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मौसम बदलते ही दुधारू मवेशियों के आहार में करें जरूरी फेरबदल, बढ़ेगी पैदावारझारखंड
19 सित॰ 2026, 8:13 pm (5 दिन पहले)· 0

मौसम बदलते ही दुधारू मवेशियों के आहार में करें जरूरी फेरबदल, बढ़ेगी पैदावार

मानसून के बाद तापमान में गिरावट के दौरान मवेशियों की खुराक में 60 फीसदी चारा, 40 फीसदी दाना और नियमित मिनरल मिक्सचर शामिल करने से दूध उत्पादन 12 लीटर तक पहुंच सकता है।

बरसात का दौर खत्म होते ही सितंबर और अक्टूबर के महीनों में मौसम करवट लेने लगता है। इस समय बारिश की विदाई के बाद तापमान गिरने लगता है और हल्की ठंडक दस्तक देने लगती है। वातावरण में आने वाला यह अचानक बदलाव सीधे तौर पर दुधारू मवेशियों के स्वास्थ्य और उनकी दूध देने की क्षमता को प्रभावित करता है। ऐसे संवेदनशील समय में पशुपालकों को मवेशियों के भोजन, चारे और उनके बाड़े के प्रबंधन पर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए, जिससे मौसमी बदलाव के कारण दूध की मात्रा में कोई गिरावट न दर्ज हो।

चारे और दाने के सही तालमेल से बनी रहेगी मवेशियों की ऊर्जा

तापमान में बदलाव के दौर में दुधारू गायों के दैनिक आहार में पोषक संतुलन बनाए रखना सबसे अहम कदम माना जाता है। कोडरमा गौशाला के पशु एक्सपर्ट रजनीश कुमार के अनुसार, पशुपालकों को ऋतु के हिसाब से पशु देखभाल के तौर-तरीकों को तुरंत ढाल लेना चाहिए। यदि खानपान सही रखा जाए तो पशु बीमारियों से बचे रहते हैं और उनकी दूध देने की क्षमता कमजोर नहीं पड़ती। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक दुधारू गाय के कुल दैनिक आहार में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा सूखे और हरे चारे का होना चाहिए, जबकि शेष 40 प्रतिशत हिस्सा विशेष फीड यानी दाने का निर्धारित किया जाना चाहिए। चारे और दाने का यह संतुलित अनुपात मवेशियों को जरूरी ऊर्जा और पोषण प्रदान करता है, जिसका सीधा सकारात्मक असर उनके शरीर और दुग्ध उत्पादन दोनों पर देखने को मिलता है।

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दाने में शामिल करें पौष्टिक घटक और नियमित मिनरल मिक्सचर

पशुओं के दैनिक दाने को तैयार करते समय गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है। रजनीश कुमार ने जानकारी दी कि दाने के मिश्रण में गेहूं का दर्रा और सरसों की खली जैसी पौष्टिक सामग्रियों को प्रमुखता से शामिल किया जा सकता है। खुराक तय करते समय पशुपालक को मवेशी की उम्र, उसका वजन, शारीरिक स्थिति, नस्ल और रोजाना दूध देने की क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए। सामान्य आहार के अलावा मवेशी के पोषण चक्र को पूरा करने के लिए मिनरल मिक्सचर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। नियमित चारे और दाने के साथ हर दुधारू पशु को प्रतिदिन लगभग 50 से 100 ग्राम मिनरल मिक्सचर अवश्य दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही पशु की जरूरत के मुताबिक कैल्शियम की खुराक सुनिश्चित करने से शरीर को सभी अनिवार्य खनिज और लवण सुलभ हो जाते हैं।

संतुलित खुराक से 10 लीटर वाला दूध उत्पादन पहुंचेगा 12 लीटर तक

जब दुधारू मवेशी को रोजमर्रा की खुराक के साथ जरूरी पोषक तत्व और खनिज दिए जाते हैं, तो उसका शारीरिक स्वास्थ्य मजबूत होता है और दूध उत्पादन का स्तर ऊंचा बना रहता है। रजनीश कुमार ने रेखांकित किया कि जो गाय सामान्य तौर पर 10 लीटर तक दूध देती है, उसे सही अनुपात में संतुलित आहार, 50 से 100 ग्राम मिनरल मिक्सचर और आवश्यक कैल्शियम लगातार देने से उत्पादन बढ़कर 11 से 12 लीटर तक पहुंच जाता है। इसके अतिरिक्त, मौसम में बदलाव के दौरान पशुओं को हमेशा स्वच्छ व ताजा पीने का पानी उपलब्ध कराना चाहिए। चारे की गुणवत्ता की निरंतर जांच करने के साथ-साथ पशुओं के रहने के स्थान को पूरी तरह सूखा और साफ-सुथरा रखना चाहिए ताकि संक्रमण का खतरा न पनपे।

सवाल-जवाब

मानसून के बाद दुधारू मवेशियों के आहार का सही अनुपात क्या होना चाहिए?
दुधारू गाय के कुल आहार में लगभग 60 प्रतिशत सूखा व हरा चारा और 40 प्रतिशत दाना या फीड शामिल होना चाहिए।
दुधारू पशु को प्रतिदिन कितना मिनरल मिक्सचर देना चाहिए?
सामान्य भोजन के साथ मवेशी को प्रतिदिन करीब 50 से 100 ग्राम मिनरल मिक्सचर और जरूरत अनुसार कैल्शियम देना चाहिए।
संतुलित आहार देने से दूध उत्पादन में कितनी वृद्धि हो सकती है?
उचित पोषण और मिनरल मिक्सचर की मदद से 10 लीटर दूध देने वाली गाय का उत्पादन बढ़कर 11 से 12 लीटर तक पहुंच सकता है।
पशुओं के दाने में कौन-सी पौष्टिक सामग्रियां मिलाई जा सकती हैं?
दाने के मिश्रण में गेहूं का दर्रा और सरसों की खली जैसी पौष्टिक चीजें शामिल की जा सकती हैं।
मौसम बदलने के दौरान बाड़े और पानी को लेकर क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
पशुपालकों को मवेशियों के लिए साफ पानी की व्यवस्था करनी चाहिए और उनके रहने के स्थान को पूरी तरह साफ-सुथरा रखना चाहिए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·5 दिन पहले

मौसम बदलते ही डेरी सेक्टर में उत्पादकता प्रबंधन का यह आर्थिक पहलू बेहद अहम है। 60:40 के अनुपात में चारे और दाने का यह संतुलन, साथ ही सही मिनरल मिक्सचर, पशुपालकों के इनपुट कॉस्ट को सीधे तौर पर मुनाफे में बदल सकता है। जब दूध का उत्पादन 10 से 12 लीटर तक बढ़ता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में दूध की आपूर्ति और किसानों की आय दोनों पर सीधा सकारात्मक वित्तीय प्रभाव पड़ता है। यह सूक्ष्म स्तर का कृषि-व्यवस्थीकरण ग्रामीण भारत में कमर्शियल डेरी फार्मिंग की रीढ़ को मजबूत करता है।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

मौसम बदलते ही दुधारू मवेशियों के आहार में 60 फीसदी चारा और 40 फीसदी दाना शामिल करने के साथ 50 से 100 ग्राम मिनरल मिक्सचर देने से दूध उत्पादन 10 से बढ़कर 12 लीटर तक पहुंच सकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि आधारित व्यवसायों के दृष्टिकोण से, यह वैज्ञानिक पशु प्रबंधन लागत को नियंत्रित रखते हुए किसानों और पशुपालकों की आय बढ़ाने में प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान देता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

रविकाश की बात को आगे बढ़ाते हुए, यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है क्योंकि यह पशुपालकों को बिना अतिरिक्त वित्तीय बोझ के अधिक लाभ दिला सकता है। इस तरह का सटीक आहार प्रबंधन डेयरी सेक्टर की उत्पादकता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जिससे किसानों की आय में सुधार की संभावना मजबूत होती है।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में बदलते मौसम के दौरान पशुपालकों के लिए यह व्यावहारिक मार्गदर्शन बेहद अहम है। प्रदेश के कृषि और डेयरी सेक्टर में इस तरह के पोषण प्रबंधन से किसानों की आय बढ़ाने में सीधी मदद मिलती है। खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए पशुपालन से जुड़े ऐसे तकनीकी सुझावों को जमीनी स्तर तक पहुंचाना प्रशासन और पशुपालन विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए, जिससे छोटे किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिल सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से देखें तो ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन की सुरक्षा और पशुओं की चोरी से जुड़े मामलों का सीधा संबंध किसानों की आर्थिक स्थिरता से होता है। जब मौसम बदलने पर कुपोषण या बीमारियों के कारण दुधारू मवेशियों की सेहत बिगड़ती है, तो कई बार हताश पशुपालक कर्ज के जाल में फंस जाते हैं या विवादों की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसे में वैज्ञानिक और संतुलित पशु आहार का यह तकनीकी ज्ञान न केवल मवेशियों की उत्पादकता को सुरक्षित रखता है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में वित्तीय संकट से उपजे अपराधों और तनाव को रोकने में भी एक अप्रत्यक्ष सुरक्षा कवच का काम करता है।

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