देश भर में फर्जी और नशीली दवाओं के अवैध कारोबार तथा दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए एक व्यापक प्रशासनिक रणनीति तैयार की गई है। केंद्र सरकार के दवा सलाहकार पैनल ने नारकोटिक एवं साइकोट्रॉपिक सामग्री वाली दवाओं पर नियामकीय निगरानी को बेहद सख्त करने का सुझाव दिया है। यह पूरी कवायद दवा नियंत्रण से जुड़े उस विजन दस्तावेज का हिस्सा है, जो वर्ष 2026 से 2029 तक की अवधि के लिए तय किया गया है। इस व्यवस्था को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए केंद्र ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से सक्रिय सहयोग की अपील की है।
नारको कोऑर्डिनेशन सेंटर की बैठक और विजन दस्तावेज
यह नीतिगत खाका आने वाले वर्षों में मादक और मनोप्रभावी दवाओं के नियमन की दिशा तय करेगा। इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाले नशीली दवा निरोधक तंत्र, नारको कोऑर्डिनेशन सेंटर की 10वीं शीर्ष बैठक के दौरान औपचारिक रूप से पेश किया गया था। इस तंत्र की मुख्य जिम्मेदारी अलग-अलग सुरक्षा, प्रशासनिक और नियामकीय एजेंसियों के बीच तालमेल बैठाना है ताकि नशीले पदार्थों के अवैध संचलन पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सके।
सीडीएससीओ को मार्च 2027 तक का तय लक्ष्य
देश के शीर्ष औषधि विनियामक सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन को एक निश्चित समय सीमा के भीतर काम पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। योजना के अनुसार, मार्च 2027 तक औषधि विनियामक को नारकोटिक दवाओं तथा दिमाग को प्रभावित करने वाले फार्मास्यूटिकल मिश्रणों के अवैध डायवर्जन से जुड़ी हर नियामकीय कमी और विसंगति को समाप्त करना होगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए समिति ने एक भरोसेमंद राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने की जोरदार वकालत की है। इस डेटाबेस में ऐसी विशेष दवाओं के उत्पादन, बिक्री, भंडारण, आधिकारिक निरीक्षण और की गई दंडात्मक कानूनी कार्रवाइयों का पूरा ब्योरा दर्ज रहेगा। सलाहकार समिति ने विनियामक को निर्देश दिया है कि वह वर्तमान में प्रभावी सभी सरकारी आदेशों, राज्यों के नियंत्रण नियमों और मानक संचालन प्रक्रियाओं को एकत्रित करके एक ठोस कार्ययोजना तैयार करे।
डिजिटल ट्रैकिंग और राज्यों की मासिक रिपोर्ट
नियमों को पुख्ता करने के मकसद से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए हर महीने विस्तृत रिपोर्ट भेजना अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा गया है। इस मासिक रिपोर्ट में यह स्पष्ट जानकारी देनी होगी कि संबंधित राज्य में कितने लाइसेंस स्वीकृत किए गए, नारकोटिक दवाओं की कुल कितनी मात्रा संभाली गई, कितने परिसरों की भौतिक जांच हुई और नियमों के उल्लंघन पर क्या कदम उठाए गए। इस रिपोर्टिंग का प्रारूप राज्यों के औषधि नियंत्रकों के साथ विचार-विमर्श करके तय किया जाएगा।
कमेटी ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि यह समूची प्रक्रिया एक एकीकृत साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संचालित होनी चाहिए, जिससे सूचनाओं का नियमित संकलन और सटीक विश्लेषण संभव हो सके। इसके लिए सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स द्वारा पहले से संचालित ऑनलाइन पोर्टल की उपयोगिता परखने की सलाह भी दी गई है। यदि यह मॉडल पूरी तरह लागू होता है, तो निर्माण इकाई से लेकर खुदरा मेडिकल स्टोर तक दवा की आपूर्ति शृंखला पर नज़र रखना संभव हो जाएगा। हालांकि, यह सभी सिफारिशें तभी कानूनी रूप से लागू हो सकेंगी जब औषधि विनियामक के प्रमुख ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया द्वारा इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति प्रदान की जाएगी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सुझावों पर राज्यों से मंथन
फर्जी और घटिया दवाओं के खतरे से निपटने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 25 फरवरी को एक खुली परिचर्चा आयोजित की थी, जिसके बाद कई अहम सुझाव सलाहकार समिति को भेजे गए थे। समिति ने समीक्षा में पाया कि आयोग की कुछ सिफारिशों पर पहले से ही अमल किया जा रहा है, जबकि शेष बिंदुओं को लागू करने के लिए विभिन्न एजेंसियों के समन्वित प्रयास और राज्यों से मिलने वाले सुझाव बेहद जरूरी हैं। इस व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए ड्रग रेगुलेटर्स, पुलिस बल, परीक्षण प्रयोगशालाओं, सरकारी अभियोजन पक्ष और फॉरेंसिक संस्थानों के बीच व्यापक तालमेल अनिवार्य माना गया है।
इसी पृष्ठभूमि में यह तय किया गया है कि मानवाधिकार आयोग की सिफारिशें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजी जाएं। उनसे वर्तमान में लागू सुरक्षा उपायों का विवरण, उनकी राय और राष्ट्रीय स्तर के तंत्र पर व्यावहारिक सुझाव मांगे जाएंगे। इसके पश्चात एक संयुक्त मसौदा तैयार होगा और कुछ चुनिंदा राज्यों का एक छोटा दल आयोग के समक्ष औपचारिक उत्तर और आगे की रणनीति की विस्तृत योजना पेश करेगा।



















