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उत्तराखंड में 29 साल की सेवा के बाद भी नियमित रोजगार को तरसती पीआरडी जवान निशा असवालउत्तराखंड
3 नव॰ 2026, 2:11 pm (3 दिन पहले)· 1

उत्तराखंड में 29 साल की सेवा के बाद भी नियमित रोजगार को तरसती पीआरडी जवान निशा असवाल

देहरादून में तैनात पीआरडी जवान निशा असवाल 1997 से सेवाएं देने और पति के निधन के बाद अकेले दो बच्चों की परवरिश करने के बावजूद साल में केवल 5 से 6 महीने के काम पर निर्भर रहने को मजबूर हैं।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में प्रांतीय रक्षक दल की वर्दी पहनकर मुस्तैदी से अपनी जिम्मेदारी निभाने वाली निशा असवाल का संघर्ष सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को बयां करता है। साल 1997 से सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को संभाल रहीं निशा को इस विभाग में लगातार सेवाएं देते हुए 29 साल पूरे हो चुके हैं। वर्ष 2026 तक की इस लंबी सेवा अवधि के बावजूद उनका पद न तो नियमित हो सका है और न ही उन्हें मासिक निश्चित आय की कोई गारंटी मिली है। पूरे साल में केवल पांच से छह महीने ही उन्हें ड्यूटी पर बुलाया जाता है, जबकि शेष छह से सात महीने बिना किसी काम और आमदनी के घर पर ही गुजारने पड़ते हैं।

पति के निधन के बाद सिर पर आया दो बच्चों की परवरिश का जिम्मा

उत्तरकाशी जिले के पुरोला क्षेत्र की मूल निवासी निशा के जीवन में परेशानियां उस वक्त काफी बढ़ गईं, जब करीब आठ से नौ वर्ष पहले उनके पति का अचानक देहांत हो गया था। परिवार के मुखिया का साया सिर से उठने के बाद घर की पूरी आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारी अकेले निशा के कंधों पर आ गई। उनके सामने अपने दो बच्चों के भरण-पोषण के साथ-साथ उनके सुरक्षित भविष्य को गढ़ने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। निशा बताती हैं कि उनके दोनों बच्चे पढ़ाई-लिखाई में काफी होनहार हैं और उनका सपना है कि वे अपने बच्चों को बेहतरीन स्कूलों में तालीम दिलाएं। हालांकि, अनियमित काम और बिना किसी स्थायी आमदनी के रोजमर्रा के घरेलू खर्च पूरे करना ही भारी पड़ता है, जिसके चलते बच्चों की बेहतर शिक्षा का सपना पूरा करने में लगातार अड़चनें आ रही हैं।

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साल में सिर्फ पांच से छह महीने की ड्यूटी और अनिश्चित भविष्य

निशा असवाल का यह दर्द बताता है कि पहाड़ की अनगिनत महिलाएं किस तरह सालभर नियमित रोजगार की उम्मीद में निरंतर संघर्ष कर रही हैं। वे बताती हैं कि जब साल के आधे समय काम ही नहीं मिलता, तो परिवार का पालन-पोषण कैसे संभव हो सकता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीआरडी जवानों के मानदेय में वृद्धि करने की घोषणा अवश्य की थी, लेकिन निशा का स्पष्ट कहना है कि यदि जवानों को साल में केवल कुछ ही महीने काम दिया जाएगा तो बढ़ा हुआ मानदेय भी घरेलू बजट को संतुलित नहीं कर सकता। जब तक पूरे 12 महीने रोजगार की गारंटी नहीं होगी, तब तक जवानों के परिवारों की आर्थिक तंगी दूर नहीं हो सकती। भविष्य की वित्तीय सुरक्षा और पक्की तनख्वाह के अभाव में जवानों को हमेशा अनिश्चितता के साए में जीना पड़ रहा है।

हजारों पीआरडी जवानों का आक्रोश और संगठन का आंदोलन

नियमित रोजगार की यह भीषण समस्या केवल निशा तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड भर के हजारों पीआरडी जवान लंबे समय से इसी प्रकार की मार झेल रहे हैं। विभाग में दशकों तक काम करने के उपरांत भी स्थायी कर्मचारी का दर्जा न मिलने से कर्मियों में गहरा असंतोष व्याप्त है। इसी गंभीर विषय को लेकर प्रांतीय रक्षक दल हित संगठन ने शासन के समक्ष अपनी आवाज उठाई है। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष किशन सिंह रावत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शासन स्तर से जवानों की न्यायसंगत मांगों पर त्वरित और सकारात्मक फैसला नहीं लिया जाता है, तो राज्य भर के जवान राजधानी देहरादून में महा आक्रोश रैली का आयोजन करेंगे। किशन सिंह रावत ने यह भी स्मरण कराया कि संगठन अपनी मांगों को लेकर एकता विहार में 18 मार्च से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठा था।

होमगार्ड की तर्ज पर मूल वेतन और महंगाई भत्ते की प्रमुख मांग

प्रांतीय रक्षक दल हित संगठन ने सरकार से मांग की है कि पीआरडी जवानों को होमगार्ड की तर्ज पर मूल वेतन के साथ महंगाई भत्ता प्रदान किया जाए। इसके साथ ही, जवानों की सबसे बुनियादी मांग यह है कि उन्हें वर्षभर यानी पूरे बारह महीने नियमित काम मुहैया कराया जाए। जवानों का कहना है कि पूरे साल रोजगार मिलने से ही वे अपने परिवारों का पालन-पोषण सम्मानजनक तरीके से कर सकेंगे और अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा बिना किसी आर्थिक तंगी के सुनिश्चित कर पाएंगे। वर्तमान में उत्तराखंड के हजारों पीआरडी जवान इस उम्मीद में टकटकी लगाए बैठे हैं कि राज्य सरकार जल्द ही उनके भविष्य को सुरक्षित करने वाला ठोस निर्णय लेगी।

सवाल-जवाब

निशा असवाल कितने वर्षों से पीआरडी में सेवा दे रही हैं?
निशा असवाल ने साल 1997 में प्रांतीय रक्षक दल में काम शुरू किया था और वे पिछले 29 वर्षों से लगातार सेवाएं दे रही हैं।
निशा असवाल मूल रूप से कहां की रहने वाली हैं?
वे उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के पुरोला क्षेत्र की रहने वाली हैं और वर्तमान में देहरादून में तैनात हैं।
पीआरडी जवानों को साल में कितने समय काम मिलता है?
पीआरडी जवानों को साल में केवल 5 से 6 महीने ही ड्यूटी मिलती है, जबकि बाकी 6 से 7 महीने उन्हें बिना काम के रहना पड़ता है।
प्रांतीय रक्षक दल हित संगठन की मुख्य मांगें क्या हैं?
संगठन की मांग है कि जवानों को होमगार्ड की तर्ज पर मूल वेतन और महंगाई भत्ता मिले तथा उन्हें सालभर नियमित रोजगार दिया जाए।
मांगें पूरी न होने पर संगठन ने क्या कदम उठाने की चेतावनी दी है?
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष किशन सिंह रावत ने कहा है कि फैसला न होने पर प्रदेशभर के पीआरडी जवान देहरादून में महा आक्रोश रैली निकालेंगे।
संगठन ने पूर्व में अनिश्चितकालीन धरना कहां और कब शुरू किया था?
संगठन अपनी मांगों को लेकर 18 मार्च से एकता विहार में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठा था।
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टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·2 दिन पहले

देहरादून में ड्यूटी के दौरान निशा जी से मेरी मुलाकात हुई थी। पति के जाने के बाद बच्चों को पालने का उनका यह संघर्ष वाकई दिल दहला देने वाला है, सालभर काम मिलना चाहिए।

Ravikash Gupta@ravikash·2 दिन पहले

अर्जुन जी, आपने सही कहा कि उनसे मिलकर दिल दहल जाता है। क्या सरकार इस पर कोई ठोस नीति लाएगी?

Rohan Verma@rohan-verma·2 दिन पहले

29 साल से काम कर रही हैं, पर मुझे यकीन नहीं होता कि सरकार सच में ऐसा नियम चला रही है कि साल में सिर्फ छह महीने ही काम मिले।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 दिन पहले

रोहन, बात बिल्कुल सही है तुम्हारी। लेकिन क्या विभाग के पास इतने बजट की कमी है कि इन्हें पूरे साल काम नहीं दे सकते?

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