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सर्वोच्च अदालत ने द केरल स्टोरी विवाद पर समाप्त की कानूनी कार्यवाही, सीबीएफसी के प्रमाणन अधिकार पर खुला रहेगा सवालभारत
22 अग॰ 2026, 7:33 am (2 घंटे पहले)· 3

सर्वोच्च अदालत ने द केरल स्टोरी विवाद पर समाप्त की कानूनी कार्यवाही, सीबीएफसी के प्रमाणन अधिकार पर खुला रहेगा सवाल

सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 की विवादित फिल्म द केरल स्टोरी से संबंधित याचिकाओं का निपटारा कर दिया है। हालांकि, सीबीएफसी द्वारा फिल्मों के प्रमाणन को अदालत में चुनौती देने से जुड़े बुनियादी कानूनी पहलू को भविष्य के लिए खुला रखा गया है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को साल 2023 की चर्चित और विवादित फिल्म द केरल स्टोरी से जुड़ी सभी याचिकाओं पर जारी कानूनी कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद कर दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह निर्णय सुनाया, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। हालांकि अदालत ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा जारी किए जाने वाले फिल्म प्रमाणपत्रों को चुनौती देने से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को भविष्य की सुनवाई के लिए खुला रखा है।

शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की इस विशेष पीठ ने कई पुराने मामलों का निपटारा किया। इनमें से कई याचिकाएं कोविड-19 महामारी के समय दाखिल की गई थीं, जबकि कई अन्य मामले समय बीतने के कारण निष्प्रभावी हो चुके थे। इसी कड़ी में द केरल स्टोरी को सीबीएफसी द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र को रद्द करने की मांग वाली दो याचिकाओं को भी अदालत ने निष्प्रभावी मानते हुए बंद कर दिया, क्योंकि फिल्म पहले ही सिनेमाघरों में प्रदर्शित की जा चुकी है।

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फिल्म प्रमाणन और पीड़ित पक्ष के अधिकारों पर विधिक बहस

अदालत में याचिकाकर्ता कुर्बान अली और बी. आर. अरविंदाक्षन की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता निजाम पाशा ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यद्यपि फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है, फिर भी उनके मुवक्किलों द्वारा उठाए गए संवैधानिक और कानूनी मुद्दे बेहद गंभीर हैं तथा उन पर अदालत का ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि यह फिल्म वर्तमान में ओटीटी मंचों पर भी दर्शकों के लिए उपलब्ध है, जिससे इससे जुड़े मुद्दे अब भी प्रासंगिक बने हुए हैं।

अधिवक्ता निजाम पाशा ने केरल उच्च न्यायालय के एक पुराने आदेश का हवाला दिया। केरल उच्च न्यायालय ने फिल्म से संबंधित रिट याचिका का निपटारा करते हुए यह व्यवस्था दी थी कि सीबीएफसी द्वारा किसी फिल्म को दिए गए प्रमाण पत्र के खिलाफ कोई आम नागरिक याचिका दाखिल नहीं कर सकता। पाशा ने तर्क दिया कि कानून के तहत सीबीएफसी के फैसले के खिलाफ अपील का वैधानिक अधिकार केवल फिल्म निर्माताओं को प्राप्त है। फिल्म की सामग्री से आहत या प्रभावित होने वाले अन्य नागरिकों के लिए कोई सीधा वैधानिक तंत्र मौजूद नहीं है, जिसके कारण उन्हें उच्च न्यायालय या सर्वोच्च अदालत में रिट याचिका का सहारा लेना पड़ता है।

इस पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि सीबीएफसी प्रमाणन को चुनौती देने के अधिकार से जुड़ा यह विधिक प्रश्न भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में विचार के लिए खुला रहेगा। सुनवाई के दौरान पाशा ने फिल्मों के माध्यम से कथित रूप से घृणास्पद भाषण को बढ़ावा देने के मामलों पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तय करने की मांग की। इस पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता सामान्य दिशानिर्देश चाहते हैं, तो उन्हें इसके लिए एक अलग और व्यापक रिट याचिका दाखिल करनी चाहिए।

निर्माताओं की याचिका की वापसी और पश्चिम बंगाल प्रतिबंध का इतिहास

मामले की सुनवाई के दौरान फिल्म के निर्माण संस्थान सनशाइन पिक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह द्वारा दायर तीसरी याचिका को वापस ले लिया गया। यह याचिका तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा राज्य में द केरल स्टोरी के प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ दाखिल की गई थी।

गौरतलब है कि मई 2023 में उच्चतम न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश जारी कर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा फिल्म पर लगाए गए इस प्रतिबंध पर रोक लगा दी थी। अधिवक्ता पाशा ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पहले केरल उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट आए थे, जिसके बाद उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका समाप्त कर दी थी कि मामला पहले से ही सर्वोच्च अदालत के समक्ष विचाराधीन है।

द केरल स्टोरी की पृष्ठभूमि और अन्य अपडेट

वर्ष 2023 में रिलीज हुई फिल्म द केरल स्टोरी की बात करें तो इसका निर्देशन सुदीप्तो सेन ने किया था और इसके निर्माता विपुल अमृतलाल शाह थे। यह फिल्म अपनी रिलीज के समय से ही भारी विवादों में घिर गई थी। फिल्म की कहानी केरल में कथित तौर पर हिंदू महिलाओं का धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) जैसे आतंकवादी संगठन में शामिल किए जाने के दावों पर केंद्रित थी।

दूसरी तरफ, मनोरंजन जगत से जुड़ी एक अन्य खबर में अभिनेता अर्जुन रामपाल ने अपनी प्रेमिका गैब्रिएला से अदालत में विवाह कर लिया है। अर्जुन रामपाल पिछले 6 वर्षों में दो बार पिता बने हैं, जबकि उनकी पहली पत्नी से भी उनके दो बच्चे हैं।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने 'द केरल स्टोरी' से जुड़ी याचिकाओं पर क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म से जुड़ी याचिकाओं पर कानूनी कार्यवाही समाप्त कर दी क्योंकि फिल्म पहले ही प्रदर्शित हो चुकी है, लेकिन सेंसर बोर्ड प्रमाणन को चुनौती देने के अधिकार से जुड़े कानूनी सवाल को खुला रखा।
इस मामले की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ में कौन शामिल थे?
इस पीठ की अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने की, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने सीबीएफसी प्रमाणन पर क्या तर्क दिए?
अधिवक्ता निजाम पाशा ने दलील दी कि आम नागरिकों के पास सीबीएफसी प्रमाण पत्र के खिलाफ कोई वैधानिक अधिकार नहीं है, इसलिए वे रिट याचिका के माध्यम से अदालत का रुख करते हैं।
फिल्म निर्माताओं ने अपनी याचिका क्यों वापस ली?
निर्माता विपुल अमृतलाल शाह और सनशाइन पिक्चर्स ने तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार के प्रतिबंध के खिलाफ दाखिल याचिका वापस ले ली, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट मई 2023 में ही प्रतिबंध पर रोक लगा चुका था।
'द केरल स्टोरी' के निर्देशक और निर्माता कौन हैं?
फिल्म 'द केरल स्टोरी' का निर्देशन सुदीप्तो सेन ने किया है और इसके निर्माता विपुल अमृतलाल शाह हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·37 मिनट पहले

यह निर्णय दिखाता है कि फिल्म रिलीज होने के बाद विधिक रूप से मामले निष्प्रभावी हो सकते हैं, लेकिन सीबीएफसी के प्रमाणन को चुनौती देने वाले तीसरे पक्ष के अधिकारों का प्रश्न अब भी अनसुलझा है। भविष्य में इस कानूनी ग्रे-एरिया पर बड़ी बेंच का स्पष्ट रुख आना तय है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनहित के संतुलन पर असर पड़ेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·36 मिनट पहले

करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि सेंसर बोर्ड के प्रमाणपत्र के खिलाफ तीसरे पक्ष के कानूनी उपायों का अभाव नागरिकों को सीधे उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय के संवैधानिक दरवाज़े खटखटाने के लिए विवश करता है। जब तक सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत इस विधिक रिक्ति को नहीं भरा जाता, तब तक रचनात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन साधने की जिम्मेदारी न्यायपालिका पर बनी रहेगी, जिससे भविष्य की विधायी और न्यायिक बहसों की दिशा तय होगी।

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