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पटना की 95 साल पुरानी ऐतिहासिक कोठी: बिना प्लास्टर के आज भी अडिग है अंग्रेजों के जमाने का यह किलाबिहार
11 जुल॰ 2026, 11:57 am (31 दिन पहले)· 4

पटना की 95 साल पुरानी ऐतिहासिक कोठी: बिना प्लास्टर के आज भी अडिग है अंग्रेजों के जमाने का यह किला

पटना के ओल्ड कदमकुआं में स्थित एक ऐतिहासिक कोठी आज भी अपनी मजबूती के लिए जानी जाती है, जिसका निर्माण 1930 के दशक में हुआ था। नंदी परिवार की तीसरी पीढ़ी द्वारा संजोई गई यह इमारत 1934 के भूकंप और 1975 की भीषण बाढ़ का सामना करने के बावजूद पूरी तरह सुरक्षित है।

बिहार की राजधानी पटना के ओल्ड कदमकुआं इलाके में स्थित पार्क रोड पर आज भी ब्रिटिश शासनकाल की कई भव्य और आलीशान कोठियां मौजूद हैं। इन्हीं में से एक है नंदी परिवार का पुश्तैनी मकान, जिसे बाहर से देखने पर कोई भी इसे किसी किले का भ्रम समझ सकता है। यह भव्य भवन लगभग 95 साल पुराना है और इसका निर्माण काल 1930 से 1932 के बीच का माना जाता है। अपनी मजबूती का प्रमाण देते हुए, इस इमारत ने साल 1934 के विनाशकारी बिहार-नेपाल भूकंप की त्रासदी को झेला है। इसके अलावा, 1975 की उस भयावह बाढ़ का भी यह गवाह रहा है, जब इस क्षेत्र में पानी करीब ढाई से तीन फीट की ऊंचाई तक भर गया था। इन तमाम प्राकृतिक आपदाओं को पार करने के बावजूद, यह इमारत आज भी पूरी तरह से सुरक्षित है और अपनी ऐतिहासिक भव्यता को बरकरार रखे हुए है।

वर्तमान में नंदी परिवार की देखरेख

वर्तमान में नंदी परिवार की तीसरी पीढ़ी इस ऐतिहासिक विरासत को संभाल रही है। कल्याण नंदी और रंजय नंदी अपने परिजनों के साथ इसी मकान में निवास करते हैं। एक विशेष बातचीत में उन्होंने इस घर के निर्माण इतिहास, इसकी अद्भुत वास्तुकला और इससे जुड़ी अनेक अनकही कहानियों को साझा किया है। उनके अनुसार, यह घर सिर्फ एक ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि उनके परिवार के गौरवशाली इतिहास का एक अभिन्न अंग है।

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बिना प्लास्टर और टिपकारी तकनीक का कमाल

रंजय नंदी ने बताया कि इस कोठी का निर्माण पूरी तरह से ब्रिटिश वास्तुकला पर आधारित है। भवन निर्माण में एक विशेष तकनीक का प्रयोग किया गया है जिसे 'टिपकारी' कहा जाता है। उस समय के रेलवे स्टेशनों और सरकारी इमारतों के निर्माण में अक्सर ऐसी ही मजबूत तकनीकी कार्यशैली अपनाई जाती थी। इस मकान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बाहर से कहीं भी सीमेंट या प्लास्टर का उपयोग नहीं किया गया है, जिससे इसकी मूल लाल ईंटें आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। दो मंजिला इस इमारत में कुल छह कमरे हैं, जिनमें हर कमरे को तीन दरवाजों और एक बड़ी खिड़की के साथ तैयार किया गया है, ताकि हवा और रोशनी का प्रवाह बना रहे।

प्राकृतिक वास्तुकला की एक मिसाल

पुराने समय को याद करते हुए रंजय नंदी कहते हैं कि पहले इस मकान के चारों ओर बड़े-बड़े पेड़ और हरियाली हुआ करती थी, जिससे घर हमेशा शीतल और हवादार रहता था। यद्यपि अब आसपास शहरीकरण के चलते कई कंक्रीट के मकान बन गए हैं, फिर भी कोठी के भीतर प्राकृतिक रोशनी और ताजी हवा की कोई कमी नहीं है। इस निर्माण में जिन ईंटों का उपयोग किया गया है, वे आज की ईंटों से आकार में काफी बड़ी हैं। यह पूरा मकान लगभग साढ़े तीन से पौने चार कट्ठा जमीन पर फैला हुआ है, और घर के सामने आज भी काफी खुला स्थान सुरक्षित है।

स्थापत्य कला और मेहराबदार डिजाइन

इस ऐतिहासिक भवन की वास्तुकला इसे शहर की अन्य इमारतों से अलग खड़ा करती है। लाल ईंटों से बनी यह दो मंजिला संरचना अपनी किलेनुमा बनावट के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। भवन के दोनों कोनों पर निर्मित गोलाकार बुर्ज (टावर) इसे एक शाही लुक देते हैं। मुख्य द्वार और खिड़कियां मेहराबदार हैं, जिनके ऊपर की गई टिपकारी का काम तत्कालीन कारीगरों की कलात्मक कुशलता का अद्भुत नमूना है। इसके अलावा, खिड़कियों के चारों ओर उभरी हुई ईंटों की कॉर्निस और सजावटी पट्टियां औपनिवेशिक काल की वास्तुकला की याद ताजा करती हैं। बीच में खुला आंगन, चारों तरफ बरामदे, घुमावदार सीढ़ियां और ऊंची छतों वाले कमरे इस मकान को पारंपरिक बंगला शैली और औपनिवेशिक वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण बनाते हैं।

दादाजी की दूरदर्शिता और निर्माण का इतिहास

कल्याण नंदी ने बताया कि इस मकान के निर्माण का श्रेय उनके दादाजी स्व. सिद्धेश्वर नंदी को जाता है, जो पेशे से एक सिविल इंजीनियर थे और उस समय डेहरी-ऑन-सोन में कार्यरत थे। 1928-29 के दौरान जब अंग्रेज पटना का विस्तार कर रहे थे, तब स्कूल, कॉलेज और कार्यालयों के साथ-साथ प्रतिष्ठित लोगों के लिए जमीन आवंटित की जा रही थी। उसी दौर में 1929 में सिद्धेश्वर नंदी को ओल्ड कदमकुआं के पार्क रोड में जमीन मिली। ओल्ड कदमकुआं का यह इलाका उस समय पटना के सबसे पॉश इलाकों में शुमार था, जहाँ डॉक्टर, वकील और इंजीनियर जैसे बुद्धिजीवी लोग रहते थे।

आपदाओं के बावजूद अडिग

दोनों भाइयों ने साझा किया कि उनकी दादी बताया करती थीं कि मकान बनने के एक-दो साल के भीतर ही बिहार में एक भीषण भूकंप आया था, लेकिन उस समय भी मकान पर कोई आंच नहीं आई। 1975 की सोन नदी की बाढ़ में जब घर के भीतर तक डेढ़ फीट पानी भर गया था, तब भी यह इमारत पूरी मजबूती के साथ खड़ी रही। आज 95 साल बाद भी घर में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। दोनों भाइयों ने केवल समय-समय पर इसकी मामूली मरम्मत करवाई है, क्योंकि वे इसे अपने दादाजी की एक अमूल्य विरासत मानते हैं जिसे सहेजना उनका दायित्व है।

सवाल-जवाब

यह ऐतिहासिक मकान कितना पुराना है?
यह मकान लगभग 95 साल पुराना है, जिसका निर्माण 1930 से 1932 के बीच हुआ था।
इस मकान की वास्तुकला की मुख्य विशेषता क्या है?
इस मकान की मुख्य विशेषता इसकी 'टिपकारी' तकनीक है, जिसमें बाहर से कोई प्लास्टर नहीं किया गया है और इसकी लाल ईंटें मजबूती का प्रतीक हैं।
क्या इस घर ने कभी किसी आपदा का सामना किया है?
हां, यह घर 1934 के विनाशकारी बिहार-नेपाल भूकंप और 1975 की भीषण बाढ़ का सामना करने के बाद भी पूरी तरह सुरक्षित खड़ा है।
इस घर का निर्माण किसने करवाया था?
इस मकान का निर्माण नंदी परिवार के दादाजी, स्व. सिद्धेश्वर नंदी ने करवाया था, जो पेशे से एक सिविल इंजीनियर थे।
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