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उत्तर प्रदेश के बहराइच में ब्रिटिश रंगभेद के जवाब में बना पीतांबर टावर हवा महल आज भी याद दिलाता है स्वाभिमान की गाथाउत्तर प्रदेश
14 अग॰ 2026, 9:13 am (30 दिन पहले)· 0

उत्तर प्रदेश के बहराइच में ब्रिटिश रंगभेद के जवाब में बना पीतांबर टावर हवा महल आज भी याद दिलाता है स्वाभिमान की गाथा

1930 के दशक में अंग्रेजों की नस्ली नीति और स्टेशन क्लब में भारतीयों के प्रवेश पर पाबंदी के जवाब में भारतीय वकीलों ने बहराइच में भव्य मकबूल क्लब का निर्माण कराया था, जो आज जीर्णोद्धार की आस लगाए खड़ा है।

उत्तर प्रदेश के बहराइच शहर के मध्य भाग में स्थित पीतांबर टावर हवा महल केवल ईंट और गारे से निर्मित कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि यह ब्रिटिश शासन काल के दौरान भारतीय स्वाभिमान और प्रतिरोध की एक जीवंत दास्तान बयां करता है। मकबूल क्लब के नाम से पहचाने जाने वाली यह लगभग एक शताब्दी पुरानी ऐतिहासिक इमारत उस दौर की याद दिलाती है जब स्थानीय नागरिकों और वकीलों ने औपनिवेशिक हुकूमत के भेदभाव का जवाब अपनी आत्मनिर्भरता और एकजुटता से दिया था। आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यह ऐतिहासिक धरोहर एक बार फिर अपने अतीत के गौरव और वर्तमान संरक्षण की आवश्यकताओं को लेकर चर्चा में है।

अंग्रेजी हुकूमत के नस्ली भेदभाव का मुंहतोड़ जवाब

इस ऐतिहासिक स्थल के निर्माण की पृष्ठभूमि 1930 के दशक की घटनाओं से जुड़ी हुई है। उस समय बहराइच में ब्रिटिश अधिकारियों के खेलकूद और मनोरंजन गतिविधियों के संचालन के लिए स्टेशन क्लब की स्थापना की गई थी। हालांकि, औपनिवेशिक मानसिकता के तहत इस क्लब के बाहर स्पष्ट नियम लागू करके भारतीय वकीलों और आम नागरिकों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। इस रंगभेद और सार्वजनिक अपमान को स्वीकार करने के बजाय स्थानीय भारतीय अधिवक्ताओं ने आत्मसम्मान का मार्ग चुना। उन्होंने निर्णय लिया कि वे अंग्रेजों के सामने गिड़गिड़ाने के बजाय एक ऐसे समानांतर क्लब का निर्माण करेंगे जो सुंदरता और स्थापत्य कला में ब्रिटिश स्टेशन क्लब से भी श्रेष्ठ सिद्ध होगा।

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रियासतों का वित्तीय सहयोग और 1933 में क्लब की स्थापना

भारतीय वकीलों की इस महत्वाकांक्षी योजना को साकार करने में क्षेत्र की प्रमुख रियासतों ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इस निर्माण कार्य में नानपारा के राजा तथा भिनगा के राजा का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। भिनगा के राजा ने भव्य इमारत के निर्माण के लिए आवश्यक वित्तीय साधन और अन्य संसाधन उपलब्ध कराए। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1933 में यह आकर्षक टावर हवा महल बनकर पूरी तरह तैयार हो गया। उद्घाटन के पश्चात इस परिसर का नाम मकबूल क्लब रखा गया। यहां भारतीय अधिवक्ता पूर्ण सम्मान के साथ बैडमिंटन, टेबल टेनिस और अन्य इनडोर खेल खेला करते थे। इसके अतिरिक्त, यह स्थान देश के स्वतंत्रता आंदोलन की गुप्त रणनीतियों और भावी योजनाओं पर चर्चा करने का एक प्रमुख केंद्र भी बन गया।

पारंपरिक निर्माण सामग्री का जादू और नेतृत्व की परंपरा

आधुनिक दौर की इमारतें जहां सीमेंट के उपयोग के बावजूद कुछ ही दशकों में कमजोर पड़ने लगती हैं, वहीं लगभग 100 वर्ष पुरानी यह इमारत आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़ी है। इस टिकाऊपन का मुख्य कारण इसका अनोखा और पारंपरिक निर्माण मिश्रण है। इस संरचना को खड़ा करने में सीमेंट का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया गया, बल्कि चूना, बेल का शरबत, राख और मौरंग के विशेष मिश्रण से इसे तैयार किया गया था। कुल 12 कमरों, एक विशाल केंद्रीय हॉल, एक ऊंचे टावर और चारों ओर फैले हरे-भरे वृक्षों से सुसज्जित यह परिसर अपनी स्थापत्य दृढ़ता के लिए जाना जाता है। क्लब के प्रबंधकीय नेतृत्व की बात करें तो इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ वकील भंडारी ने जिम्मेदारी संभाली थी। उनके बाद बल्लू राम शुक्ला, बच्चन सिंह, कालिया तथा वर्तमान समय में देवेंद्र सिंह जैसी प्रमुख हस्तियों ने इस संस्था के अध्यक्ष पद की कमान संभाली है।

1971 से एक ही परिवार की सेवा और संरक्षण की तत्काल आवश्यकता

पीतांबर टावर हवा महल की विरासत से न केवल स्वतंत्रता संग्राम की यादें जुड़ी हैं, बल्कि इसमें एक परिवार के समर्पण की कहानी भी शामिल है। सन 1971 से लगातार एक ही कर्मचारी अनीस अहमद और उनका परिवार अपनी पुरानी पीढ़ियों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस परिसर की देखरेख का काम कर रहे हैं। बिना किसी रुकावट के यह परिवार इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने में जुटा हुआ है। हालांकि, 1933 से अब तक अनेक ऐतिहासिक बदलावों का साक्षी रहा यह टावर वर्तमान समय में प्रशासनिक उपेक्षा का सामना कर रहा है। यद्यपि इसका मूल ढांचा आज भी सुरक्षित है, लेकिन समय रहते उचित जीर्णोद्धार न होने की स्थिति में बहराइच अपनी इस अनमोल विरासत को खो सकता है। 15 अगस्त के पावन अवसर पर इस स्वाभिमानी स्मारक को उसका उचित सम्मान और संरक्षण प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है।

सवाल-जवाब

बहराइच के पीतांबर टावर हवा महल (मकबूल क्लब) का निर्माण क्यों कराया गया था?
1930 के दशक में अंग्रेजों ने बहराइच के स्टेशन क्लब में भारतीय वकीलों और नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। इस रंगभेद के जवाब में भारतीय वकीलों ने अपना खुद का भव्य क्लब बनाया।
मकबूल क्लब का निर्माण किस वर्ष हुआ और इसमें किसने सहायता की?
मकबूल क्लब का निर्माण 1933 में पूरा हुआ। इसके निर्माण में भिनगा के राजा और नानपारा के राजा ने वित्तीय तथा अन्य महत्वपूर्ण सहयोग दिया था।
बिना सीमेंट के बनी यह इमारत लगभग 100 सालों से मजबूत कैसे खड़ी है?
इस इमारत के निर्माण में सीमेंट की जगह चूना, बेल का शरबत, राख और मौरंग के विशेष पारंपरिक मिश्रण का इस्तेमाल किया गया था, जिससे यह आज भी मजबूत है।
मकबूल क्लब के प्रथम अध्यक्ष कौन थे और वर्तमान में इसकी कमान किसके पास है?
इसके पहले अध्यक्ष वकील भंडारी बने थे। बाद में बल्लू राम शुक्ला, बच्चन सिंह और कालिया ने नेतृत्व किया, जबकि वर्तमान में देवेंद्र सिंह इसके अध्यक्ष हैं।
1971 से इस इमारत की देखभाल कौन कर रहा है?
सन 1971 से लगातार कर्मचारी अनीस अहमद और उनका परिवार अपने पूर्वजों की परंपरा को निभाते हुए इस इमारत की देखरेख कर रहे हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·29 दिन पहले

औपनिवेशिक भेदभाव के विरुद्ध स्वदेशी प्रतिरोध और पारंपरिक निर्माण शैली का यह ऐतिहासिक उदाहरण इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता किस प्रकार समय की कसौटी पर खरी उतरती है। ऐसे वास्तुशिल्प का संरक्षण न केवल हमारे गौरवशाली अतीत को जीवंत रखता है, बल्कि यह भविष्य की नीतियों के लिए टिकाऊ निर्माण और ऐतिहासिक धरोहरों के प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक व सामाजिक संदेश भी देता है कि स्थानीय संपदा की रक्षा हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

Arjun Mehta@arjun-mehta·29 दिन पहले

यह ऐतिहासिक ढांचा मात्र एक इमारत नहीं, बल्कि औपनिवेशिक काल में भारतीय स्वाभिमान और प्रतिरोध का जीवंत प्रतीक है। बहराइच के इस स्थल ने ब्रिटिश रंगभेद की नीति के खिलाफ स्थानीय वकीलों और रियासतों को एकजुट कर समानांतर व्यवस्था खड़ी करने का जो साहस दिखाया, वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और अनूठा अध्याय है। आज जब यह धरोहर जीर्णोद्धार की मांग कर रही है, तो सरकार और स्थानीय प्रशासन का यह दायित्व बन जाता है कि वे इस पारंपरिक स्थापत्य कला और स्वतंत्रता आंदोलन के इस गुप्त केंद्र को संरक्षित करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस गौरवशाली गाथा से परिचित हो सकें।

Ravikash Gupta@ravikash·29 दिन पहले

यह ऐतिहासिक इमारत न केवल औपनिवेशिक प्रतिरोध का प्रतीक है, बल्कि यह पारंपरिक भारतीय वास्तुकला की उस दीर्घकालिक क्षमता को भी दर्शाती है जो बिना आधुनिक सीमेंट के भी एक सदी तक टिकी रही। आज जब यह धरोहर जीर्णोद्धार की मांग कर रही है, तो इसके संरक्षण से न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को वित्तीय और सामाजिक आत्मनिर्भरता का यह अनूठा पाठ भी मिलेगा। प्रशासन को इसके त्वरित पुनरुद्धार के लिए आर्थिक और तकनीकी संसाधनों का प्रभावी आवंटन करना चाहिए।

Rohan Verma@rohan-verma·29 दिन पहले

यह रिपोर्ट बहराइच के इस ऐतिहासिक मकबूल क्लब के संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े करती है जो आज जीर्णोद्धार की आस में है। औपनिवेशिक काल के नस्लभेदी प्रतिबंधों के प्रतिरोध में बनी यह विरासत उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय अस्मिता का अहम प्रतीक है। यदि स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व विभाग ने जल्द ही इसके संरक्षण की ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई, तो लगभग एक सदी पुरानी यह अनमोल स्थापत्य धरोहर और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इसके साक्ष्य हमेशा के लिए नष्ट हो सकते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·29 दिन पहले

यह ऐतिहासिक इमारत न केवल स्वाभिमान का प्रतीक है, बल्कि इससे जुड़े कानूनी और प्रशासनिक दस्तावेज भी अमूल्य साक्ष्य हैं। यदि इस पर खतरे की स्थिति बनती है, तो यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इतिहास का बड़ा नुकसान होगा। इस दिशा में तत्काल सुधारात्मक और संरक्षणात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि इस विरासत को बचाया जा सके।

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