दिल्ली-एनसीआर की धड़कन बन चुकी दिल्ली मेट्रो ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाया है। ट्रेन के संचालन में सटीकता, समय की पाबंदी और अपनी भरोसेमंद सेवाओं के दम पर दिल्ली मेट्रो ने दुनिया की कई नामी-गिरामी मेट्रो प्रणालियों को पीछे छोड़ दिया है। हांगकांग, पेरिस और न्यूयॉर्क जैसे दिग्गज शहरों की मेट्रो के मुकाबले दिल्ली मेट्रो का यह बेहतरीन प्रदर्शन भारत के लिए एक बहुत बड़ी कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है।
दुनियाभर की 45 प्रमुख मेट्रो प्रणालियों को शामिल करने वाले कम्युनिटी ऑफ मेट्रो (COMET) के तुलनात्मक सर्वे में दिल्ली मेट्रो को सबसे भरोसेमंद मेट्रो प्रणालियों में नंबर वन स्थान मिला है। इस अध्ययन में मुख्य रूप से ट्रेनों की समयबद्धता और परिचालन की सटीकता को परखा गया था। दिल्ली मेट्रो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां ट्रेनों के गंतव्य तक पहुंचने में यदि 59 सेकंड से ज्यादा की भी देरी हो जाती है, तो उसे भी विलंब की श्रेणी में गिन लिया जाता है। इसके विपरीत, कई अन्य अंतरराष्ट्रीय मेट्रो प्रणालियों में 2 से 5 मिनट तक की देरी को एक सामान्य सीमा माना जाता है।
इस बड़ी उपलब्धि से जुड़ा एक आधिकारिक पोस्ट X पर लिखा गया है, जिसमें इस वैश्विक सर्वे के परिणामों की चर्चा की गई है।
बीते 23 वर्षों में ऐसे सुधरी समयबद्धता
दिल्ली मेट्रो ने वर्ष 2003 में अपनी पहली शुरुआत होने के बाद से लेकर अब तक परिचालन के हर मोर्चे पर लगातार बेहतरीन सुधार किए हैं। उस शुरुआती दौर में मेट्रो की समयबद्धता लगभग 98.27 प्रतिशत हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 99.95 प्रतिशत के ऐतिहासिक और रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। वर्तमान में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के भीतर मेट्रो का कुल नेटवर्क लगभग 416.5 किलोमीटर लंबा हो चुका है। इसके साथ ही ट्रेनों के आने-जाने के बीच का समय अंतराल भी काफी कम हुआ है। शुरुआती दिनों में जहां दो ट्रेनों के बीच लगभग 7 मिनट का अंतर होता था, वहीं आज के समय में व्यस्त कॉरिडोर पर यह समय घटकर मात्र 2.18 मिनट के करीब रह गया है।
कुल नेटवर्क के 29 प्रतिशत हिस्से पर चल रही ड्राइवरलेस मेट्रो
दिल्ली मेट्रो केवल समय की पाबंदी के मामले में ही आगे नहीं है, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक अपनाने में भी सबसे आगे चल रही है। पिंक लाइन और मजेंटा लाइन को शामिल करते हुए लगभग 29 प्रतिशत नेटवर्क पर ऑटोमैटिक ट्रेन ऑपरेशन प्रणाली काम कर रही है। इसमें लगभग 71.55 किलोमीटर लंबी पिंक लाइन दुनिया की सबसे लंबी चालक रहित यानी ड्राइवरलेस मेट्रो लाइनों में एक प्रमुख मुकाम रखती है। यह तकनीकी प्रगति साबित करती है कि दिल्ली मेट्रो संचालन क्षमता के मामले में वैश्विक मानकों पर कितनी खरी उतर रही है।
सामने बनी हुई हैं कई बड़ी चुनौतियां
हालांकि इन तमाम बड़ी सफलताओं के बावजूद दिल्ली मेट्रो के सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी खड़ी हैं। येलो लाइन और ब्लू लाइन जैसे अत्यधिक व्यस्त रहने वाले कॉरिडोर पर पीक ऑवर्स के दौरान भारी भीड़ का दबाव, अंतिम छोर तक यानी लास्ट-माइल कनेक्टिविटी की व्यवस्था और इसके चौथे चरण का निर्माण कार्य कुछ अहम मुद्दे हैं। इसके अलावा पुराने नेटवर्क वाले कुछ हिस्सों में कभी-कभी सिग्नलिंग प्रणाली या ओवरहेड तारों से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें भी परिचालन को प्रभावित कर देती हैं।



















