशन और योनी नेतन्याहू का बलिदान
अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि उनके भाई ने केवल बातें नहीं की थीं, बल्कि इस सिद्धांत को अपने प्राणों की आहुति देकर चरितार्थ भी किया। 1976 में जब फिलिस्तीनी आतंकवादियों ने एयर फ्रांस के एक यात्री विमान का अपहरण कर उसे युगांडा के एनटेबे हवाई अड्डे पर उतार लिया था, तब वहां बंधक बनाए गए यात्रियों को छुड़ाने के लिए एक अत्यंत गुप्त और साहसी कमांडो अभियान चलाया गया था।
अपहरणकर्ताओं ने बंधकों में से यहूदी यात्रियों को अलग छांटकर उन्हें मार डालने की धमकी दी थी। इजरायल से हजारों मील दूर अफ्रीका के महाद्वीप में जाकर इजराइली कमांडो दस्ते ने उस खतरनाक मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और 103 यहूदी बंधकों को सुरक्षित बचा लिया। हालांकि, इस ऐतिहासिक बचाव अभियान का नेतृत्व कर रहे योनी नेतन्याहू उस पूरे ऑपरेशन में शहीद होने वाले एकमात्र इजराइली सैनिक बने, जिससे नेतन्याहू परिवार ने अपना एक सदस्य सदा के लिए खो दिया।
7 अक्टूबर के हमले और गाजा अभियान का औचित्य
एनटेबे की उस ऐतिहासिक घटना के 47 वर्ष बाद, 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल ने अपने इतिहास का सबसे भीषण आतंकी हमला झेला। हमास के लड़ाकों ने सीमा पार घुसपैठ कर 1200 से अधिक लोगों की जान ले ली और सैकड़ों नागरिकों को बंधक बना लिया। संयुक्त राष्ट्र में नेतन्याहू ने इस हमले की तुलना 1967 और 1976 के संकटों से की।
उन्होंने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय इजरायल पर संघर्ष विराम के लिए दबाव बना रहा है, तब उन्हें अपने दिवंगत भाई की वही चेतावनी याद आती है। नेतन्याहू के अनुसार, हमास को आंशिक रूप से समाप्त करके इजरायल सुरक्षित नहीं रह सकता, क्योंकि संगठन के बच जाने पर वह भविष्य में दोबारा 7 अक्टूबर जैसी घटनाओं को अंजाम देगा। इसलिए हमास का पूर्ण सफाया करना कोई राजनीतिक हठ नहीं, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए उठाया गया अनिवार्य कदम है।
वैश्विक दबाव, विरोधी ताकतों और घरेलू राजनीति पर रुख
नेतन्याहू के इस कड़े रुख के कई कूटनीतिक और रणनीतिक आयाम हैं। सबसे पहले, यह अमेरिका, यूरोपीय राष्ट्रों और संयुक्त राष्ट्र को एक कड़ा संदेश है कि इजरायल किसी भी प्रकार के कूटनीतिक दबाव में आकर गाजा में चल रहे अभियान को बीच में नहीं रोकेगा। किसी भी समझौते की शर्तों पर झुकने से इनकार करते हुए उन्होंने सैन्य कार्रवाई जारी रखने की मंशा जताई है।
दूसरा संदेश हमास और हिजबुल्लाह जैसे क्षेत्रीय विरोधी समूहों के लिए है, जिसमें साफ किया गया है कि इजरायल पीछे हटने को तैयार नहीं है और अपनी संपूर्ण क्षमता से लड़ेगा। वहीं तीसरा पहलू इजरायल की घरेलू राजनीति से जुड़ा है। देश के भीतर नागरिकों और बंधकों के परिजनों द्वारा युद्ध समाप्त करने और समझौतों के माध्यम से बंधकों को वापस लाने का तीव्र दबाव है। ऐसे में अपने भाई के सर्वोच्च बलिदान का उल्लेख कर नेतन्याहू जनता को यह विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी प्राथमिकता राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता न करने की है। 57 वर्ष पूर्व रामला के बागानों में कही गई वह बात आज इजरायल की आधुनिक सैन्य कार्यप्रणाली की रीढ़ बन चुकी है।


















