गुवाहाटी में असम सरकार और स्पाइस बोर्ड इंडिया के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य राज्य के मसाला क्षेत्र को मजबूत करना और इसके दायरे को व्यापक बनाना है। इस चर्चा के दौरान उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और बाजार के विकास तक कई अहम पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया। अधिकारियों का मानना है कि राज्य में कृषि विविधीकरण और उच्च मूल्य वाली खेती की अपार संभावनाएं मौजूद हैं, जिनका सही दोहन किया जाना बाकी है।
मसाला उत्पादन के आंकड़े और मौजूदा स्थिति
असम में वर्तमान में एक लाख आठ हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर मसालों की खेती की जाती है। वर्ष 2024-25 के दौरान राज्य में चार लाख छह हजार मीट्रिक टन से अधिक मसालों का उत्पादन दर्ज किया गया था। इस मजबूत आधार को देखते हुए सरकार अब इसे और आगे बढ़ाने की योजना बना रही है। असम पहले से ही अदरक, हल्दी, मिर्च, काली मिर्च, लहसुन और धनिया जैसी प्रमुख फसलों का एक बड़ा उत्पादक रहा है, जिससे किसानों के लिए आय बढ़ाने के नए रास्ते खुलते हैं।
संभावित समझौता ज्ञापन और तकनीकी सहयोग
असम के मुख्य सचिव रवि कोटा ने बताया कि दोनों पक्षों के बीच एक औपचारिक समझौता ज्ञापन यानी एमओयू हस्ताक्षर करने की संभावनाओं पर भी बातचीत हुई। इस संभावित समझौते का मकसद तकनीकी सहयोग के लिए एक स्थाई ढांचा तैयार करना है। इसके तहत उपयुक्त फसलों और क्षेत्रों की पहचान करने, किसानों की क्षमता निर्माण करने, प्रोसेसिंग इकाइयों को बढ़ावा देने और तैयार उत्पादों के लिए बेहतर बाजार विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
क्षेत्र-विशेष रणनीतियाँ और बड़े इलायची की खेती
प्रस्तावित कार्ययोजना के तहत राज्य के चुनिंदा मसालों के लिए क्षेत्र-विशेष की रणनीतियाँ बनाई जाएंगी, जिससे यह तय किया जा सके कि कौन सा क्षेत्र किस फसल की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है। इसके लिए लक्षित उत्पादन क्लस्टर भी विकसित किए जाएंगे। इसके अलावा पूर्वोत्तर क्षेत्र के पिछले अनुभवों और पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट को ध्यान में रखते हुए असम के अनुकूल हिस्सों में बड़ी इलायची की खेती की संभावनाओं पर भी गंभीरता से चर्चा की गई है।
किसानों की आय बढ़ाने और विविधीकरण पर जोर
सरकार का व्यापक उद्देश्य केवल प्राथमिक उत्पादन तक सीमित न रहकर मजबूत वैल्यू चेन तैयार करना और किसानों को उनकी उपज का बेहतर रिटर्न दिलाना है। इस पहल से असम में कृषि क्षेत्र में विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा, नए उद्यमियों के लिए अवसर पैदा होंगे और उच्च मूल्य वाली कृषि को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा मिल सकेगी।



















