देवघर जिले में लगभग 20 से 25 दिन पहले धान की रोपाई का काम संपन्न हो चुका है। अब सितंबर की शुरुआत का यह समय धान की खेती के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इस नाजुक समय पर किसानों ने अपनी फसल पर उचित ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले समय में धान की पैदावार पर इसका बेहद बुरा असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बारिश के मौसम में हवा में बनी रहने वाली नमी के कारण धान की खड़ी फसल में विभिन्न प्रकार की बीमारियों और हानिकारक कीटों के फैलने का खतरा भी काफी ज्यादा बढ़ जाता है।
रोपाई के बाद क्यों महत्वपूर्ण है 20 से 25 दिनों का समय?
देवघर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजन ओझा ने इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, धान की रोपाई के करीब 20 से 25 दिन बीत जाने के बाद किसानों को अपने खेतों की और भी ज्यादा बारीकी से निगरानी करने की जरूरत होती है। दरअसल, यह वही समय होता है जब धान के पौधों की वानस्पतिक वृद्धि बहुत तेजी से होती है। इस अवधि में पौधे न केवल आकार में बढ़ते हैं, बल्कि मिट्टी से पोषक तत्व ग्रहण करके तेजी से कल्ले निकालना शुरू करते हैं। यही कारण है कि इस दौरान पौधों को उचित पोषण देना अत्यंत अनिवार्य हो जाता है। डॉ. राजन ओझा ने सलाह दी है कि रोपाई के इस चरण में किसानों को खेतों में यूरिया, जिंक सल्फेट और पोटाश का संतुलित इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। समय पर इन आवश्यक पोषक तत्वों को देने से पौधों की जड़ों को मजबूती मिलती है और उनकी ग्रोथ बहुत बेहतर होती है।
खाद न देने से फसल को होने वाले नुकसान
फसल के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर पोषक तत्वों के इस्तेमाल का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि पौधे स्वस्थ रहते हैं और उनमें भारी मात्रा में कल्ले निकलते हैं। धान की फसल में कल्लों की संख्या जितनी अधिक होगी, भविष्य में बालियां भी उतनी ही ज्यादा आएंगी, जिससे बंपर पैदावार की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत, यदि किसान इस नाजुक समय में पौधों को आवश्यक पोषण प्रदान करने में कोताही बरतते हैं, तो पौधों की ग्रोथ वहीं रुक सकती है। ऐसी स्थिति में पौधे कमजोर और पीले पड़ जाते हैं, और कल्लों की संख्या भी बेहद सीमित रह जाती है। इसका सीधा और नकारात्मक असर अंततः अनाज के उत्पादन पर पड़ता है। इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान भाई केवल खेतों में पानी का स्तर देखकर ही निश्चिंत न हो जाएं, बल्कि समय-समय पर फसल की स्थिति पर पैनी नजर रखें और आवश्यकता के अनुसार खादों का प्रयोग करें।
नमी के मौसम में कीटों और बीमारियों का खतरा
सितंबर के शुरुआती दिनों में मौसम में होने वाले बदलाव भी धान की फसल के लिए चुनौतियां खड़ी करते हैं। डॉ. राजन ओझा के मुताबिक, इस मौसम में वातावरण में नमी और आर्द्रता का स्तर काफी अधिक रहता है, जिससे धान में तना छेदक जैसे खतरनाक कीटों का प्रकोप होने की आशंका बढ़ जाती है। तना छेदक कीट धान के पौधों के तनों के अंदर घुसकर उन्हें अंदर से खोखला कर देता है, जिससे धीरे-धीरे पूरा पौधा सूखने लगता है और फसल कमजोर हो जाती है। यदि सही समय पर इस कीट के हमले पर ध्यान नहीं दिया गया, तो लहलहाती फसल पूरी तरह से बर्बाद हो सकती है। इस नुकसान से बचने के लिए किसानों को लगातार अपने खेतों का निरीक्षण करना चाहिए। अगर पौधों में कीटों या किसी भी प्रकार की बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तो उन्हें बिना किसी देरी के तुरंत कृषि विशेषज्ञों से संपर्क कर उनके द्वारा बताए गए वैज्ञानिक उपायों और दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।
बंपर पैदावार के लिए कृषि वैज्ञानिकों की अंतिम सलाह
संक्षेप में कहें तो, धान की एक सफल और भरपूर फसल प्राप्त करने के लिए समय पर सही खाद का प्रयोग और फसलों की निरंतर निगरानी दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। रोपाई के बाद के शुरुआती 20 से 25 दिन किसानों की पूरी मेहनत का फैसला करते हैं। यूरिया, जिंक सल्फेट और पोटाश का उचित तालमेल पौधों को हर तरह से मजबूत बनाता है। इसके साथ ही, यदि किसान समय रहते कीटों और बीमारियों पर नियंत्रण पा लेते हैं, तो वे बड़े नुकसान से बच सकते हैं। देवघर के किसानों के लिए वर्तमान समय अपनी धान की फसल को संवारने का है, ताकि उनकी मेहनत और खेती में लगाई गई लागत का उन्हें पूरा और सही मूल्य मिल सके और उनके खेत फसलों से लहलहा उठें।


















