राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान कथित पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शनों के सिलसिले में दर्ज प्राथमिकियों (FIR) से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत की पीठ के प्रमुख CJI सूर्यकांत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को एक सुव्यवस्थित और स्पष्ट सूची सौंपने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि बिना किसी ठोस आधार और मामलों के वर्गीकरण के कोई भी न्यायिक आदेश जारी करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
होमवर्क में कमी पर शीर्ष अदालत ने जताया ऐतराज
मामले की सुनवाई करते हुए CJI सूर्यकांत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार की ओर से प्राथमिकियों की पहचान का काम पहले ही पूरा कर लिया जाना चाहिए था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र को कम से कम इतना बुनियादी अभ्यास करना चाहिए था कि किन मामलों को आगे चलाया जाना आवश्यक है और किन्हें समाप्त किया जा सकता है। पीठ ने जोर देकर कहा कि जब तक सरकार उन प्राथमिकियों का स्पष्ट ब्योरा पेश नहीं करती जिन पर कार्रवाई जारी रखनी है, तब तक अदालत के लिए कोई भी आदेश पारित करना केवल एक सैद्धांतिक कवायद बनकर रह जाएगा।
सॉलिसिटर जनरल ने अज्ञात आरोपियों से जुड़ी चुनौतियां गिनाईं
सुप्रीम कोर्ट के सवालों का जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनों के दौरान दर्ज की गई कई प्राथमिकियां अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ हैं। केवल प्राथमिकियों की संख्या या सूची देख लेने मात्र से यह तय कर पाना कठिन है कि कौन से लोग केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थे और किन तत्वों ने प्रदर्शनकारियों की आड़ लेकर गंभीर आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया। सॉलिसिटर जनरल ने शीर्ष अदालत को आश्वस्त किया कि वे दर्ज सभी मामलों की गहन जांच करेंगे और जल्द ही एक विश्लेषणात्मक सूची तैयार करके अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
अनुच्छेद 142 के तहत राहत और गंभीर मामलों में सख्ती
प्रकरण में पूर्व की कार्यवाहियों का उल्लेख करते हुए अदालत ने पुनः संकेत दिया कि प्रदर्शनों में शामिल निर्दोष छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियों को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए रद्द किया जा सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि जिन लोगों के खिलाफ गंभीर आपराधिक कृत्यों के आरोप हैं, उन्हें छात्रों के समान रियायत नहीं दी जाएगी। अदालत ऐसे असामाजिक तत्वों और सामान्य छात्र प्रदर्शनकारियों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचकर ही अंतिम निर्णय सुनाएगी।



















